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ग्वालियर, मुरैना में भी कोरोना बेकाबू, स्थिति शिवराज सरकार से क्यों नहीं संभल रही?

इंदौर और भोपाल के बाद मध्य प्रदेश के मुरैना और ग्वालियर ज़िलों में कोरोना संक्रमण के मामलों में जिस तेज़ी से उछाल आया है, उससे यह तो साफ़ हो गया है कि मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार कोविड-19 के ख़िलाफ़ जंग में या तो पस्त हो गई है या फिर इस वैश्विक महामारी के ख़तरों को भाँपने में बड़ी चूक कर गई है। भोपाल और इंदौर में तो हालात जैसे-तैसे संभल गए लेकिन अब मुरैना और ग्वालियर में संक्रमण के मामलों की रफ्तार बड़े ख़तरे की घंटी बजा रही है। ख़तरा यह भी है कि संक्रमण एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे ज़िलों तक न पहुँच जाए और हालात सामुदायिक संक्रमण के न बन जाएँ।

एक बड़ा ख़तरा यह है कि ग्वालियर और मुरैना की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि ये दोनों ज़िले दिल्ली को जोड़ते हैं, मुरैना सीधे तौर पर धौलपुर से राजस्थान को और ग्वालियर का एक और पड़ोसी ज़िला दतिया झाँसी से उत्तर प्रदेश को जोड़ता है। कहा जा सकता है कि संक्रमण का ख़तरा पड़ोसी राज्यों पर भी मंडरा रहा है। मुरैना ज़िले में संक्रमण के जो मामले सामने आए उसमें यही बात उभर कर सामने आई कि संक्रमण पड़ोसी राज्य राजस्थान के धौलपुर के मार्फत पसरा। अब संक्रमण ने ग्वालियर में पैर पसार लिए हैं। जून के आख़िर तक संक्रमण का ख़तरा तो था लेकिन हालात काबू में थे।

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जुलाई के पहले हफ्ते यानी चार जुलाई से संक्रमण ने जो रफ्तार पकड़ी, स्थितियाँ काबू से बाहर हो गईं। 4 जुलाई को ग्वालियर में एक ही दिन में 65 संक्रमण के मामले सामने आए। इसके बाद आंकड़ा 50 से नीचे नहीं पहुँचा। 12 जुलाई को 111 संक्रमित और 13 जुलाई को यह आँकड़ा बढ़कर 191 तक पहुँच गया। 14 जुलाई को संक्रमित तो आए लेकिन मामूली राहत के साथ। मंगलवार को 35 संक्रमित ही पाए गए। पिछले 10 दिनों के हालात के बाद मंगलवार से ग्वालियर ज़िले में 7 दिनों के लिए कर्फ्यू लागू हो गया। 

संक्रमण के मामलों में तेज़ी पहले मुरैना में दिखी और फिर ग्वालियर में। यूँ भी ग्वालियर और मुरैना के बीच सड़क रास्ते से दूरी 35 किलोमीटर की है, बावजूद इसके ग्वालियर के स्थानीय प्रशासन ने इन हालात से कोई सबक़ नहीं लिया। स्वास्थ्य विभाग के हेल्थ बुलेटिन के मुताबिक़ ग्वालियर ज़िले में संक्रमितों की संख्या 1244 बताई गई है। बताया गया है कि इनमें से 592 मरीज़ स्वस्थ हो चुके हैं। ग्वालियर में कोरोना संक्रमण का पहला मामला 24 मार्च को आया था।

मध्य प्रदेश में बीजेपी सरकार गिराने और कांग्रेस सरकार बचाने में जुटी रही और इधर कोरोना का वायरस एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे में पहुँचता रहा।

सरकार बनाने और गिराने के खेल के बीच जब तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने फ्लोर टेस्ट को कोरोना संकट के चलते टालने की बात कही थी तब बीजेपी के नेता और अभी कुछ दिनों तक प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा ने कहा था यह कोरोना नहीं डरोना है। जोड़-तोड़ और उठापटक के बाद बीजेपी सत्ता में तो आ गई लेकिन लंबे समय तक शिवराज सिंह चौहान ही वन मैन शो करते रहे। लंबे समय तक वे ही मुख्यमंत्री और वे ही सरकार रहे।

सरकार का रवैया

पूरा देश जब कोरोना संक्रमण से जूझ रहा था तब मध्य प्रदेश ही ऐसा इकलौता राज्य था जहाँ बगैर स्वास्थ्य मंत्री के सरकार चल रही थी। हालात अब भी वैसे ही हैं। पहले बीजेपी को सत्ता हासिल करने की चिंता थी और अब उसे मध्य प्रदेश में 25 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के गुणा-गणित की फिक्र है। इधर अनलॉक में राजनीतिक लिहाज से ख़ूब मेल मिलाप हुए और बाहों में बाहें डाल कर फ़ोटो सेशन भी ख़ूब हुए। इस बीच कई मंत्री-संत्री भी पॉजिटिव आ गए और कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आए राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान से ठीक पहले तक क्वॉरेंटीन होना पड़ा। 

कोरोना के ख़िलाफ़ जंग के लिए बड़े-बड़े दावों के साथ मध्य प्रदेश में जिस ‘किल कोरोना’ अभियान की शुरुआत की गई वह भी फुस्स ही निकला। ‘किल कोरोना’ अभियान में जाँच के नाम पर घर-घर जाकर आँगनवाड़ी कार्यकर्ता लोगों की थर्मल स्कैनिंग कर रही हैं। यानी जाँच के नाम पर सिर्फ़ काग़जी खानापूर्ति।

बात फिर ग्वालियर की, संक्रमण के मामलों के बढ़ने और इससे पहले के दिनों में जिस कदर प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही सामने आई या आ रही है, वह हमारे नाकारा हेल्थ सिस्टम की झलक बताने के लिए काफ़ी है। मसलन, चोरी के मामले में पकड़ा गया एक संक्रमित अस्पताल में इलाज के दौरान पुलिस को ठेंगा दिखाकर भागने में कामयाब रहा। ऐसा ही एक और मामला है जिसमें बीमा अस्पताल में भर्ती एक संक्रमित कैदी रात को अस्पताल से ग़ायब हो जाता है और सुबह फिर अपने बिस्तर पर पहुँच जाता है। हद तो तब होती है जब मुरार की सिविल डिस्पेंसरी से 33 संदिग्ध लोगों के  सैंपल ग़ायब हो जाते हैं और इनके ग़ायब होने का पता तब चलता है जब जाँच रिपोर्ट ना आने पर शोर शराबा मचता है। 

दरअसल, स्थानीय प्रशासन बड़ी चूक तब कर बैठा जब लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद अनलॉक पीरियड शुरू हुआ, लॉकडाउन के दौरान आवाजाही को रोकने के लिए ज़िले में बनाए नाकों को पूरी तरह हटा दिया गया। लॉकडाउन की अवधि में हालात से निपटने के लिए ज़िले को कई ज़ोन में बाँटकर इंसिडेंट कमांडरों की तैनाती की गई थी। ये वे सरकारी अधिकारी हैं जिनके पास वार्ड स्तर पर निगरानी रखने की ज़िम्मेदारी है। लॉकडाउन तक तो इंसिडेंट कमांडर सक्रिय दिखे लेकिन अनलॉक की स्थिति में इंसिडेंट कमांडरों की भूमिका भी धीरे-धीरे सिमटती चली गई।

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हालाँकि इन सब किंतु परंतु के बीच ग्वालियर कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह को भरोसा है कि हालात काबू में आ जाएँगे। उन्होंने कहा कि आने वाले छह-सात दिनों में स्थितियाँ सुधर जाएँगी। सरकारी अफ़सरों में निष्क्रियता पर उनका कहना है, हमारे पास कोरोना से लड़ने के अलावा और भी दीगर काम हैं। वे भी ज़रूरी हैं। 

बहरहाल, ग्वालियर सहित पूरे मध्य प्रदेश में अब तक हुई मौतों का आँकड़ा बहुत ज़्यादा चिंताजनक नहीं है और रिकवरी रेट 70 फ़ीसदी से ज़्यादा है। ग्वालियर में संक्रमण से पीड़ित मरने वालों की संख्या 8 हो गई है। इसी हफ्ते ग्वालियर में कोरोना संक्रमण के हालात की समीक्षा करने आए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि यह ग्वालियर के पानी का कमाल है कि यहाँ संक्रमित मरीज़ ठीक होकर घर जा रहे हैं। ख़ैर, पानी ग्वालियर का हो या चंबल का, सरकार को ख़ुशफहमी का चोला उतार कर हक़ीक़त की तरफ़ देखना होगा क्योंकि संक्रमण का ख़तरा फ़िलहाल तो टलता नहीं दिख रहा है।

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विवेक श्रीवास्तव
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