नेशनल हेराल्ड से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी माँ सोनिया गांधी की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने रविवार को इस मामले में एक नई FIR दर्ज की है। यह नई FIR प्रवर्तन निदेशालय (ED) मुख्यालय द्वारा EOW में दर्ज कराई गई एक शिकायत के बाद दर्ज की गई है। इस FIR में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के अलावा छह अन्य नाम भी शामिल हैं।

EOW की नई FIR और आरोप

EOW द्वारा दर्ज की गई इस FIR में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 403 (बेईमानी से संपत्ति का गबन), 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत आरोप लगाए गए हैं।

कौन कौन आरोपी: सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सैम पित्रोदा, सुमन दुबे और अन्य छह लोग, साथ ही तीन कंपनियां- एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL), यंग इंडियन (YI) और डॉटैक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड।

शिकायत का आधार: ED की शिकायत, जिसमें आरोप है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL), जो नेशनल हेराल्ड का मूल प्रकाशक है, की संपत्ति पर धोखाधड़ी से कब्जा करने की आपराधिक साजिश रची।

ED ने आरोप लगाया है कि एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) की ₹2,000 करोड़ से अधिक की संपत्ति को कथित तौर पर यंग इंडियन लिमिटेड के माध्यम से महज ₹50 लाख में अधिग्रहित किया गया था, जिसमें गांधी परिवार की 76% हिस्सेदारी है।

कोर्ट की सुनवाई फिर टली

इस बीच, दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दायर आरोपपत्र (Chargesheet) पर संज्ञान लेने के फैसले को एक बार फिर टाल दिया गया है। विशेष जज विशाल गोगने अब इस पर 16 दिसंबर को अपना आदेश सुनाएंगे। ED ने अपने आरोपपत्र में धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे सहित कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को नामजद किया है।
पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने सभी आरोपियों को नोटिस जारी कर कहा था कि संज्ञान लेने से पहले उन्हें अपनी बात रखने का "अधिकार है"। न्यायाधीश गोगने ने नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता (BNSS) की धारा 223 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि आरोपी को इस स्तर पर भी सुना जाना निष्पक्ष सुनवाई के लिए आवश्यक है।
जज ने यह भी दोहराया कि PMLA के नियमों के अनुसार, मनी लॉन्ड्रिंग और उससे जुड़ा मूल अपराध (Predicate Offence) दोनों की सुनवाई उसी अदालत में होनी चाहिए।

नेशनल हेराल्ड केस में क्या है पूरा मामला

नेशनल हेराल्ड मामला भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत से शुरू हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया था कि कांग्रेस नेताओं और AJL से जुड़ी कंपनियों ने फंड का दुरुपयोग किया और धोखाधड़ी से संपत्ति हासिल की। यह खबर कांग्रेस पार्टी के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकती है, खासकर ऐसे समय में जब कोर्ट में ED के आरोपपत्र पर संज्ञान लेने का फैसला लंबित है। 
प्रवर्तन निदेशालय (ED) के प्रमुख आरोप
ED ने यह मामला धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत दर्ज किया है। ED का पूरा आरोप एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) की संपत्ति और कंपनी के स्वामित्व को लेकर है। ED का आरोप है कि कांग्रेस नेताओं द्वारा किए गए कार्य IPC की धारा 403 (संपत्ति का बेईमानी से गबन), 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी), और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत अपराध हैं। वित्तीय अनियमितता ED का आरोप है कि AJL (जो नेशनल हेराल्ड का मूल प्रकाशक है) की ₹2,000 करोड़ से अधिक की रियल एस्टेट संपत्तियों को यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (YI) को केवल ₹50 लाख में ट्रांसफर करने की आपराधिक साजिश रची गई। 
यंग इंडियन में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की 76% हिस्सेदारी है। ED का आरोप है कि इस लेनदेन के माध्यम से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने AJL की संपत्ति पर अवैध नियंत्रण प्राप्त कर लिया। आरोप है कि कांग्रेस पार्टी ने AJL को ₹90 करोड़ से अधिक का ब्याज-मुक्त ऋण दिया था, जो बाद में YI को असाइन कर दिया गया। ED का मानना है कि यह लेनदेन राजनीतिक दल के फंड का दुरुपयोग था। ED के आरोपपत्र में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अलावा वरिष्ठ कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा और सुमन दुबे का भी नाम शामिल है।

राउज एवेन्यू कोर्ट की पिछली सुनवाई की मुख्य बातें

कोर्ट में इस समय ED के आरोपपत्र पर संज्ञान लेने (Cognisance) पर फैसला लंबित है। पिछली सुनवाई में विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की थीं:

सुनवाई का अधिकार (Right to be Heard): कोर्ट ने जोर दिया कि किसी भी फैसले से पहले, आरोपियों (सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य) को सुना जाना उनका मूल अधिकार है।

नए कानून का हवाला (BNSS): जज ने नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता (BNSS) की धारा 223 का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस धारा के अनुसार, अभियुक्त को संज्ञान लेने से पहले भी सुनवाई का एक विशेष अवसर दिया जा सकता है।

निष्पक्षता और पारदर्शिता: कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान (धारा 223) PMLA का विरोध नहीं करता है, बल्कि आपराधिक कार्यवाही में निष्पक्षता और पारदर्शिता को मजबूत करता है, क्योंकि BNSS एक प्रगतिशील कानून है जिसका उद्देश्य आरोपी के अधिकारों की रक्षा करना है।

एक ही कोर्ट में सुनवाई: कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि PMLA के नियमों के अनुसार, मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) का मामला और उससे जुड़ा मूल अपराध (जैसे IPC की धाराएँ) दोनों की सुनवाई एक ही अदालत में होनी चाहिए।