नेता विपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने डिलिमिटेशन विवाद को लेकर मोदी सरकार पर ज़बरदस्त हमला बोला है। उन्होंने एक्स पर बुधवार देर रात लिखा है- यह बीजेपी का एक खतरनाक प्लान है कि 2029 के लोकसभा चुनावों तक सभी लोकसभा सीटों को अपने फायदे के लिए “गेरिमैंडर” (gerrymander) कर दिया जाए। प्रस्तावित बिलों के माध्यम से संविधान के सभी सुरक्षा उपायों को हटा दिया जाए, जिससे पूरी पावर डिलिमिटेशन कमीशन को दे दी जाएगी। यह कमीशन खुद सरकार नियुक्त करेगी और निर्देशित करेगी। इस कमीशन के फैसलों को एक तरह से मोदी सरकार के परिसीमन संबंधी फैसलों को किसी अदालत में चुनौती भी नहीं दी जा सकेगी। 

गेरिमैंडरिंग का मतलब क्या है

राहुल गांधी ने अपने बयान में गेरिमैंडरिंग शब्द का इस्तेमाल किया है। इसका मतलब यह होता है कि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं इस तरह तय करना कि सिर्फ एक पार्टी को चुनावी फायदा मिले। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं होगी, बल्कि सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाएगी।
संसद का विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू हो रहा है। जिसमें सरकार महिला आरक्षण विधेयक और विवादित परिसीमन विधेयक ला रही है। महिला आरक्षण बिल को लेकर कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने समर्थन का फैसला किया है लेकिन परिसीमन विधेयक के विरोध का फैसला किया है। संसद में इस पर विवाद होना तय है। सदन में आज गुरुवार को या सरकार जब भी इस बिल को पेश करेगी अभूतपूर्व हंगामा देखने को मिल सकता है। क्योंकि इन पर बहस का मौका भी सभी पक्षों को मिलेगा।
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राहुल ने लिखा है- हम पहले ही देख चुके हैं कि बीजेपी यह कैसे करती है। उसने असम और जम्मू-कश्मीर में डिलिमिटेशन को हाईजैक कर लिया था, जहां उसने विरोधी बीजेपी क्षेत्रों और समुदायों को तोड़-फोड़कर अपने चुनावी फायदे के लिए बांट दिया। परिणामस्वरूप:कुछ सीटों पर 25 लाख मतदाता हैं, जबकि कुछ सीटों पर केवल 8 लाख मतदाता हैं। कुछ सीटों में 12 विधानसभा खंड हैं, जबकि कुछ में केवल 6 विधानसभा खंड हैं। कुछ सीटों को बिना किसी जुड़ाव के टुकड़ों में बांट दिया गया है।
राहुल ने कहा है कि चुनाव आयोग पर कब्जा कर लेने के बाद प्रधानमंत्री मोदी को पूरा भरोसा है कि वे डिलिमिटेशन कमीशन पर भी कब्जा कर लेंगे। लेकिन कांग्रेस यह होने नहीं देगी। डिलिमिटेशन एक पारदर्शी नीति ढांचे के आधार पर होना चाहिए, जो व्यापक परामर्श और आम सहमति के बाद विकसित किया जाए। भारत के सभी समुदायों और सभी राज्यों के लोगों को यह विश्वास होना चाहिए कि उनका सही प्रतिनिधित्व होगा और उनकी आवाज सुनी जाएगी।

वर्तमान डिलिमिटेशन विवाद क्या हैः केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन विधेयक (2026) के तहत लोकसभा सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर लगभग 850 तक करने का प्रस्ताव है। सीटों का पुनर्वितरण 2011 की जनगणना के आधार होगा। एक नया डिलिमिटेशन कमीशन गठित होगा। यहां विवाद की जड़ यह है कि दक्षिण भारत के राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना) ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। जबकि उत्तर भारत के राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश) की आबादी तेजी से बढ़ी है। ऐसे में सीटों का पुनर्वितरण उत्तर भारत को ज्यादा राजनीतिक ताकत देगा, दक्षिण की सीटों का नुकसान होगा। इससे दक्षिणी राज्यों में असंतोष बढ़ा है।

डिलिमिटेशन कमीशन की निष्पक्षता पर सवाल क्यों

राहुल का सबसे बड़ा आरोप यही है कि कमीशन को सरकार नियुक्त करेगी और निर्देशित करेगी। उसने ऐसा चुनाव आयोग और सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति में किया है। जहां नेता विपक्ष सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की भूमिका खत्म कर दी गई। यानी संविधान के “सुरक्षा उपाय” (checks and balances) कमजोर किए जा रहे हैं। यहां चिंता यह है कि अगर परिसीमन कमीशन स्वतंत्र नहीं हुआ, तो पूरी प्रक्रिया सत्तारूढ़ पार्टी के राजनीतिक नियंत्रण में आ सकती है।

असम और जम्मू-कश्मीर में क्या हुआ 

राहुल गांधी का कहना है कि असम और जम्मू-कश्मीर में डिलिमिटेशन पहले ही “हाइजैक” किया गया था। उन्होंने बताया कि कुछ सीटों पर 25 लाख वोटर हैं तो कुछ में सिर्फ 8 लाख। कहीं 12 विधानसभा खंड हैं तो कहीं 6। भौगोलिक रूप से भी असंगत सीटें हैं। नदियों/पहाड़ों को अजीबोगरीब ढंग से जोड़ा गया। ये उदाहरण “समान प्रतिनिधित्व” (equal representation) के सिद्धांत पर सवाल खड़े करते हैं।

राहुल गांधी के हमले के व्यापक राजनीतिक अर्थ

राहुल गांधी का यह बयान तीन बड़े संदेश देता है:
  • उत्तर बनाम दक्षिण की राजनीतिः यह मुद्दा अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय असमानता का प्रतीक बन गया है। बीजेपी चूंकि सिर्फ हिन्दी बेल्ट यानी उत्तर भारत में प्रभावी है तो वो बंटवारे का गंदा खेल खेल रही है।
  • संस्थाओं की विश्वसनीयता पर बहसः चुनाव आयोग और डिलिमिटेशन कमीशन की निष्पक्षता पर राहुल गांधी ने बड़ा सवाल उठाया है। ऐसा चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति, सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति, सूचना आयोग प्रमुख की नियुक्तियों समेत तमाम संवैधानित संस्थाओं की नियुक्तियों में देखा जा रहा है। नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका खत्म कर दी गई है।
  • 2029 चुनाव से पहले क्या बदलेगा नैरेटिवः राहुल गांधी और पूरा विपक्ष इस मुद्दे को “लोकतंत्र बनाम सत्ता नियंत्रण” के नैरेटिव में बदलने की कोशिश में जुटा हुआ है। लेकिन जनता को जब तक मुद्दा समझ नहीं आएगा, तब तक इसकी सफलता संदिग्ध है।
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बहरहाल, राहुल गांधी का बयान एक चेतावनी की तरह भी है। डिलिमिटेशन केवल सीटों का पुनर्वितरण नहीं, बल्कि भारत के राजनीतिक संतुलन का पुनर्निर्माण है। उनकी कुछ चिंताएं वास्तविक और वैध हैं, खासकर प्रतिनिधित्व और पारदर्शिता को लेकर। असली सवाल यही है कि क्या डिलिमिटेशन न्यायसंगत प्रतिनिधित्व देगा, या बीजेपी के राजनीतिक लाभ का हथियार बन जाएगा? इन सारे मुद्दों के बीच विपक्ष के पास राजनीतिक आंदोलन का अभाव है। राहुल गांधी ने वोट चोरी और हेराफेरी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था। बाकी दलों ने उसका पुरज़ोर समर्थन या आंदोलन नहीं छेड़ा। नतीजा इस समय बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु चुनाव में दिखाई दिया या दिखाई दे रहा है। भारत में चुनाव अब निष्पक्ष नहीं रह गए हैं। यही विपक्ष की विफलता है।