पीएम मोदी ने हैदराबाद में 10 मई को भाषण दिया और जनता को ढेरों नसीहतें दे डालीं। सोमवार को शेयर बाजार खुला और धड़ाम हो गया। भारत का विपक्ष कह रहा है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां नाकाम साबित हो रही हैं। इस संबंध में आई एक आर्थिक रिपोर्ट भी विपक्ष के आरोपों की पुष्टि कर रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की हिस्सेदारी अप्रैल 2016 के 19.9% से घटकर अप्रैल 2026 में 14.7% पर आ गई है, जो जून 2012 के बाद का सबसे निचला स्तर है।

मोदी का बयान और आर्थिक हालात से संबंध

मोदी ने रविवार को हैदराबाद में कहा कि मिडिल ईस्ट संकट यानी ईरान अमेरिका तनाव/ईरान अमेरिका युद्ध की वजह से कोविड 19 जैसी स्थितियां बन रही हैं। जिस तरह कोविड के दौरान हम लोग नए तरीके से रहना सीख गए थे। उसी तरह अब भी सीखना होगा। हमें वर्क फ्रॉम होम पर जोर देना चाहिए। हमें ईंधन (पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, पीएनजी) बचाने के तरीके तलाशने होंगे। विदेश यात्रा न करें। एक साल तक गोल्ड न खरीदें। विदेशों में शादियां टाल दें। पीएम मोदी की इस नसीहत में दो खास बातें हैं। पहला तो यह कि भारत के आर्थिक हालात के लिए ईरान युद्ध जिम्मेदार है। यानी सरकार खराब आर्थिक हालत के लिए जिम्मेदार नहीं है। दूसरा जनता अगर सरकार के साथ कोविड 19 जैसा सहयोग नहीं करती है तो वो भी आने वाली खराब आर्थिक स्थिति के लिए जिम्मेदार होगी। 

घरेलू निवेशक कैसे संभाल पाएंगे भारत की आर्थिक स्थिति

रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 18.9% पर पहुँच गई है। DII ने उन 41 में से 39 Nifty शेयरों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई, जहाँ FII ने बिकवाली की।यानी हर FII की निकासी पर DII खरीदार बना। लेकिन पिछले तीन वर्षों में Nifty-50 के 50 में से 41 शेयरों में FII की बिकवाली देखी गई। बाजार विशेषज्ञ यह सवाल उठाने लगे हैं कि अगर FII की बिकवाली और तेज होती है, तो क्या DII यानी घरेलू निवेशकों के पास इतनी क्षमता होगी कि वे बाजार को संभाल सकें?

निजी निवेश भी नहीं बढ़ रहा, सरकार की अपनी चिंता

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अक्सर सार्वजनिक तौर पर हैरानी जता चुकी हैं कि निजी कंपनियां निवेश करने के लिए इतनी अनिच्छुक क्यों दिखती हैं। उन्होंने बार-बार कहा है कि सरकार ने टैक्स कम किए हैं, बैंकों की बैलेंस शीट साफ की गई, बुनियादी ढांचे पर सरकारी पैसा खर्च किया है। फिर भी वित्त वर्ष 2023-24 तक देश में कुल निवेश घटकर एक दशक के सबसे निचले स्तर पर आ गया। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 में भारत से नेट FDI आउटफ्लो दर्ज हुआ। यानी देश में पैसा आने से ज्यादा पैसा बाहर गया।
सरकार और उसके समर्थक इस गिरावट के लिए ईरान युद्ध, खाड़ी संकट और वैश्विक अस्थिरता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। निश्चित रूप से पश्चिम एशिया में तनाव का असर तेल कीमतों और बाजारों पर पड़ता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ यही वजह है? अगर ऐसा होता, तो भारत से पूंजी निकासी इतनी लंबी और लगातार क्यों होती? असल समस्या यह है कि भारत में निजी निवेश की रफ्तार कमजोर हुई है, उपभोग घटा है, बेरोजगारी और आय संकट ने बाजार की मांग को प्रभावित किया है और उद्योग जगत भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं दिख रहा।

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की सबसे बड़ी विफलता यह रही कि उसने प्रचार को वास्तविक आर्थिक सुधारों का विकल्प बना दिया। “मेक इन इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया”, “आत्मनिर्भर भारत” और “विश्वगुरु अर्थव्यवस्था” जैसे नारों के बावजूद इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र उम्मीद के मुताबिक रोजगार और निवेश नहीं ला पाया। छोटे और मध्यम उद्योग नोटबंदी, जीएसटी की जटिलताओं और लगातार बढ़ती लागत से उबर नहीं सके।

विदेशी निवेशकों के पलायन के पीछे केवल वैश्विक संकट नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक अनिश्चितता भी है। निवेशक केवल राजनीतिक स्थिरता नहीं देखते, बल्कि वे नीति की विश्वसनीयता, न्यायिक पारदर्शिता, कर ढांचे की स्थिरता, मांग की स्थिति और संस्थागत भरोसे को भी महत्व देते हैं। कई विश्लेषकों ने यह भी कहा है कि भारत में व्यापार करना अभी भी जटिल है और नीतिगत अनिश्चितता विदेशी निवेशकों को सतर्क बना रही है।
सरकार फिलहाल ईरान युद्ध और वैश्विक परिस्थितियों को ढाल बना रही है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि किसी भी अर्थव्यवस्था की असली ताकत उसका घरेलू निवेश माहौल, रोजगार सृजन और उपभोक्ता विश्वास होता है। यदि इन क्षेत्रों में सुधार नहीं हुआ, तो “विश्वगुरु अर्थव्यवस्था” का दावा केवल राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।

देश आर्थिक संकट मेंः विपक्ष  

कांग्रेस पार्टी ने मोदी की सलाह पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस ने एक्स पर लिखा है- नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। देश आर्थिक संकट से गुजर रहा है। वहीं, आने वाला वक्त और कठिन होगा। चुनाव की वजह से मोदी ने समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए। अब चुनाव बाद सारी जिम्मेदारी जनता पर थोप कर खुद मजे कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि सारा बोझ जनता उठाए, ये बस 'प्रचारमंत्री' बने यहां-वहां घूमते रहें।

नेता विपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि ये सब मोदी के उपदेश नहीं- ये नाकामी के सबूत हैं। 12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है - क्या ख़रीदे, क्या न ख़रीदे, कहां जाए, कहां न जाए। हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें। देश चलाना अब Compromised PM के बस की बात नहीं।

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमला करते हुए कहा कि अगर आपने मोदी जी की मँहगाई बर्दाश्त नहीं की तो अंधभक्त और गोदी मीडिया आपको पाकिस्तानी घोषित कर देगा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि इतनी सारी पाबंदियां लगानी पड़ीं तो ‘पांच ट्रिलियन डॉलर की जुमलाई अर्थव्यवस्था’ कैसे बनेगी? लगता है भाजपा सरकार के हाथ से लगाम पूरी तरह छूट गयी है। डॉलर आसमान छू रहा है और देश का रुपया पातालोन्मुखी हो गया है।
टीएमसी सांसद साकेत गोखले ने पूछा कि क्या भारत विदेशी मुद्रा संकट या भुगतान संतुलन संकट की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने पूछा, "अगर मंत्री एयर फोर्स के विमानों से उड़ान भरते रहेंगे और बड़े काफिलों में यात्रा करेंगे, तो सिर्फ नागरिकों से ही बलिदान क्यों मांगा जा रहा है?" उन्होंने चुनावों के बाद इस घोषणा के समय पर भी सवाल उठाया।

गोल्ड नहीं मामला कुछ और है 

पीएम मोदी की गोल्ड नहीं खरीदने की अपील भी काफी गंभीर है। इसका मतलब यह है कि भारत के पास जो गोल्ड रिजर्व है, उस पर भी खतरा मंडरा रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार को वरिष्ठ अनुसंधान विश्लेषक (कमॉडिटीज) देवेया गगलानी ने बताया कि "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोने की खपत कम करने की हालिया अपील का मुख्य उद्देश्य भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाना है। भारत गोल्ड के सबसे बड़े आयातकों में से एक है, और अधिक आयात से डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव पड़ता है। इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर तनाव बढ़ता है। हालांकि, मौदी के बयान से गोल्ड की कीमतों पर बड़ा प्रभाव नहीं पड़ने जा रहा है, क्योंकि गोल्ड की कीमत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय होती है।"
भारत के कुल आयात बिल पर नज़र डालिए: वित्त वर्ष 2026 में कुल आयात बिल: 775 अरब डॉलर था। जिसमें चार वस्तुओं की लागत ही 240 अरब डॉलर से अधिक थी। जिसमें शामिल है- कच्चा तेल: 134.7 अरब डॉलर, गोल्डः 72 अरब डॉलर, वनस्पति तेल: 19.5 अरब डॉलर और उर्वरक (खाद): 14.5 अरब डॉलर
  • ये चार वस्तुएं भारत के कुल आयात का 31.1 प्रतिशत हैं।
  • गोल्ड कुल आयात बिल का लगभग 10 प्रतिशत है।
बहरहाल, मोदी सरकार ने अनजाने में ही देश की आर्थिक हालात की वजह से बन रहे संकट का संकेत कर दिया है। चुनाव के दौरान नेता विपक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि पांच राज्यों में चुनाव के बाद सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा देगी। एलपीजी के दाम तो खैर लगातार बढ़ ही रहे हैं। वो स्थिति अब आ पहुंची है। लगता यही है कि ग्लोबल संकट बताकर सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा देगी। महंगाई और भी आसमान पर पहुंच जाएगी। गरीब और मजदूर तबके के लोगों को 5 किलो वाला एलपीजी गैस सिलेंजर 800 से 1000 रुपये में मिल रहा है। इसी वजह से बड़े शहरों से यह वर्ग अपने घरों को लौट गया है।