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माँग घटने से अर्थव्यवस्था बदहाल, मारुति के कारखानों में दो दिन उत्पादन नहीं

कार बनाने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी मारुति सुज़ुकी ने 7 और 9 सितंबर को मानेसर और गुड़गाँव संयंत्रों में उत्पादन नहीं करने का फ़ैसला किया है। कर्मचारी काम पर आएंगे, उन्हें उस दिन के  पैसे भी मिलेंगे, पर वे उत्पादन से जुड़ा कोई काम नहीं करेंगे। क्यों भला? कंपनी का प्रबंधन नहीं चाहता है कि उत्पादन बढ़ाया जाए। इसकी वजह यह है कि कंपनी के पास पहले से ही बहुत सारी अनबिकी गाड़ियाँ पड़ी हुई हैं, जिन्हे कोई खरीदने वाला नहीं है। 
मारुति की बिक्री अगस्त में घट कर 1,06,413 हो गईं, जो उसके पिछले महीने की बिक्री से एक तिहाई कम थी। कंपनी ने इसी अनुपात में उत्पादन में भी कटौती कर दी। कंपनी ने अब तय किया है कि वह अपना मासिक उत्पादन एक तिहाई कम कर देगी। 
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ऑटो उद्योग में गाड़ी बनाने वालों और उनसे जुड़े दूसरे उद्योग में 3,50,000 लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है।

दूसरे क्षेत्रों पर भी असर

इस मंदी ने मनेसर, गुड़गाँव और उसके आसपास के लोगों की जिंदगी बदल दी है, वहाँ की स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। ऐसे लोग भी प्रभावित हुए हैं, जिन्हें मारुति या मोटर उद्योग से कुछ लेना-देना नहीं है। मंदी ने लोगों की क्रय शक्ति को प्रभावित किया है। इसका नतीजा यह है कि उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री कम हुई है और उसका असर हिन्दुस्तान यूनीलीवर, कॉलगेट-पामोलिव और डाबर इंडिया जैसी कंपनियों पर भी पड़ा है। 
हालत इतनी बुरी है कि चाय दुकान और केश काटने वाले नाई तक परेशान हैं। इस मुद्दे पर मानेसर के पास के एक गाँव में दुकान चलाने वाले राहुल जैन ने अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेन्सी रॉयटर्स के संवाददाता से कहा, 'गाँव में वैसे भी नौकरी करने वालों की तादाद कम हो गई है, जिनके पास नौकरी है, वे भी खर्च करने से कतरा रहे हैं ताकि वे आने वाले समय के लिए पैसे बचा सकें।'

चाय वाला, नाई भी परेशान

इसी तरह मनेसर के पास अलियार गाँव में जूते बनाने वाले सुभय सिंह ने कहा, 'मेरी मासिक आमदनी आधी हो गई, पहले मैं महीने में 8 हज़ार रुपये कमा लेता था। पता नहीं आगे क्या होगा।'
कार बनाने वाली कंपनियों के संगठन सोसाइटी ऑफ़ ऑटमोबाइल मैन्युफ़ैक्चरर्स (एसएआईएम यानी सियाम) ने आशंका जताई है कि उद्योग में मंदी रोकने के लिए जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो लगभग 10 लाख लोगों की नौकरी जा सकती है। 

नाकाफ़ी हैं सरकारी कदम

हालाँकि सरकार ने ऑटो उद्योग की मदद के लिए कुछ फ़ैसलों की घोषणाएँ की हैं, पर वे नाकाफ़ी हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि सरकार यदि नई गाड़ियाँ खरीदेगी भी तो कितनी? इसी तरह अगले साल मार्च तक जिन गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन होगा वे पूरी मियाद यानी 15 साल तक वैध रहेंगी, यह एलान हुआ, पर सवाल यह है कि मार्च तक कितनी गाड़ियाँ बिकेंगी और उन्हें कौन खरीदेगा? 
मानेसर, गुड़गाँव, पुणे और जमशैदपुर जैसी जगहों पर कर्मचारीयों की कॉलोनियों के आस पास सैकड़ों दुकानें होती हैं, छोटे- मोट उद्योग धंधे होते हैं, जो उन कर्मचारियों के बल पर ही चलते हैं। सवाल यह है कि इन लोगों का क्या होगा? ऑटो उद्योग की मंदी की चर्चा होती भी है तो उन लोगों की चर्चा नहीं होती है, जो उनसे जुड़े नहीं होते, पर उन पर निर्भर होते हैं।

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