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बजट : किसानों का महत्व सिर्फ़ सस्ते खाद्यान्न और वोट बैंक तक?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक बार फिर किसानों का पेट वादों की ख़ालिस इकोनॉमिक्स से भर दिया है। अर्थव्यवस्था के हालात को देखते हुए सभी को उम्मीद थी कि ग्रामीण इलाकों में माँग पैदा करने के लिए ही सही, सरकार कुछ ऐसे फ़ैसले लेगी जिससे अर्थव्यवस्था के साथ-साथ किसानों की स्थिति में भी सुधार आएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किसानों की आय को दोगुना करने के लिए तय की गई समय सीमा यानी 2022 में अब केवल 2 साल ही बाकी हैं। लेकिन इस दिशा में कोई विशेष प्रगति अभी तक देखने को नहीं मिली है।
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सस्ती थाली किसका पेट काट कर?

किसानों को संपन्न बनाने के लिए पिछले 6 साल से जिस तरह के वादे और इरादे हवाओं में गूंज रहे थे, वह इस बार की ‘थालीनॉमिक्स’ ने पूरी तरह ख़त्म कर दिए हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में इस थालीनॉमिक्स की चर्चा बड़ी उपलब्धि के रूप में की गई है।
यह नहीं बताया गया कि इस सस्ती थाली का सारा बोझ केवल किसान ही अपना निवाला काटकर उठा रहा है। खरीदने वालों को थाली ज़रूर सस्ती मिली, लेकिन किसानों की हालत दिन पर दिन बदतर होती जा रही है।

सब्सिडी में कटौती

वित्त मंत्री ने कृषि, सिंचाई और संबंधित गतिविधियों के लिये 1.60 लाख करोड़ रुपये और ग्रामीण विकास और पंचायती राज के लिए 1.23 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की है। 2019 के बजट में कुल बजट प्रावधान का 9.6 प्रतिशत कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र के लिए किया गया था और इस बार यह घटकर 9.3% रह गया है। इसके अलावा खाद्य सुरक्षा सब्सिडी को 184220 करोड़ रुपये से घटाकर 15569.68 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
सरकार ने पिछले वर्ष की आवंटित राशि में से 108688.35 करोड़ रुपये ही खर्च किये हैं। इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने की भारतीय खाद्य निगम की क्षमता प्रभावित होगी। 
सरकार ने उर्वरक सब्सिडी को 79997.85 करोड़ रुपये से घटाकर 71309.00 करोड़ रुपये कर दिया है। इसका कारण किसानों को जैविक खेती की दिशा में प्रेरित करना बताया गया है।
किसान सम्मान निधि के लिए पिछले साल 75 हजार  करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की गई थी। जिसमें से अभी तक केवल 54370 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके हैं। इसके बावजूद इस साल भी इस मद में 75 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
खबरें आ रही थीं कि कृषि मंत्रालय इस बार केवल 48 हजार करोड़ रुपये की माँग करने वाला था, लेकिन इससे पैदा होने वाली नाराज़गी को देखते हुए इस मद में फिर 75 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान ही रहने दिया गया है। जिस तरह से इस योजना से किसानों की संख्या घट गई है, उसे देखते हुए लगता नहीं है कि इस बार 30 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो पाएंगे। 

किसान सम्मान निधि की किस्त नहीं

किसान सम्मान निधि योजना में जिस तरह से लाभार्थियों की संख्या घटती जा रही है, उससे साफ़ है कि सरकार के पास किसानों की स्थिति से जुड़े सही आँकड़ों का अभाव है। देश में कुल 8,35,99,222  किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की पहली किस्त मिली थी।
30 जनवरी 2020 तक केवल 30138567 किसानों को ही किसान सम्मान निधि की चौथी किस्त मिली है। देश के 14.50 करोड़ किसानों में से केवल तीन करोड़ से कुछ अधिक ही इस समय किसान सम्मान निधि के लाभकारी हैं। इससे साफ पता लगता है कि सरकार किसानों के लिए क्या कुछ करना चाहती है।
 खबरें तो ये भी हैं कि इस व्यवस्था में कुछ ऐसे लोगों को भी पैसे गए हैं, जो किसान नहीं हैं। अब सरकार उनसे पैसे वापस लेने के लिए कसरत करने जा रही है।

पशुपालन-मछलीपालन के पैसे?

वित्त मंत्री ने कृषि से जुड़े पशुपालन व्यवसाय के बारे में लच्छेदार बातें तो कीं, लेकिन पूरे देश के लिए केवल 3 हज़ार करोड़ रुपये का बजट उनकी गंभीरता को साफ दिखाता है। इसी तरह मछली पालन के बारे में  वादे और इरादे सब हैं, लेकिन खर्च कहाँ से होगा इस पर चुप्पी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा पर पिछले साल 60 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। लेकिन अब तक उस पर 71 हजार करोड़ रुपये खर्च हो गए हैं। इसके बावजूद 2020 के बजट में केवल 61500 करोड़ रुपये मनरेगा को आवंटित किए गए।

किसानों को उचित मूल्य दिलाने के लिए बाज़ार हस्तक्षेप योजना और मूल्य समर्थन योजना (एमआईएस-पीएसएस) के लिए 2019 में 3 हज़ार करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। जिसमें केवल 2010 करोड़ रुपये खर्च किए जा सके।
 इस बार इस मद में केवल 2 हज़ार करोड़ रुपये का आवंटन किया गया। फसल बीमा योजना के लिए 15,695 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया। जिसमें केवल 23% किसान ही जुड़े हैं।

आवंटित पैसे भी खर्च नहीं

कृषि क्षेत्र में कम धन का आवंटन होना ही केवल कृषि की दुर्दशा का एकमात्र कारण नहीं है। सरकार जो पैसा पिछले बजट में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आवंटित किया था, उसे भी पूरा खर्च नहीं किया। पिछले बजट की केवल खाद्य सब्सिडी, किसान सम्मान निधि और बाजार हस्तक्षेप योजना की मदों से ही सरकार ने एक लाख करोड़ रुपये खर्च नहीं किया। 
सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जो प्रावधान किया था उसका एक तिहाई कम खर्च किया। ग्रामीण क्षेत्रों में माँग घटने के पीछे यह कटौती भी एक बड़ा कारण हो सकती है।

आँकड़ों की बाजीगरी

आलोचना के भय से कृषि की कुछ मदों में आँकड़ों की बाजीगरी पहले भी होती थी। उर्वरक सब्सिडी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उर्वरक सब्सिडी का तकरीबन आधा आवंटन जो करीब 40 हजार करोड़ रुपये होता है, हर बार अगले साल के लिए बचा रहता है। जबकि किसानों को उर्वरक सब्सिडी देने पर भारी होहल्ला मचता रहा है।
इस बार किसान सम्मान निधि पूरी खर्च नहीं की गई लेकिन उसे फिर 75 हजार करोड़ रुपये का आवंटन कर दिया गया है। अब अगर केवल तीन करोड़ किसानों को ही सम्मान निधि मिली है तो जाहिर सी बात है कि इस बार केवल 25 से 30 हजार करोड़ रुपये का ही खर्च आएगा। बाकी पैसा बिना खर्च हुए बचा रह जाएगा।
दूसरे और करों से अनुमान से कम आय होने के बावजूद सरकार ने कॉरपोरेट घरानों को 147 हजार करोड़ रुपये की कर राहत दी। इससे साफ है कि सरकार की प्राथमिकता में उद्योग पहले और कृषि अंतिम पायदान पर है। कृषि का महत्व केवल सस्ते खाद्यान्नों की उपलब्धता तक और किसानों का महत्व केवल वोट बैंक होने तक ही है।

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राकेश सिंह
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