भारत और अमेरिका के बीच हुए ‘ऐतिहासिक’ ट्रेड डील पर जारी व्हाइट हाउस की फैक्टशीट में कुछ घंटों के भीतर किए गए संशोधनों ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत में ट्रेड डील का विरोध बढ़ता जा रहा है। यहां तक कि अब पीएम मोदी समर्थक भी दबी जुबान से इसकी आलोचना करने लगे हैं।
9 फरवरी को जारी फैक्टशीट में दोनों देशों के बीच हुए प्रमुख समझौतों और प्रावधानों का उल्लेख किया गया था। हालांकि 10 फरवरी को व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर उपलब्ध दस्तावेज़ में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव, संपादन और हटाए गए प्वाइंट दिखाई दिए, जो पहले वाली फैक्टशीट में मौजूद थे।

कृषि उत्पादों की सूची में बदलाव

सबसे प्रमुख बदलाव कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। पहले जारी दस्तावेज़ में कहा गया था कि भारत अमेरिका के “सभी औद्योगिक उत्पादों और खाद्य व कृषि उत्पादों की विस्तृत श्रृंखला” पर शुल्क घटाएगा या समाप्त करेगा। इस सूची में डीडीजी (Dried Distillers’ Grains), लाल ज्वार, ट्री नट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, कुछ दालें (certain pulses), सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स सहित अन्य उत्पाद शामिल थे।
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हालांकि संशोधित संस्करण में “certain pulses” यानी “कुछ दालें” शब्द हटा दिया गया है। इससे यह स्पष्ट नहीं है कि दालों पर शुल्क कटौती का प्रावधान अब भी समझौते का हिस्सा है या नहीं। यही सवाल सबसे बड़ा है। मोदी सरकार ने इस पर किसी तरह की स्थिति स्पष्ट नहीं की है।

डिजिटल सर्विस टैक्स का जिक्र हटाया गया

फैक्टशीट के पहले संस्करण में यह भी कहा गया था कि भारत “डिजिटल सर्विस टैक्स” हटाएगा। लेकिन संशोधित दस्तावेज़ में इसका कोई उल्लेख नहीं है। ध्यान देने योग्य है कि भारत ने 1 अप्रैल 2025 से डिजिटल विज्ञापन सेवाओं पर लगाए गए 6% इक्वलाइजेशन लेवी को पहले ही खत्म कर दिया था। संभव है कि इसी कारण नए दस्तावेज़ में इस प्वाइंट को शामिल नहीं किया गया हो, लेकिन आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। भारत ने डिजिटल सर्विस टैक्स पर चुप्पी साध ली है। अगर यह टैक्स अमेरिकी कंपनियों से नहीं वसूला गया तो सरकार की आमदनी पर खासा असर पड़ेगा। गूगल, अमेजन, माइक्रोसाफ्ट समेत अनगिनत कंपनियां ये टैक्स भारत को देती हैं। सरकार की आमदनी का बड़ा ज़रिया है। इस टैक्स के खत्म होने से भारत का नुकसान है। 

महत्वपूर्ण शब्द तक में बदलाव

दस्तावेज़ में एक और महत्वपूर्ण बदलाव शब्दों के चयन को लेकर है। पहले के बयान और संयुक्त वक्तव्य में कहा गया था कि भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों, विमान और उनके पुर्जों, कीमती धातुओं, प्रौद्योगिकी उत्पादों और कोकिंग कोल आदि पर 500 अरब डॉलर निवेश करने की प्रतिबद्धता (commitment) जताई है। संशोधित फैक्टशीट में यह शब्द बदलकर “intends to purchase” यानी “खरीदने का इरादा रखता है” कर दिया गया है।
नए संस्करण में कहा गया है कि “भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों, विमान और उनके पुर्जों, कीमती धातुओं, प्रौद्योगिकी उत्पादों और कोकिंग कोल आदि की 500 अरब डॉलर की खरीद करने का इरादा रखता है।” विशेषज्ञों का मानना है कि ‘प्रतिबद्धता’ और ‘इरादा’ जैसे शब्दों के बीच कानूनी और नीतिगत रूप से बड़ा अंतर होता है। इससे समझौते की बाध्यकारी प्रकृति को लेकर सवाल उठ सकते हैं।

पिक्चर अभी बाकी है, दोस्त

व्हाइट हाउस की ओर से इन बदलावों पर आधिकारिक रूप से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है। दस्तावेज़ में किए गए संशोधन, कुछ बिंदुओं की चुपचाप हटाई गई पंक्तियां और शब्दों में बदलाव इस बात की ओर संकेत करते हैं कि समझौते के अंतिम स्वरूप को लेकर अभी भी कुछ पहलुओं पर स्पष्टता बाकी है।
भारत और अमेरिका दोनों सरकारों की ओर से आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विस्तृत बयान की उम्मीद की जा रही है। फिलहाल, फैक्टशीट में हुए इन बदलावों ने व्यापार समझौते की शर्तों और उसकी वास्तविक बाध्यताओं पर नई बहस छेड़ दी है।

भारत में ट्रेड डील का विरोध बढ़ रहा है

किसान संगठनों, बैंक कर्मियों, नागरिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों ने 12 फरवरी को ट्रेड डील के विरोध में हड़ताल का आह्वान किया है। इस आह्वान को विपक्षी दलों ने समर्थन दे दिया है। कांग्रेस के संचार प्रभारी, सांसद जयराम रमेश ने बुधवार को महत्वपूर्ण बात कही। रमेश ने एक्स पर लिखा है कि कई स्वतंत्र विश्लेषकों और टिप्पणीकारों ने, जो मोदी के विरोधी नहीं रहे हैं, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की आलोचना करते हुए इसे आत्मसमर्पण, असमान प्रतिबद्धताओं का समूह, देशद्रोह और अपमानजनक आत्मसमर्पण बताया है। प्रधानमंत्री और उनके झूठ के समर्थकों द्वारा चाहे जो भी प्रचार किया जाए, कड़वी सच्चाई यह है कि अमेरिका ने भारत से जितना दिया है, उससे कहीं अधिक हासिल किया है। यह सब मोदी द्वारा राष्ट्रपति ट्रम्प को लुभाने के आक्रामक प्रयासों के बावजूद हुआ है, जिसमें सितंबर 2019 में उनके लिए प्रचार करना भी शामिल है। वे फरवरी 2025 में पुन: निर्वाचित राष्ट्रपति ट्रम्प का स्वागत करने वाले पहले लोगों में भी शामिल थे। 
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रमेश ने लिखा है- प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ अपनी व्यक्तिगत मित्रता के सार्वजनिक प्रदर्शन से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी मोदी के साथ अपनी मित्रता को खुलकर व्यक्त किया है, लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने भारत को बड़ा झटका दिया है। यह हमारी राजनीतिक कूटनीति और आर्थिक कूटनीति की घोर विफलता है। प्रचार तो जारी रहेगा ही। लेकिन तथ्य तो तथ्य ही होते हैं। यह व्यापार समझौता प्रधानमंत्री के वाशिंगटन स्थित अच्छे दोस्त द्वारा किया गया एक बड़ा सौदा है, जिसने लगभग सौ बार यह दावा किया है कि उसने 10 मई, 2025 को ऑपरेशन सिंदूर को रोक दिया था।