भारतीय शेयर मार्केट सोमवार 23 मार्च को बुरी तरह लुढ़क गया। रुपया लगातार गिर रहा है और भारतीय जिस गोल्ड निवेश में सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करते थे, वो भी पूरी दुनिया में 8 फीसदी तक गिर चुका है। यह सब ईरान युद्ध की देन है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार को संसद में देश को भरोसा देने की कोशिश की- भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत है। इसे कोरोना की तरह निपटा लिया जाएगा। लेकिन लोगों का भरोसा टूट रहा है। 
  • हालांकि इस रिपोर्ट के लिखे जाने के समय यूएस राष्ट्रपति ट्रंप की यह घोषणा सामने आ चुकी है कि अमेरिका अब पांच दिनों तक ईरान पर हमले नहीं करेगा। यह अमेरिका के स्टैंड में बड़ा बदलाव है और हो सकता है कि मार्केट में मंगलवार से सुधार दिखे।
युद्ध शुरू होने के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय इक्विटी से 5.73 अरब डॉलर निकाल लिए। मार्च में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में करीब 8% की गिरावट आई। 9 मार्च को अकेले एक दिन में सेंसेक्स में करीब 2300 अंक की गिरावट आई थी और बाजार से 12.78 ट्रिलियन रुपये की पूंजी मिट गई। कुल मिलाकर युद्ध के शुरुआती हफ्तों में ही इस वजह से 30 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ।
20 मार्च को सेंसेक्स 74,533 पर बंद हुआ (326 अंक की बढ़त के साथ) था जबकि निफ्टी 23,114 पर (112 अंक ऊपर)। लेकिन युद्ध से पहले के स्तरों (सेंसेक्स ~81,000 के आसपास) से अब भी 4-8% नीचे है। तेल की कीमतें 100-110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से एयरलाइंस, पेंट, टायर और ऑटो सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुए। घरेलू निवेशक (म्यूचुअल फंड) ने कुछ समर्थन दिया, लेकिन कुल मिलाकर बाजार करप्शन में चला गया। 

युद्ध के 24वें दिन भारतीय निवेशकों को 14 लाख करोड़ का झटका

होर्मुज समुद्री रास्ते को लेकर यूएस राष्ट्रपति ट्रंप की धमकी और ईरान की जवाबी धमकी से 23 मार्च को बाजार की हालत फिर खराब हुई। 23 मार्च को सेंसेक्स 1,837 अंक या 2.46% गिरकर 72,696 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 602 अंक या 2.6% गिरकर 22,512 पर आ गया। बीएसई 150 मिडकैप और बीएसई 250 स्मॉलकैप सूचकांकों में 4% की गिरावट दर्ज की गई। बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण शुक्रवार के 429 लाख करोड़ रुपये से घटकर 415 लाख करोड़ रुपये हो जाने के कारण निवेशकों को एक ही सत्र में लगभग 14 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
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रुपया क्यों गिर रहा है

सोमवार 23 मार्च को भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। इससे एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बढ़ गया है। रुपया एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 93.98 पर आ गया, जो शुक्रवार को दर्ज किए गए अपने पिछले निचले स्तर 93.7350 से भी नीचे है। स्थानीय स्पॉट ट्रेडिंग सत्र दोपहर 3:30 बजे (भारतीय समयानुसार) समाप्त होने के बाद इंटरबैंक ऑर्डर मैचिंग सिस्टम पर यह 94 डॉलर प्रति डॉलर के निशान से भी नीचे गिर गया।

ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से भारतीय रुपये में लगभग 3% की गिरावट आई है। विश्लेषकों का मानना ​​है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो रुपये और अन्य एशियाई मुद्राओं को और भी अधिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

  • पीएम मोदी 2024 में भारत के प्रधानमंत्री बने। 2023 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। डॉ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। उस समय एक डॉलर के मुकाबले रुपया 64 पर था। लेकिन उस समय मोदी रुपये के गिरने पर बार-बार मनमोहन सिंह, कांग्रेस पर हमला करते थे। 
  • उनके उस समय के मशहूर जुमलों में था- ये रुपया नहीं गिर रहा, भारत का इकबाल गिर रहा है। फिर वो कहते थे- रुपया आईसीयू में चला गया है। उन्होंने यह तक कहा था कि- कांग्रेस के भ्रष्टाचार के कारण रुपया गिर रहा है। आज मोदी से यह सवाल पूछने वाला कोई नहीं है, जब एक डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 94 पर पहुंच गया है।

भारत में गोल्ड भी टूटा, दिल भी टूटा

किसी भी युद्ध या संकट में गोल्ड सबसे सुरक्षित और “सेफ हेवन” माना जाता है। इसी वजह से उसकी कीमतें तेजी से बढ़ती हैं। लेकिन इसके उलट इस युद्ध में गोल्ड अपेक्षित उछाल नहीं दिखा पाया। ईरान युद्ध के बाद से गोल्ड की कीमत लगभग 18% (करीब ₹29,000 प्रति 10 ग्राम) गिर गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी गोल्ड अपनी ऊंचाई से करीब 20–23% तक टूटकर बेयर-मार्केट के करीब पहुंच गया। युद्ध से पहले 24-कैरेट गोल्ड ₹1,62,490 से बढ़कर ₹1,73,090 प्रति 10 ग्राम (लगभग 6% उछाल) हो गया था, लेकिन उसके बाद इसने लगातार गिरावट की और युद्ध शुरू होने के एक हफ्ते के अंदर लोग प्रॉफिट-बुक कर गोल्ड बेचकर निकल गए।

गोल्ड कमज़ोर क्यों हुआ

  • ऊंची ब्याज दरें- बिना ब्याज वाले एसेट के रूप में सोना कम आकर्षक
  • डॉलर की मजबूती और महंगा तेल
  • निवेशकों का कैश या डेरिवेटिव हेजिंग की ओर रुख
  • पहले की तेज रैली के बाद प्रॉफिट बुकिंग
इसने सोने की पारंपरिक “सुरक्षित निवेश” छवि को कमजोर कर दिया।
वैश्विक स्तर पर भी इस युद्ध को ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा संकट बताया गया है। आपूर्ति बाधित होने से कई देशों में मुद्रास्फीति और मंदी का खतरा बढ़ा है। 
भारत पर संभावित प्रभाव: 
  • ऊर्जा संकट: तेल आपूर्ति बाधित होने का जोखिम महंगाई का खतरा: ईंधन, परिवहन और खाद्य कीमतों पर असर 
  • रोजगार और रेमिटेंस: पश्चिम एशिया से भारतीयों की वापसी से आय में कमी 
  • बाजार अस्थिरता: Nifty-Midcap लगभग 9% तक गिर चुके हैं, जबकि Auto और Realty सेक्टर में करीब 15% तक करेक्शन देखा गया है।
ईरान युद्ध ने भारत के शेयर बाजार, सोने और अर्थव्यवस्था को एकसाथ प्रभावित किया है। जहां शेयर बाजार में तेज गिरावट और विदेशी निवेश की निकासी देखी जा रही है, वहीं इस बार सोना भी पारंपरिक सुरक्षित निवेश साबित नहीं हुआ। तेल कीमतों का झटका भारत की महंगाई, मुद्रा और विकास दर के लिए सबसे बड़ा जोखिम बनकर उभर रहा है।