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नामवर सिंह... मुझे ज़माने से कुछ भी तो शिकवा नहीं

एक हिंदी प्रेमी होने के नाते मैं यह बात गर्व से कह सकता हूँ कि मैंने हिंदी आलोचना के किंवदंती डॉ. नामवर सिंह को न केवल देखा है, बल्कि समय-समय पर उन्हें सुना भी है। मैं यह बात और भी गर्व के साथ कह सकता हूँ कि डॉ. नामवर सिंह बहुत से लेखकों की तरह मेरे भी लेखन से काफ़ी हद तक परिचित थे। आज सवेरे जब यह सूचना मिली कि नामवर जी अब हमारे बीच नहीं रहे हैं, तो स्वाभाविक रूप से मैं भी पूरे हिंदी और उर्दू जगत की तरह शोक संतप्त हूँ। कृष्णा सोबती, अज्ञेय, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, निर्मल वर्मा, श्रीलाल शुक्ल, केदारनाथ सिंह और अब नामवर सिंह के रूप में हिंदी के इस हरे-भरे जंगल से एक-एक कर पुराने दरख्त ख़त्म हो चुके हैं। कहना चाहिए कि हिंदी का यह युग जिन नामों से जाना और पहचाना जाएगा, उनमें नामवर सिंह का नाम पहले पायदान पर होगा। नामवर जी की ख्याति आज कम लिखने के बावजूद अगर जेठ की दोपहरी की तरह चमकदार है, तो वह है उनका अध्ययन और पूरे हिंदी परिदृश्य पर लगातार पड़ने वाली उनकी वह दृष्टि जो किसी विरले साहित्यकार में ही होती है।

अगर हम उनकी कृतियों की बात करें तो ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग‘ उनकी पहली पुस्तक थी जिससे लोकभारती प्रकाशन ने काम शुरू किया था। इसके बाद छायावाद (1955), इतिहास और आलोचना (1957), कहानी : नयी कहानी (1964), कविता के नये प्रतिमान (1968) और दूसरी परम्परा की खोज (1982) जैसी प्रमुख कृतियाँ प्रकाशित हुईं।

नामवर जी जब बोलते थे तो उनके बोलने में हिन्दी-उर्दू का मिठास लिए वह सम्मोहन होता था जिसे सुनने के लिए साहित्य प्रेमी खींचे चले आते थे। इसीलिए वह जितने लोकप्रिय और दुलारे हिंदी के थे, उतने ही उर्दू के भी थे।

बहुत कम लोगों को पता है कि नामवर जी कवितायें भी लिखते थे। पारदर्शी नील जल में, मंह मंह बेल कचेलियाँ, पंथ में साँझ, विजन गिरिपथ पर चटखती, कोजागर, बुरा ज़माना बुरा ज़माना, कभी जब याद आ जाते, नभ के नीले सूनेपन में, पकते गुड़ की गरम गंध से और फागुनी शाम इनकी प्रमुख कविताएँ हैं। देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषाओं, विशेषकर, हिंदी-उर्दू को जो गौरव प्रदान किया उसका श्रेय नामवर सिंह को ही जाता है। इन दोनों भाषाओं का आधुनिक साहित्य समान रूप से यहाँ के भारतीय भाषा केंद्र के हिंदी और उर्दू विभाग में पढ़ाया जाता है। एक समय था जब डॉ. नामवर सिंह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पर्याय के रूप में जाने जाते थे। 

  • कवि केदारनाथ, आलोचक मैनेजर पांडे और बाद में अपने शिष्य पुरुषोत्तम अग्रवाल को इस विश्वविद्यालय में नामवर जी ही लाये थे। उसी विश्वविद्यालय में जो आज एक विचारधारा विशेष के लोगों की आँख की किरकिरी बना हुआ है।

उनकी विदग्धता के सभी क़ायल थे। मुझे याद है 2006 के अंतिम दिनों में मैं एक आलोचक के साथ उनके घर गया था। बातों-बातों में उन्होंने मुझसे पूछा कि इधर और क्या लिखना-पढ़ना हो रहा है? इस पर मैंने धीरे-से कहा कि सर कंजर समुदाय को केंद्र में रखकर रेत शीर्षक से एक उपन्यास लिखने की तैयारी हो रही है। इसके बाद मैंने पूछा कि इस शीर्षक से आपकी नज़रों से कभी कोई उपन्यास गुज़रा है क्या? उन्होंने सिर हिलाते हुए कहा, नहीं। और फिर तुरंत बोले कि रेत शब्द का अर्थ मालूम है। मैं संकोचवश मुस्कराते हुए चुप्पी साध गया। मुझे चुप हुआ देख जिस आलोचक के साथ मैं गया था, वह जिज्ञासा प्रकट करते हुए बोला, ‘डॉक्टर साब, क्या अर्थ है इसका?’ इस पर नामवर जी बोले कि मोरवाल इसका अर्थ जानते हैं। इसीलिए वह मुस्करा रहे हैं। फिर ख़ुद ही बोले, ‘यह संस्कृत का शब्द है- रेतस।’  उस आलोचक को अर्थ उन्होंने फिर भी नहीं बताया। बस मुस्करा कर रह गए। 

सरोकारों के प्रति सजग और सचेत रहते थे

यह वही नामवर सिंह थे जिन्होंने निर्मल वर्मा को निर्मल बनाया। मुंशी प्रेमचन्द के हंस में प्रकाशित हुई निर्मल वर्मा की कहानी परिंदे, जिसे हिंदी की आधुनिक कहानी माना जाता है, इसे आधुनिक कहानी मानने वाले नामवर सिंह ही थे। वह आजीवन राजकमल प्रकाशन की पत्रिका आलोचना के संपादक रहे। बहुत से साहित्य प्रेमियों में उनके बारे में यह धारणा बनी हुई थी कि आलोचना के वह नाम के संपादक थे। इससे उनका कोई सरोकार नहीं था। मगर ऐसा नहीं था। वह इस पत्रिका से अंत तक भावनात्मक रूप से पूरी तरह से जुड़े हुए थे। इस पत्रिका से जुड़ा एक प्रसंग मुझे याद आता है, जो उन्होंने एक बार ख़ुद बताया था। 
  • हुआ यह कि वरिष्ठ कवि अरुण कमल द्वारा संपादन छोड़ने के बाद जब इसके संपादक की तलाश शुरू हुई, तब एक दिन राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबन्धक अशोक महेश्वरी अपने यहाँ कार्यरत एक कर्मचारी को नामवर जी के पास लेकर गए। वह यह मानकर गए थे कि नामवर जी इसके लिए तुरंत हाँ कर देंगे। मगर नामवर जी के सामने जब यह प्रस्ताव रखा गया, तब उन्होंने इसे उसी समय अस्वीकार कर दिया। जब उनसे नये संपादक का नाम देने की बात कही गयी तो उन्होंने प्रो. अपूर्वानंद का नाम सुझाया।

यह प्रसंग मैंने इसलिए बताया कि नामवर सिंह अपने सरोकारों के प्रति कितने सजग और सचेत रहते थे।

पुरस्कार से जुड़ा रोचक प्रसंग

मुझे एक प्रसंग और याद आता है कि कुछ अंतराल के बाद 2001 में फिर से श्रीकांत वर्मा पुरस्कार शुरू हुआ। साल 2001 के लिए जिन दो उपन्यासों को सूचीबद्ध किया गया, उनमें एक था गीतांजलि श्री का 'हमारा शहर उस बरस' और दूसरा था 'काला पहाड़'। इसकी ज्यूरी में थे आलोचक परमानंद श्रीवास्तव और डॉ. नामवर सिंह। दोनों ने जिस उपन्यास का इस पुरस्कार के लिए चयन किया था, वह था 'काला पहाड़'। मगर इससे पहले पुरस्कार की घोषणा होती श्रीकांत वर्मा के पुत्र अभिषेक वर्मा का नाम हथियारों की दलाली में सुर्ख़ियों में आ गया, जिसके चलते इसकी घोषणा रोक दी गयी। आज हम सब जानते हैं कि उसके बाद यह पुरस्कार फिर कभी शुरू नहीं हुआ। 

  • मैं यहाँ एक और पुरस्कार का ज़िक्र करना चाहूँगा और वह है इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसाइटी, जो एक पत्रिका 'पाखी' का भी प्रकाशन करता है। इस संस्था ने 2009 में कुछ पुरस्कारों की शुरुआत की थी। 2010 में एक और पुरस्कार शुरू किया गया - शब्द साधक ज्यूरी सम्मान, जो 'काला पहाड़' को प्रदान किया गया था। इस सम्मान की ज्यूरी में तीन सदस्य थे- राजेंद्र यादव, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी और डॉ. नामवर सिंह। यह एकमात्र ऐसा पुरस्कार था जो कुछ विवादों के चलते 2010 के बाद बंद कर दिया गया।

ये कुछ ऐसे प्रसंग हैं जो बताते हैं कि डॉ. नामवर सिंह की नज़र किस हद तक समकालीन लेखन पर रहती थी। आज वह हमारे बीच भले ही नहीं हैं लेकिन उनके व्याख्यानों की गूँज और शब्दों का उजास हमारे बीच हमेशा तिरमिराता रहेगा। इस उजास को उनकी इस कविता के माध्यम से भी महसूस किया जा सकता है-

बुरा ज़माना, बुरा ज़माना, बुरा ज़माना

लेकिन मुझे ज़माने से कुछ भी तो शिकवा

नहीं, नहीं है दुख कि क्यों हुआ मेरा आना

ऐसे युग में जिसमें ऐसी ही बही हवा

उनका यह कहना आज कितना मौज़ू है कि ‘राजसत्ता भक्तों के लिए सर्वथा उपेक्षा की वस्तु थी। उसके प्रति भक्तों के मन में न तो किसी प्रकार की भक्ति का भाव था और न ही विरोध का। यह आवश्यक भी नहीं था। क्योंकि साधारण जनता के जिन दुखों से भक्त कवि दुखी थे उनका सीधा सम्बंध आगरा या दिल्ली के तख़्त पर बैठे बादशाह से उतना न था, जितना अपने गाँव के उस समाज से जिसका नियमन जाति-धर्म के परम्परागत नियमों से होता था तथा जिसमें राजसत्ता के स्थानीय प्रतिनिधि गाँव के मालिकों के सहयोग से दमनकारी भूमिका निभाते थे।’ राम की शक्ति की ये पंक्तियाँ शायद उनके इसी पुरुषार्थ के लिए समर्पित हैं-

रवि हुआ अस्त

ज्योति के पत्र पर लिखा अमर।

भगवानदास मोरवाल
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