किसी खास समुदाय को निशाना बनाने वाले मंत्रियों को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी चेतावनी दी है। कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि उच्च संवैधानिक पद पर बैठे लोग किसी समुदाय को धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर निशाना नहीं बना सकते, क्योंकि यह संविधान के खिलाफ है। इसने साफ़ कहा है कि कोई भी व्यक्ति या समूह भाषणों, मीम्स, कार्टून या किसी भी कला के ज़रिए किसी समुदाय का अपमान या निंदा नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी खासकर असम के मुख्यमंत्री के भाषणों को लेकर हाल ही में हुए विवाद के संदर्भ में अहम है। हाल ही में सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली एक बेंच ने असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ हेट स्पीच पर एफ़आईआर की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था और पार्टियों को हाई कोर्ट भेज दिया था।

यह ताज़ा टिप्पणी जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने एक अलग जजमेंट में की है। मामला नेटफ्लिक्स की आने वाली फ़िल्म 'घूसखोर पंडत' के टाइटल को चुनौती देने वाला था। फ़िल्म के निर्देशक नीरज पांडे और प्रोड्यूसर्स ने कोर्ट में हलफनामा देकर टाइटल बदलने की बात मानी, जिसके बाद बेंच ने केस बंद कर दिया। बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस भुइयां शामिल थे। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस भुइयां ने कहा कि टाइटल बदलने के बाद फ़ैसला करने की ज़रूरत नहीं थी, लेकिन संविधान के सिद्धांतों को दोहराना जरूरी था ताकि कोई गलतफहमी न रहे।
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'बंधुत्व संविधान का बुनियादी मूल्य'

जस्टिस भुइयां ने 'बंधुत्व' को संविधान का बुनियादी मूल्य बताया है। संविधान की प्रस्तावना में बंधुत्व को महत्व दिया गया है। यह देश की एकता और सामाजिक सद्भाव के लिए बहुत जरूरी है। अनुच्छेद 51ए(ई) में हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है कि वह धर्म, भाषा और क्षेत्रीय विविधताओं से ऊपर उठकर सद्भाव और भाईचारा बढ़ाए। डॉ. आंबेडकर ने बंधुत्व को स्वतंत्रता और समानता के साथ जोड़ा था।

जस्टिस भुइयां ने लिखा, 'बंधुत्व का मतलब है एक-दूसरे के प्रति सम्मान और आदर की भावना। जाति, धर्म या भाषा के बावजूद हर नागरिक का सम्मान करना हर भारतीय का संवैधानिक धर्म है।'

कोर्ट ने साफ़ कहा,
संविधान के तहत किसी भी समुदाय की निंदा या बेइज्जती करना असंवैधानिक है। चाहे राज्य हो या कोई निजी व्यक्ति, भाषणों, मीम्स, कार्टून या विजुअल आर्ट के जरिए ऐसा नहीं किया जा सकता।
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अदालत ने कहा कि खासकर उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए यह और ज्यादा लागू होता है। कोर्ट ने कहा, 'धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर किसी समुदाय को निशाना बनाना संविधान का उल्लंघन है। यह बात उन लोगों पर ज्यादा लागू होती है जो उच्च संवैधानिक पद पर हैं और संविधान की रक्षा की शपथ ले चुके हैं।'

फ़िल्म के टाइटल पर आपत्ति

फ़िल्म 'घूसखोर पंडत' को लकर कोर्ट ने कहा कि यह टाइटल किसी खास वर्ग को बुरा दिखाने वाला लगता है। इसलिए चिंताएं जायज थीं। फिल्ममेकर्स ने टाइटल बदलने पर सहमति जताई।

अभिव्यक्ति की आजादी भी अहम

कोर्ट ने इसके साथ ही कहा कि फिल्ममेकर्स को अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी है। कला, व्यंग्य और फिल्में लोकतंत्र में अहम भूमिका निभाती हैं। इन्हें सिर्फ इसलिए दबाया नहीं जा सकता क्योंकि कुछ लोग आपत्ति जताते हैं।

कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला दिया जैसे एस. रंगराजन केस, श्रेया सिंघल केस, इमरान प्रतापगढ़ी केस और पद्मावत केस। इसने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी को विरोध या अशांति की धमकी से बंधक नहीं बनाया जा सकता।
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फिल्म को 'उचित दर्शक' के नजरिए से देखा जाना चाहिए, हाइपरसेंसिटिव लोगों के नजरिए से नहीं। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन से सर्टिफिकेट मिलने के बाद कोर्ट को आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

जस्टिस भुइयां ने इमरान प्रतापगढ़ी केस का जिक्र किया जहां कहा गया था कि 75 साल पुराना गणतंत्र इतना कमजोर नहीं होना चाहिए कि एक कविता या कॉमेडी शो से डर जाए। उन्होंने कहा कि यह बात फिल्म के टाइटल पर भी लागू होती है।

हिमंता के नफ़रती भाषण चर्चा में

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी हाल के विवादों के बीच आयी है जिसमें असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा के भाषणों पर सवाल उठ रहे हैं। इसी महीने असम बीजेपी ने एक एआई वीडियो जारी किया था, जिसमें हिमंता बिस्व सरमा एक फोटो पर गोली चलाते दिख रहे थे। निशाने पर दो आदमी थे, जिनके सिर पर स्कलकैप थी। इनमें से एक असम कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद गौरव गोगोई जैसा दिख रहा था। वीडियो में सरमा को काउबॉय की तरह कपड़े पहने और बंदूक लिए दिखाया गया। वीडियो में 'पॉइंट ब्लैंक शॉट' लिखा था और 'नो मर्सी टू बांग्लादेशी' जैसे शब्द थे। सोशल मीडिया पर भारी विरोध के बाद बीजेपी ने वीडियो हटा दिया और सोशल मीडिया टीम के एक व्यक्ति को निकाल दिया।

जब हिमंता सरमा के नफ़रती भाषण का यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था तो सीजेआई की बेंच ने उल्टे याचिका लगाने वालों को ही फटकार लगा दी। इसने हिमंता के खिलाफ 'हेट स्पीच' के आरोपों पर दाखिल याचिकाओं को खारिज कर दिया।

इसने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई कि वह सीएम के 'मियां मुस्लिम' वाले बयानों और एक विवादित बंदूक वाले वीडियो के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए हाई कोर्ट जाने के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट आया। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि कोर्ट तेजी से 'राजनीतिक लड़ाई का मैदान' बनता जा रहा है और पार्टियों से चुनावों से पहले संवैधानिक नैतिकता बनाए रखने का आग्रह किया।

कोर्ट ने कहा कि चुनाव से पहले सीधे सुप्रीम कोर्ट आने की यह आदत बढ़ रही है। इसने इसे परेशान करने वाली प्रवृत्ति बताया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पहले गुवाहाटी हाई कोर्ट जाने को कहा। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पांचोली की पीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई की थी। याचिकाकर्ता चाहते थे कि सरमा के खिलाफ पुलिस केस दर्ज हो और स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम यानी एसआईटी जाँच करे।
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हिमंता के निशाने पर मुस्लिम?

इससे पहले हिमंता हाल ही में 'मियां मुस्लिम' कहकर मुस्लिमों को निशाना बनाते रहे हैं। जनवरी 2026 में सरमा ने कहा कि 'जो कोई भी मियां को परेशान कर सकता है, करे। अगर रिक्शा का किराया 5 रुपये है तो उन्हें 4 रुपये दें। तभी वे असम छोड़ेंगे। हिमंता बिस्व सरमा और बीजेपी सीधे मियां के खिलाफ हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि 'केवल मियां को ही असम से निकाला जा रहा है।'

सरमा ने यह भी दावा किया कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के दौरान 4-5 लाख मियां वोट्स हटा दिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि मियां मुस्लिम्स को भारत में वोट नहीं करना चाहिए, बल्कि बांग्लादेश में। फरवरी 2026 में सरमा ने कहा कि असम में मुस्लिम आबादी 40% हो गई है और वे 1.5 लाख एकड़ जमीन को 'बांग्लादेशी घुसपैठियों' से खाली कराएंगे।

बहरहाल, यह फ़ैसला समाज में सद्भाव बनाए रखने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के बीच संतुलन बनाने का संदेश देता है। कोर्ट ने साफ़ किया कि सम्मान और भाईचारा संविधान का मूल है, जिसे हर कोई मानना चाहिए।