आरएसएस के सह-कार्यवाह अतुल लिमये ने जंतर-मंतर आंदोलन को लेकर कहा कि 'यदि हम उन संगठनों के नामों की जाँच करें तो हमें पता चलेगा कि हिंदू विरोध इस मंच से क्यों उभरा, 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसे नारे लगाने वाले लोग इस मंच पर क्यों आए...।"
संघ नेता अतुल लिमये ने जंतर मंतर प्रोटेस्ट को एंटी नेशनल बताया
मोदी सरकार ने जिन जंतर मंतर प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत की और जिनके सामने झुकते हुए धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया उस प्रदर्शन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 'एंटी नेशनल' बताया है। संघ के सह-कार्यवाह अतुल लिमये ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन और कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में चले आंदोलन को 'राष्ट्रविरोधी' और 'संविधान-विरोधी' बताते हुए कहा कि इसकी पूरी 'केस स्टडी' की जानी चाहिए, ताकि इसके पीछे की कार्यप्रणाली, समर्थन तंत्र और वैचारिक आधार को समझा जा सके।
अतुल लिमये ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए की। इस हफ़्ते की शुरुआत में हुए इस कार्यक्रम में लिमये ने कहा कि शुरुआत में छात्रों का आंदोलन NEET पेपर लीक जैसे शिक्षा से जुड़े मुद्दे पर स्वाभाविक था, लेकिन बाद में यह अपने मूल उद्देश्य से भटक गया।
लिमये ने कहा कि छात्र शिक्षा व्यवस्था में सुधार चाहते थे, लेकिन आंदोलन बाद में ऐसे लोगों के हाथों में चला गया, जिन्होंने इसे राजनीतिक दिशा दे दी। उनके मुताबिक़, छात्रों की ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण के कार्यों में लगाना ज़रूरी है और इस दिशा में एबीवीपी को नेतृत्व करना चाहिए।
संघ के नेता ने कहा कि सीजेपी आंदोलन को केवल एक विरोध प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसकी पूरी प्रक्रिया का अध्ययन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है कि आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई? इसकी कार्यप्रणाली क्या थी? किन संगठनों और समूहों का समर्थन मिला? इसके पीछे वैचारिक आधार क्या था? और आंदोलन अचानक बड़े स्तर पर कैसे पहुंच गया?
लिमये ने दावा किया कि CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके को भारत लौटने के बाद शुरुआती दौर में ज्यादा समर्थन नहीं मिला था, लेकिन बाद में आंदोलन तेजी से बढ़ा। उन्होंने कहा कि यह समझना जरूरी है कि उस दौरान ऐसा क्या बदला जिससे आंदोलन को व्यापक समर्थन मिलने लगा।
क्या मोदी सरकार 'एंटी नेशनल' के आगे झुकी थी?
आरएसएस नेता जिन कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को एंटी नेशनल बता रहे हैं उसके साथ ही मोदी सरकार ने कई दौर की बातचीत की और फिर समझौता हुआ। सीजेपी के संसद चलो मार्च और पुलिस कार्रवाई के बाद सरकार ने संपर्क साधा। सीजेपी ने न्यूट्रल वेन्यू पर बातचीत की शर्त रखी। सरकार की तरफ से केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ बैठकें कीं। सीजेपी की तीन मुख्य मांगें थीं।
25 जुलाई को तीसरे दौर के बाद संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा हुई कि तीनों मांगें मान ली गई हैं। धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को इस्तीफा दे दिया। दो मांगें पहले ही मान ली गई थीं। प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR वापस लेने और कोई नई कार्रवाई नहीं करने की बात कही गई। सरकार ने आश्वासन दिया कि दिल्ली और अन्य जगहों पर दर्ज FIR वापस ली जाएंगी और भविष्य में कार्रवाई नहीं होगी। नीट पेपर लीक व परीक्षा विवाद के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने का वादा किया।
'वामपंथी संगठनों की भूमिका की जांच हो'
अतुल लिमये ने आरोप लगाया कि आंदोलन को समर्थन देने वाले कई संगठन वामपंथी विचारधारा से जुड़े बताए जाते हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में किन-किन संगठनों ने भूमिका निभाई और उनका उद्देश्य क्या था, इसकी भी जांच और अध्ययन होना चाहिए। हालाँकि, उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कोई साक्ष्य पेश नहीं किया।
एबीपी की रिपोर्ट के अनुसार लिमये ने कहा, "यदि हम उन संगठनों के नामों की जाँच करें, तो हमें पता चलेगा कि हिंदू विरोध इस मंच से क्यों उभरा, 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसे नारे लगाने वाले लोग इस मंच पर क्यों आए, वामपंथी संगठनों ने इस मंच पर कैसे नियंत्रण किया, और छात्र आंदोलन राजनीतिक आंदोलन में कैसे बदल गया।"
अपने भाषण में लिमये ने राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव के एक पुराने बयान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि लोकतंत्र का भविष्य संसद के बजाय सड़कों पर तय होने जैसी बातें कही जाती हैं तो ऐसे विचारों को भी समझने और उनकी पृष्ठभूमि का विश्लेषण करने की ज़रूरत है।
आरएसएस नेता ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के प्रसिद्ध 'ग्रामर ऑफ अनार्की' भाषण का ज़िक्र करते हुए कहा कि आंबेडकर ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में अराजकता के खतरों को लेकर पहले ही चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा कि आज जरूरत है कि ऐसी प्रवृत्तियों को पहचानकर उनसे सावधान रहा जाए।
प्रदर्शन में इस्तेमाल भाषा पर भी जताई आपत्ति
अतुल लिमये ने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वहां मौजूद एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें बताया कि कई छात्र-छात्राओं द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा चौंकाने वाली थी और वह भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप नहीं थी। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन में असहमति जताने का अधिकार है, लेकिन भाषा और व्यवहार की मर्यादा भी बनी रहनी चाहिए।
बहरहाल, जंतर-मंतर आंदोलन को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। एक ओर आरएसएस और उससे जुड़े संगठन इसे अपने मूल उद्देश्य से भटका हुआ और राजनीतिक रंग लेने वाला आंदोलन बता रहे हैं, वहीं आंदोलन से जुड़े लोग और विपक्षी दल इसे छात्रों के अधिकारों और लोकतांत्रिक विरोध की अभिव्यक्ति मानते हैं।
इसी वजह से यह आंदोलन अब केवल शिक्षा या पेपर लीक के मुद्दे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके राजनीतिक और वैचारिक पहलुओं पर भी राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है।