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पर्यावरण संरक्षण का दंभ भरने वाली सरकार आरे जंगल के पीछे क्यों पड़ी?

मुंबई में गोरेगाँव स्थित आरे कॉलोनी के जंगल से जुड़े मामले में सोमवार को जब तक सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया तब तक 2,000 से अधिक पेड़ों को काट दिया गया था। आदेश आने से पहले शुक्रवार रात से ही ज़बरदस्त तेज़ी से कटाई की गई। अब आरे कॉलोनी से जुड़ा 3166 एकड़ में फैला यह जंगल अपना अस्तित्व खोने के कगार पर है। ऐसा तब है जब पिछले साल ग्लोबल अर्थ चैंपियन के ख़िताब से सम्मानित होने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी की ही तीनों स्तर पर सरकारें हैं। केंद्र में, राज्य में और स्थानीय निकाय में भी। इन्हीं के सरकारी आदेश की आड़ में 2,000 से अधिक पेड़ जमींदोज़ कर दिए गए। विश्वास नहीं होता कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए सिंगल यूज़्ड प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने और लाखों शौचालयों का निर्माण करने का दावा कर रही केंद्र व राज्य सरकार ने मुंबई को मेट्रो शहर बनाने की धुन में 86 प्रजातियों वाले आरे जंगल को तबाही की ओर धकेल दिया।

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ऐसा नहीं है कि इसको बचाने के प्रयास नहीं हुए। जून 2015 में वनशक्ति और आरे कंजर्वेशन ग्रुप आगे आये थे। दोनों ने मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन यानी एमएमआरसी के ख़िलाफ़ पुणे में राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी में एक याचिका दायर की। पिछले साल 21 सितम्बर को सुनवाई के दौरान मुंबई मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के वकील किरण बगलिये की दलील के बाद मामले को 10 मिनट के अंदर ही निपटा दिया गया। 

एनजीटी ने मामले को सुलझाने में अपनी असमर्थता जाहिर की और कहा कि एनजीटी अधिनियम के तहत उसके पास शक्ति नहीं है। 

14 मई को एनजीटी ने आरे के जंगलों के 2,646 पेड़ों को काटने और भूमि के पुनर्ग्रहण पर लगी रोक हटा दी जिससे निर्माण की सभी गतिविधियों को संचालित करने की अनुमति मिल गई।

29 अगस्त को बृहन्मुंबई नगर निगम यानी बीएमसी की ओर से मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए कार शेड बनाने की मंजूरी दे दी गई। 4 अक्टूबर को बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंदराजोग और न्यायमूर्ति भारती डांगरे की बेंच ने पर्यावरणविद् ज़ोरू भाठेना और शिवसेना के नगरसेवक और बृहन्मुंबई रेलवे कॉर्पोरेशन की स्थायी समिति के अध्यक्ष यशवंत जाधव द्वारा दायर 2 जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया। उन्होंने 29 अगस्त के पेड़ काटने के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने माना कि यह जंगल नहीं है। इसके बाद बीएमसी ने पिछले शुक्रवार की रात से ही पेड़ काटने शुरू कर दिये। लोगों ने प्रदर्शन किया तो 29 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया और क्षेत्र में धारा 144 लगा दी गई।

सुप्रीम कोर्ट में मामला

रविवार को विधि के 9 छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट से तुरंत हस्तक्षेप करने की माँग की तो जस्टिस अरुण मिश्रा और अशोक भूषण की स्पेशल बेंच ने सोमवार को पेड़ों के काटने के सरकारी आदेश पर रोक लगा दी और गिरफ़्तार लोगों को रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने अगली सुनवाई 21 अक्टूबर तय की। लेकिन दिलचस्प बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच ने एनजीटी की तरह ही सरकार से जवाब माँगा है कि वह यह साफ़ करे कि विवादित भूमि क्षेत्र इको सेंसिटिव जोन था या नहीं? बेंच ने कहा है कि प्रस्तुत दस्तावेज़ के अनुसार न तो यह इको सेंसिटिव जोन है और न ही विकास क्षेत्र। और यदि ऐसा है तो सरकार हमें इसका दस्तावेज़ दिखाए।

सरकार का क्या है रुख?

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस बचाव में कह चुके हैं कि जहाँ 2,185 पेड़ काटे जा रहे हैं वहीं राज्य सरकार 2300 पौधे लगाने की तैयारी कर रही है। वैसे, यह तर्क कमाल का है। जिन पेड़ों को काटने का आदेश हुआ है उनमें से तमाम पेड़ 100 साल पुराने हैं और जिन पौधों को लगाने की बाद फडनवीस कर रहे हैं वे इन 100 साल पुराने पेड़ों का मुकाबला किस आधार पर कर सकेंगे?

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि ‘जब दिल्ली में पहला मेट्रो स्टेशन बना तो 20-25 पेड़ काटे जाने की ज़रूरत थी। तब भी लोगों ने विरोध किया था, लेकिन काटे गए प्रत्येक पेड़ के बदले पाँच पेड़ लगाए गए। दिल्ली में कुल 271 मेट्रो स्टेशन बने, साथ ही जंगल भी बढ़ा और 30 लाख लोगों की पर्यावरण पूरक सार्वजनिक यातायात की व्यवस्था हुई। यही मंत्र है। विकास भी और पर्यावरण की रक्षा भी, दोनों साथ-साथ।’

एक दूसरा तर्क यह भी है कि आरे के जंगल में 100000 से अधिक पेड़-पौधे हैं, ऐसे में यदि 2,000 पेड़ काट भी दिए जाएँ तो कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन मुंबई की आबोहवा जितनी ज़्यादा ख़राब हो गई है, उसमें 100 साल पुराने 2000 पेड़ों का काटा जाना काफ़ी मायने रखता है।

रिपोर्ट: संकट में मुंबई

वर्ष 2017 में भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु के एक अध्ययन में पाया गया कि मुंबई शहर का विकास पर्यावरण की क़ीमत पर हुआ है। अध्ययन में कहा गया था कि शहर का 94% हिस्सा पिछले चार दशकों में कंक्रीटयुक्त हुआ है। इस प्रक्रिया में 60 फ़ीसदी वनस्पति और 65 फ़ीसदी जल निकाय नष्ट हो गए। अध्ययन के अनुसार, मुंबई पूरी तरह से शहरी आपदा के संकट की तरफ़ बढ़ रही है जहाँ वनस्पति के अभाव में शुद्ध पानी और हवा जैसी बुनियादी सुविधाएँ लगभग न के बराबर होंगी। अध्ययन में यह भी बताया गया कि अगर अभी ध्यान नहीं दिया गया और शहर की परिधि में अनियोजित शहरीकरण को नहीं रोका गया तो स्थिति बेहद भयावह होगी। कई बार बाढ़ की आपदा आ भी गई है।

ऐसे कैसे बढ़ेगा वन क्षेत्र?

पर्यावरण की ऐसी स्थिति ऐसे देश में है जहाँ वनीकरण योजना के तहत हर वर्ष 1 जुलाई से 7 जुलाई के बीच वन महोत्सव मनाया जाता है। लक्ष्य है कि भारत की कुल ज़मीन का 33 फ़ीसदी वन क्षेत्र हो। करोड़ों रुपये ख़र्च करने के बाद वन क्षेत्र में कुछ बढ़ोतरी हुई है। स्टेट ऑफ़ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2017 के अनुसार, पहले जहाँ क़रीब यह 20 फ़ीसदी था वहीं यह 2017 में बढ़ कर 21.54 प्रतिशत तक पहुँचा है। 11वीं योजना के दौरान देश में अनुमानित वनीकरण 4.2 लाख हेक्टेयर भूमि पर किया गया जिसमें 8300 करोड़ रुपये ख़र्च हुए। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट में प्रस्तुत दस्तावेज़ के अनुसार 33 प्रतिशत वन क्षेत्र प्राप्त करने के लिए अनुमानित अवधि 35 वर्ष रखी गई है, जबकि इसमें 60,000 करोड़ रुपये ख़र्च होंगे।

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इंसान ही ख़त्म कर रहा है जंगल

इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि आज़ादी के बाद से भारत की कुल जनसंख्या में चार गुना (330 मिलियन से 1.3 बिलियन) वृद्धि हुई है। यह जनसंख्या कृषि, आवास और औद्योगिक उद्देश्य के लिए बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र में घुसपैठ कर उन्हें ख़त्म कर रही है।  

ऐसे में मुंबई के आरे क्षेत्र में पेड़ों का काटा जाना किस उद्देश्य की पूर्ति कर रहा है और हमें किस दिशा में ले जा रहा है, यह कहने की ज़रूरत नहीं है। वनों की ज़रूरत को अभी न समझा गया तो वह दिन दूर नहीं जब मिनरल वाटर की तरह स्वस्थ लोगों को भी ऑक्सीज़न भी ख़रीदने की ज़रूरत पड़ने लगेगी।

बीना पाण्डेय
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