अमेरिका को पछाड़कर चीन वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है। इस दौरान भारत-चीन के बीच कुल व्यापार 151.1 अरब डॉलर पहुंच गया। लेकिन इस खबर में खुशी के साथ चिंता भी जुड़ी हुई है, क्योंकि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। चीन के साथ व्यापार घाटा यानी ट्रेड डेफिसिट बढ़कर रिकॉर्ड 112.16 अरब डॉलर यानी क़रीब 9.5 लाख करोड़ रुपये हो गया।
2021-22 से 2024-25 यानी पिछले चार साल तक अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था। लेकिन अब चीन ने इस जगह पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले चीन 2013-14 से 2017-18 तक और 2020-21 में भी भारत का टॉप ट्रेडिंग पार्टनर रहा था।
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चीन के साथ व्यापार

  • भारत का चीन को निर्यात: 19.47 अरब डॉलर है। इसमें 36.66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
  • भारत का चीन से आयात: 131.63 अरब डॉलर है। इसमें 16 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
  • व्यापार घाटा: 112.16 अरब डॉलर है। पिछले साल 99.2 अरब डॉलर था।
इसका साफ़ मतलब है कि भारत चीन से बहुत ज़्यादा सामान खरीदता है, लेकिन चीन को उतना सामान नहीं बेच पाता। इससे घाटा लगातार बढ़ रहा है। चीन से आयात में बढ़ोतरी का मतलब है कि भारत अभी भी इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, खिलौने, मोबाइल पार्ट्स जैसी बहुत-सी चीजें चीन पर निर्भर है।

अमेरिका के साथ व्यापार की स्थिति

  • भारत का अमेरिका को निर्यात: 87.3 अरब डॉलर है। इसमें सिर्फ 0.92 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी हुई है।
  • भारत का अमेरिका से आयात: 52.9 अरब डॉलर है। इसमें 15.95 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
  • ट्रेड सरप्लस: 34.4 अरब डॉलर है। यह पिछले साल 40.89 अरब डॉलर था।
इसका मतलब है कि अमेरिका के साथ व्यापार में भारत को अभी भी फायदा है, लेकिन यह फायदा पिछले साल की तुलना में कम हो गया है।
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अन्य देशों के साथ भारत का व्यापार

वित्तीय वर्ष 2025-26 में कई बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ भारत का निर्यात घटा। इनमें नीदरलैंड, ब्रिटेन, सिंगापुर, बांग्लादेश, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और मलेशिया शामिल हैं। दूसरी ओर कुछ देशों को निर्यात बढ़ा भी है। इनमें शामिल हैं- संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी, हांगकांग, इटली, नेपाल, ब्राजील, स्पेन, बेल्जियम और वियतनाम। आयात के मामले में रूस, इराक, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, कतर और ताइवान से आयात घटा। जबकि यूएई, सऊदी अरब, हांगकांग, स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, जापान, कोरिया, जर्मनी, थाईलैंड और मलेशिया से आयात बढ़ा।

फायदा और नुकसान को समझें

भारत के पक्ष में-
  • चीन को निर्यात 36% बढ़ना अच्छा संकेत है। भारतीय कंपनियां कुछ इंजीनियरिंग गुड्स जैसे कुछ सामान चीन भेजने में सफल हो रही हैं।
  • कुल व्यापार बढ़ना दिखाता है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियां बढ़ रही हैं।
  • अमेरिका अभी भी भारत के लिए बड़ा निर्यात बाजार है, जहां भारतीय टेक्सटाइल, फार्मा, ज्वेलरी आदि बिकते हैं।
भारत के लिए चिंताएं-
  • बड़ा घाटा: हर साल 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का पैसा चीन को चला जा रहा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बोझ है।
  • निर्भरता: भारत अभी भी कई जरूरी चीजों के लिए चीन पर निर्भर है। यदि कोई तनाव या सप्लाई समस्या हुई तो परेशानी हो सकती है।
  • आत्मनिर्भरता की चुनौती: सरकार PLI स्कीम, मेक इन इंडिया और चाइना प्लस वन नीति चला रही है ताकि उत्पादन भारत में बढ़े और चीन से कम आयात हो। लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि अभी यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं।
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सरकार क्या कर रही है?

सरकार चीन से आयात कम करने और भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठा रही है।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, फार्मास्यूटिकल्स आदि में घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है।
  • फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी एफ़टीए पर काम कर रही है। हाल में यूके, यूरोपीय संघ के साथ एफटीए हुआ है।
  • क्वालिटी कंट्रोल और एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाकर सस्ते चाइनीज सामान पर रोक लगा रही है।

आगे क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत अपनी मैन्युफैक्चरिंग मजबूत कर ले और निर्यात को और बढ़ावा दे, तो घाटा कम किया जा सकता है। लेकिन चीन जैसा बड़ा और सस्ता उत्पादक देश होने के कारण यह आसान नहीं है। साथ ही, अमेरिका के साथ व्यापार पर भी नजर रखनी होगी, क्योंकि वहां टैरिफ और नीतियां बदल रही हैं।

चीन का टॉप पर आना व्यापार की बढ़ती गतिविधि दिखाता है, लेकिन रिकॉर्ड घाटा याद दिलाता है कि मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता और संतुलन जरूरी है। भारत को अब निर्यात बढ़ाने और जरूरी आयात को कम करने पर और तेजी से काम करना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था मज़बूत और आत्मनिर्भर बने।