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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 8 सीटों का चुनावी गणित, यहाँ समझिए

लोकसभा चुनाव के पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 8 सीटों पर गुरुवार को मतदान हुआ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश बेहद महत्वपूर्ण इलाक़ा है और 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में हुए दंगों के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण हुआ था। इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला था और उसे अकेले दम पर 80 में से 71 सीटों पर जीत मिली थी। कहा जा सकता है कि इन सीटों पर होने वाला मतदान यह तय करेगा कि उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर मतदान का रुझान क्या रहेगा। 

पहले चरण में पश्चिमी यूपी में मतदान वाली सभी सीटों पर 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जीत मिली थी। ये सीटें - सहारनपुर, बाग़पत, कैराना, मुज़फ़्फ़रनगर, ग़ाज़ियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, मेरठ और बिजनौर हैं।

बीजेपी-गठबंधन के बीच होगा सीधा मुक़ाबला

पश्चिमी यूपी की आठों सीटों पर बीजेपी और गठबंधन के बीच सीधे मुक़ाबले के आसार हैं और गठबंधन बीजेपी पर हर सीट पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस एक या दो सीटों को छोड़कर यहाँ बहुत मज़बूत नहीं दिखाई दे रही है। 

सहारनपुर के देवबंद में एसपी-बीएसपी-आरएलडी की रैली के बाद प्रियंका गाँधी ने इमरान मसूद और बिजनौर में नसीमुद्दीन सिद्दीकी के लिए रोड शो कर बीजेपी के सामने चुनौती पेश की। बीजेपी ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जनसभा करवाई है। पिछली बार इन सभी सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी लेकिन इस बार महागठबंधन उसे कड़ी चुनौती दे रहा है। 

2018 में कैराना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने बीजेपी की हवा निकाल दी थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में यह सवाल जोर-शोर से पूछा जा रहा है कि क्या इस बार गठबंधन सभी 8 सीटों पर बीजेपी का सफाया कर देगा?

सहारनपुर: त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी है सीट

पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी की सुनामी के बावजूद कांग्रेस के इमरान मसूद इस सीट पर सबसे कम 65000 वोटों के अंतर से हारे थे। इस बार वह फिर मैदान में हैं, दूसरी ओर गठबंधन ने हाज़ी फज़लुर्रहमान को अपना उम्मीदवार बनाया है।

बीजेपी के टिकट पर पिछली बार जीते राघव लखन पाल फिर मैदान में हैं और उन्हें जिताने के लिए हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ननौता में रैली भी की थी। एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने भी अपनी पहली रैली इस इलाके़ में की। 

बीजेपी मुसलिम वोटों के बँटवारे के आधार पर जीत की उम्मीद लगाए बैठी है। इस ख़तरे को भाँपते हुए मायावती ने देवबंद में हुई रैली में मुसलमानों से वोट नहीं बँटने देने की अपील भी की थी।
पिछले चुनाव में राघव लखन पाल को 472999, इमरान मसूद को 4,07,909 और बीएसपी के जगदीश राणा को 235033 वोट मिले थे। मुसलमानों का रुझान गठबंधन की तरफ़ ज़्यादा दिखाई दे रहा है। हालाँकि यहाँ इमरान मसूद की भी मज़बूत उम्मीदवारी है। 
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बाग़पतः दाँव पर चौ. चरण सिंह की विरासत

बाग़पत में पूर्व प्रधानमंत्री और जाटों के सबसे बड़े नेता चौधरी चरण सिंह की विरासत दाँव पर लगी हुई है। मोदी की सुनामी के चलते पिछला चुनाव यहाँ चरण सिंह के बेटे अजित सिंह मुंबई पुलिस के आयुक्त रहे सत्यपाल सिंह से हार गए थे। हारे भी इतनी बुरी तरह से कि तीसरे नंबर पर खिसक गए थे। दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी के हाज़ी ग़ुलाम मुहम्मद रहे थे। इस बार चौधरी चरण सिंह की विरासत संभालने के लिए उनके पोते जयंत चौधरी मैदान में हैं।  

जयंत चौधरी गठबंधन के सहारे मोदी के सिपहसालार सत्यपाल को चुनौती देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। पिछले चुनाव में सत्यपाल सिंह को 4,23,475 वोट मिले थे। 16 लाख से ज़्यादा मतदाताओं वाले इस लोकसभा क्षेत्र में एक तरह से जाट नेतृत्व के भविष्य का फ़ैसला होना है। 

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मुज़फ़्फ़रनगर: अजित सिंह की प्रतिष्ठा दाँव पर

2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद बीजेपी ने मुज़फ़्फ़रनगर के नाम पर पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश में वोटों की फसल काटी थी। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। 

मोदी सरकार के मंत्री संजीव बालियान को यहाँ चौधरी अजित सिंह चुनौती दे रहे हैं। मुक़ाबला कड़ा है। पिछले चुनाव में संजीव बालियान को 6,53,391 वोट मिले थे। जबकि बीएसपी के काजल राणा को 2,52,240 और समाजवादी पार्टी के वीरेंद्र सिंह को 1,60,810 वोट मिले थे।

संजीव बालियान के साथ कुछ पिछड़ी जातियों के अलावा बीजेपी के सवर्ण वोट हैं। वहीं, अजित सिंह को एसपी-बीएसपी के साथ आने से मुसलमानों का भरपूर वोट मिलने की उम्मीद है। पहले भी अजित सिंह को मुसलिम वोट मिलता रहा है।

कैराना : आसान नहीं तबस्सुम की राह

पिछले साल हुए उपचुनाव में एसपी-बीएसपी-आरएलडी के गठबंधन की बुनियाद बनी कैराना सीट पर इस बार तबस्सुम हसन की राह आसान नहीं दिख रही है। हालाँकि तबस्सुम ने उपचुनाव में आरएलडी के टिकट पर 2014 में जीते बीजेपी के कद्दावर नेता हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को 55000 वोटों से हराया था। अब तबस्सुम समाजवादी पार्टी के टिकट पर मैदान में हैं। 

कैराना सीट पर भी बीजेपी और गठबंधन के बीच बेहद कड़ा मुक़ाबला है। कांग्रेस के उम्मीदवार हरेंद्र मलिक चुनावी समीकरण बिगाड़ने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

ग़ाज़ियाबाद: इतिहास दोहरा पाएँगे वीके सिंह?

ग़ाज़ियाबाद में बीजेपी के उम्मीदवार और मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह के सामने इतिहास बनाने की चुनौती है। ग़ौरतलब है कि पिछले चुनाव में जनरल वीके सिंह को सबसे ज़्यादा रिकॉर्ड 7,58,000 वोट मिले थे और उन्होंने 5,67,000 वोटों के अंतर से कांग्रेस के राज बब्बर को हराया था। दूसरे नंबर पर आने के बावजूद राज बब्बर की जमानत जब्त हो गई थी। इस बार कांग्रेस ने यहाँ से युवा नेता डॉली शर्मा को मैदान में उतारा है। उनके लिए प्रियंका गाँधी रोड शो करके कांग्रेस की ताक़त का एहसास भी करा चुकी हैं। गठबंधन की ओर से पूर्व विधायक सुरेश बंसल मैदान में हैं। इस सीट पर बीजेपी की राह ज़रूर आसान दिखती है। लेकिन वीके सिंह के सामने सबसे ज़्यादा वोट हासिल करने का इतिहास दोहराने की चुनौती है।

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गौतमबुद्ध नगरः त्रिकोणीय मुक़ाबले में फंसे शर्मा

देश की राजधानी से सटी उत्तर प्रदेश की गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट प्रदेश की वीआईपी सीटों में शुमार की जाती है। यहाँ से मोदी सरकार में संस्कृति मंत्री महेश शर्मा दोबारा मैदान में हैं।  कांग्रेस के उनके ख़िलाफ़ युवा चेहरे अरविंद कुमार सिंह को उतारा है तो एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन से सतवीर नागर ताल ठोक रहे हैं। यहाँ मुक़ाबला त्रिकोणीय माना जा रहा है। 

गौतमबुद्ध नगर के गाँव-देहात में महेश शर्मा का जबरदस्त विरोध भी है। इस विरोध के चलते कई गाँवों से शर्मा को बगैर प्रचार किए लौटना पड़ा है। स्थानीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि शर्मा की सीट ख़तरे में है।

मेरठ: बीजेपी के सामने साख बचाने की चुनौती

मेरठ में बीजेपी के सामने लोकसभा सीट के साथ ही अपनी साख बचाने की चुनौती भी है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल 532981 वोट लेकर जीते थे जबकि बीएसपी के हाज़ी अख़लाक क़ुरैशी 300655 वोट लेकर दूसरे नंबर पर रहे थे। समाजवादी पार्टी के शाहिद मंजूर को 2,11,760 वोट मिले थे। दोनों पार्टियों के मतों को मिला दिया जाए तो यह बीजेपी के आसपास बैठते हैं। 

कांग्रेस ने मेरठ से हरेंद्र अग्रवाल को उतार कर बीजेपी की ही मुश्किल बढ़ाई है। वैसे भी 2017 के विधानसभा चुनाव में मेरठ शहर की विधानसभा सीट और उसी साल हुए स्थानीय निकाय के चुनाव में मेयर की सीट हार कर बीजेपी अपनी साख़ गँवा चुकी है।

बिजनौर: नसीमुद्दीन दे पाएँगे चुनौती

कभी बीएसपी की राजनीतिक प्रयोगशाला रहे बिजनौर ज़िले की इसी सीट से मायावती ने लोकसभा में क़दम रखा था। यहाँ 40 फ़ीसदी मुसलमान होने के बावजूद गठबंधन ने मलूक नागर को अपना उम्मीदवार बनाया है। 

मलूक नागर का सीधा मुक़ाबला बीजेपी सांसद भारतेंद्र सिंह से होने की उम्मीद जताई जा रही है। बिजनौर में स्थानीय लोगों की माँग थी कि गठबंधन मुसलिम प्रत्याशी उतारे, कुछ संगठनों ने यह भी कहा था कि अगर मुसलिम प्रत्याशी ना हुआ तो गठबंधन को वोट नहीं देंगे।

इसी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने पहले घोषित की गईं उम्मीदवार इंदिरा भाटी का टिकट काटकर कभी बीएसपी में रहे कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी को चुनाव मैदान में उतारा। 

मलूक नागर को गुर्जरों के साथ-साथ जाट वोट मिलने की भी उम्मीद है। पिछली बार एसपी के टिकट पर लड़े शाहनवाज राणा भी मलूक नागर के समर्थन में हैं। इससे नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मुसलिम वोट मिलने की जो रही-सही उम्मीद थी, वह भी ख़त्म होती दिख रही है।

पहले चरण की इन 8 सीटों पर क़ानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और विकास से लेकर तमाम मुद्दे हैं लेकिन चुनाव जातिगत समीकरणों और नेताओं की साख के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गया है।

इन सीटों पर बीजेपी और एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन के बीच मुख्य मुक़ाबला माना जा रहा है। ज़्यादातर सीटों पर बीजेपी, गठबंधन की ताक़त के मुक़ाबले कमज़ोर दिख रही है। 

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क़मर वहीद नक़वी
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