SIR फेज-2 के दौरान 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से आख़िर छह करोड़ से ज़्यादा नाम कैसे हट गए?
एसआईआर प्रक्रिया। (फाइल फोटो)
चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर प्रक्रिया के दूसरे चरण में बड़ा बदलाव हुआ है। 9 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 6.5 करोड़ वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं। ये नाम अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से हटाए गए हैं।
एसआईआर के इस चरण से पहले इन 12 जगहों पर कुल 50.90 करोड़ वोटर दर्ज थे। लेकिन हाल में प्रकाशित ड्राफ्ट रोल में यह संख्या घटकर अब 44.40 करोड़ रह गई। यानी 6.5 करोड़ नाम कम हो गए।
क्यों हटाए गए नाम?
चुनाव आयोग के अधिकारियों ने बताया कि हटाए गए नामों को अनुपस्थित, स्थानांतरित और मृत या डुप्लिकेट यानी 'एएसडी' कैटेगरी में डाला गया है। मतलब, ये लोग या तो मर चुके हैं, कहीं और चले गए हैं या उनकी एंट्री दो बार हो गई थी। अधिकारियों का कहना है कि शहरों में फॉर्म कलेक्शन ग्रामीण इलाकों की तुलना में बहुत कम हुआ। यानी शहरी क्षेत्रों में लोग कम सक्रिय रहे।
उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा कटौती
उत्तर प्रदेश की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट मंगलवार को जारी हुई। यहाँ पहले 15.44 करोड़ वोटर थे, लेकिन एसआईआर के बाद 2.89 करोड़ नाम हटा दिए गए। अब लिस्ट में सिर्फ 12.55 करोड़ नाम बचे हैं। यह करीब 18.70 प्रतिशत की कटौती है।
उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी नवदीप रिनवा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ये नाम मौत, स्थायी रूप से दूसरे जगह चले जाने या डुप्लिकेट एंट्री की वजह से नहीं जोड़े गए।
देश में अब तक हुए दोनों चरणों की एसआईआर ड्राफ्ट सूची से सबसे ज़्यादा नाम उत्तर प्रदेश से ही हटे हैं।
एसआईआर प्रक्रिया कब शुरू हुई?
एसआईआर का पहला चरण पिछले साल बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुआ था। इसका दूसरा चरण 12 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में 27 अक्टूबर 2025 से शुरू हुआ। इन 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 4 नवंबर से काम चला। असम में अलग से 'स्पेशल रिवीजन' प्रक्रिया चल रही है।
आखिरी बार ज्यादातर राज्यों में एसआईआर 2002 से 2004 के बीच हुई थी। बिहार में 2003 की वोटर लिस्ट को आधार बनाकर गहन रिवीजन हुआ था।एसआईआर का मुख्य उद्देश्य क्या है?
एसआईआर का सबसे बड़ा मकसद वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा बनाना है। सरकार का जोर खासकर विदेशी अवैध प्रवासियों को बाहर करने पर है, जिनका जन्म स्थान जांचा जाता है। बीजेपी का कहना है कि यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि कई राज्यों में बांग्लादेश और म्यांमार से आए अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई चल रही है। चुनाव आयोग का कहना है कि इससे वोटर लिस्ट सटीक और विश्वसनीय बनेगी।
अब आपत्तियाँ दर्ज की जा सकती हैं
ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने के बाद दावे और आपत्तियां दर्ज करने का समय है। उत्तर प्रदेश में यह 6 फरवरी तक खुला है। जिनके नाम हट गए हैं, वे सबूत देकर नाम वापस जोड़वा सकते हैं। अंतिम लिस्ट बाद में आएगी।
विपक्षी दल क्यों कर रहे हैं विरोध?
कांग्रेस, टीएमसी, समाजवादी पार्टी, शिवसेना (यूबीटी), सीपीआई जैसे विपक्षी दलों ने एसआईआर की पूरी प्रक्रिया का विरोध किया है। विपक्ष का आरोप है कि लाखों-करोड़ों वैध मतदाताओं के नाम बिना सही जांच के हटा दिए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में ड्राफ्ट रोल में 2.89 करोड़ नाम हटाए गए, जिसे विपक्ष बीजेपी की साजिश बता रहा है ताकि अल्पसंख्यक, गरीब और विपक्षी समर्थक वोटरों को वोटिंग से वंचित किया जाए।
विपक्षी दलों का आरोप है कि विशेष रूप से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों, प्रवासियों और कमजोर वर्गों के वोटरों को निशाना बनाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने इसे योग्य मतदाताओं को हटाने की साजिश बताया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। विपक्ष का आरोप है कि बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर द्वारा घर-घर सर्वे में पक्षपात किया जा रहा है और आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया जटिल है। विपक्ष का दावा है कि यह बीजेपी शासित राज्यों या आगामी चुनाव वाले राज्यों में विपक्षी वोट बैंक को कमजोर करने की कोशिश है।
बहरहाल, यह प्रक्रिया दिखाती है कि चुनाव आयोग वोटर लिस्ट को पुरानी गलतियों से मुक्त करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन कुछ जगहों पर विवाद भी हो रहे हैं। नाम हटने से लोग परेशान हैं। आयोग का कहना है कि यह सामान्य प्रक्रिया है और किसी को निशाना नहीं बनाया जा रहा। अब सभी की नजर इस पर है कि अंतिम लिस्ट में कितने बदलाव होते हैं और चुनाव कितने निष्पक्ष रहते हैं।