प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि महिला आरक्षण अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन महज एक विधायी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत की करोड़ों महिलाओं की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। उन्होंने सभी सांसदों से इस कदम का समर्थन करने के लिए एकजुट होने का आग्रह किया। अपनी वेबसाइट narendramodi.in पर प्रकाशित एक लेख में प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि यह कदम उस सिद्धांत की पुष्टि है जो लंबे समय से भारत की सभ्यतागत विचारधारा का मार्गदर्शन करता रहा है कि समाज की प्रगति महिलाओं की प्रगति पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि यह अनिवार्य है कि 2029 के लोकसभा चुनाव और विभिन्न राज्यों में आने वाले विधानसभा चुनाव महिला आरक्षण के साथ संपन्न हों। सबसे बड़े राज्य यूपी में 2027 में विधानसभा चुनाव है। जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में अभी मतदान होना है।
कांग्रेस के संचार प्रभारी और सांसद जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर जबरदस्त हमला बोला है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मीडिया में लेख लिखकर यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे ही 2029 से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण के एकमात्र समर्थक हैं।
कांग्रेस सांसद ने कहा- वास्तव में, उन्हें भारत की महिलाओं से माफी मांगनी चाहिए। जब 2023 में संसद ने इस अधिनियम को आमराय से पारित किया था, तब कांग्रेस ने इसकी मांग की थी कि इसे 2024 से ही लागू किया जाए। लेकिन प्रधानमंत्री इसके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने इस आरक्षण को जनगणना और परिसीमन (delimitation) की प्रक्रिया से जोड़ दिया, जिन्हें वे वर्षों तक पूरा नहीं कर पाए और टालते रहे।
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जयराम रमेश ने कहा कि करीब 30 महीने बाद, जब विधानसभा चुनावों में हार का खतरा सामने आया। यहां तक कि चुनाव आयोग पर भी केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन होने के आरोप लगे तो प्रधानमंत्री ने अपना रुख बदल लिया। अब वे कह रहे हैं कि जनगणना और उससे जुड़े परिसीमन को भूल जाना चाहिए, क्योंकि इसमें बहुत समय लगेगा।
उन्होंने कहा कि यह तब कहा जा रहा है, जबकि उनके ही जनगणना आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि जनगणना के नतीजे 2027 तक आ जाएंगे। यह पूरा नैरेटिव भ्रम और विरोधाभास पर आधारित बताया जा रहा है, जिसका उद्देश्य यह है कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की महिलाएं भाजपा की ओर आकर्षित हों। इन राज्यों में भाजपा के पास अन्य मुद्दों पर कोई ठोस एजेंडा नहीं है।

मोदी सरकार का यू-टर्न

यह मोदी सरकार का यू-टर्न है, जो यह दिखाता है कि सरकार विपक्ष से संवाद करने में इच्छुक नहीं है और उसकी योजना में गंभीर कमी रही है। इसके बावजूद, प्रधानमंत्री इस यू-टर्न का श्रेय भी खुद ही ले रहे हैं। आलोचकों के अनुसार, यह उनकी राजनीतिक पाखंड और भ्रामक रणनीति को दर्शाता है। यह सब उनकी शासन संबंधी विफलताओं और विदेश नीति में आई गंभीर चुनौतियों को छिपाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

महिला आरक्षण पर राजनीति

नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को ऐतिहासिक कानून माना गया, लेकिन इसका कार्यान्वयन 2029 तक टालना एक बड़ा राजनीतिक विवाद बना। आलोचना का मुख्य बिंदु यही है कि सरकार ने इसे तुरंत लागू करने की बजाय तकनीकी प्रक्रियाओं (जनगणना और परिसीमन) से जोड़ दिया। इससे यह सवाल उठता है: क्या यह निर्णय प्रशासनिक मजबूरी था या राजनीतिक रणनीति?
भारत में जनगणना (Census) और परिसीमन (Delimitation) लोकतांत्रिक ढांचे के अहम स्तंभ हैं। लेकिन इन प्रक्रियाओं में देरी ने इस कानून के लागू होने को टाल दिया। इसीलिए आलोचकों को कहना पड़ रहा है कि सरकार ने जानबूझकर देरी की। बाद में उसी देरी को बहाना बनाया मोदी सरकार हर मुद्दे को चुनावी रणनीति के नज़र से देखती है और पूरे आकलन के बाद उस पर स्टैंड लेती है।
मोदी सरकार इतने जबरदस्त चुनावी दबाव में है कि उसे अपना रुख इस मुद्दे पर बदलना पड़ा। खासतौर पर तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में महिलाओं मतदाताओं के चुनाव में बढ़चढ़ कर भाग लेने की वजह से। यह सरकार का एक क्लासिक राजनीतिक यू-टर्न है, जहां पहले निर्णय टाले जाते हैं, फिर चुनाव से पहले उसे नफा-नुकसान के इरादे से बदला जाता है।
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कितना निष्पक्ष है चुनाव आयोग

हर चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की छीछालेदर हो रही है। क्योंकि उस पर आरोप लगते हैं कि वो बीजेपी एजेंट की भूमिका में नज़र आता है। टीएमसी, कांग्रेस, आरजेडी, सपा कई बार ये आरोप लगा चुके हैं। चुनाव के बीच मोदी सरकार ने कैबिनेट मीटिंग में महिला आरक्षण को नए नाम के बिल से पास करने की घोषणा की। लेकिन वास्तविक रूप में यह अभी भी लागू नहीं है। चुनाव आयोग मोदी सरकार की इस कार्रवाई पर चुप रहा। उसने बीच चुनाव में ऐसा फैसला लेने से सरकार को रोका नहीं। विपक्ष का कहना है कि देश का चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है, यह बार बार साबित हो रहा है। कांग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दल इसे सरकार की विफलता और राजनीतिक अवसरवाद बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम के रूप में पेश कर रही है।
यह मुद्दा केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार की नीति-निर्माण प्रक्रिया, चुनावी रणनीति, और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ है। सरकार ने पहले देरी की, फिर चुनावी दबाव में अपना रुख बदला और अब उसी फैसले का श्रेय लेने की कोशिश कर रही है।