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महाराष्ट्र में बड़ा भाई कौन- बीजेपी या शिवसेना? रस्साकशी शुरू

लोकसभा चुनाव की जीत का स्वाद अभी मुँह से गया भी नहीं कि महाराष्ट्र में सत्ताधारी बीजेपी- शिवसेना के बीच विधानसभा चुनाव में ‘बड़ा भाई’ बनने को लेकर रस्साकशी शुरू हो गयी है। वैसे, चुनाव में जनता तय करने वाली है कि वास्तव में किसकी सरकार उसे लानी है लेकिन राजनीतिक समीकरणों में बड़ा दिखने का खेल अब रोज़ नए दांवपेच के साथ दिखने लगा है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल में इस बार भी भारी उद्योग मंत्रालय का मिलना और विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में 135:135 सीटों का फ़ॉर्मूला ज़ाहिर करना, शिवसेना को अपने फ़्रेम से बाहर जाता हुआ दिख रहा है। दरअसल, लोकसभा चुनाव के समय जो गठबंधन हुआ था उसमें कई सवाल अनुत्तरित रह गए थे।

पहला और ख़ास सवाल यह था कि क्या महाराष्ट्र में शिवसेना ‘बड़े भाई’ की भूमिका में रहेगी? दूसरा कि क्या ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री दोनों पार्टियों से होगा, ऐसा कोई फ़ॉर्मूला तय हुआ है?

पिछली बार विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ने के बाद शिवसेना को भी इस बात का पता चल चुका है कि प्रदेश में उसकी हालत बीजेपी के मुक़ाबले कहाँ है। ऐसे में सवाल एक समान विचारों वाले सबसे पुराने गठबंधन की है तो उस पर भी स्थिति पिछले पाँच सालों में साफ़ हो चुकी है कि बीजेपी को लोकसभा चुनावों के लिए जिन दलों से गठबंधन की ज़रूरत थी उनके साथ उसने किसी भी शर्त को मानते हुए हाथ मिलाया था। बिहार में नीतीश कुमार इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। रही बात पुराने गठबंधन की तो पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ जिस तरह से रिश्ता तोड़ने का और अगला विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने का भारतीय जनता पार्टी की पंजाब प्रदेश शाखा ने निर्णय लिया है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

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महाराष्ट्र में नरेंद्र मोदी ने मंच पर हाथ में हाथ डालकर उद्धव ठाकरे को अपना छोटा भाई बताकर ख़ुश कर दिया हो लेकिन वही मोदी प्रकाश सिंह बादल की तुलना नेल्सन मंडेला से करते रहे हैं और कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनके पाँव छूते दिखे हैं। भारतीय जनता पार्टी की जो चुनावी राजनीति पिछले पाँच सालों में देखने को मिली है उसका लब्बोलुआब यही है कि उसके लिए इस जंग में सगा कोई नहीं है।

क्या 50:50 का फ़ॉर्मूला चलेगा?

उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनाव में गठबंधन के समय जो बात शिवसेना की तरफ़ से कही गयी थी कि वह यह थी कि वह और बीजेपी 288 सदस्यों वाली विधानसभा में 140:140 सीटों पर लड़ेंगी तथा 8 सीटें निर्दलीय विधायकों के लिए छोड़ी जाएँगी जो वर्तमान में सरकार का हिस्सा हैं। लेकिन उन सहयोगियों का क्या होगा जो बीजेपी के साथ मिलकर 2014 का चुनाव लड़े थे? रामदास आठवले की रिपब्लिकन पार्टी, राष्ट्रीय समाज पार्टी व शिव संग्राम पार्टी वे दल हैं जो बीजेपी के साथ मिलकर लड़े थे और इनके बारे में शिवसेना का रुख यह है कि बीजेपी उनको अपने खाते से यह सीट दे। इन्हीं पार्टियों के लिए दस सीटें निकालने के लिए 135:135 का फ़ॉर्मूला बताया जा रहा है जिसको लेकर नयी बहस छिड़ गयी है। इस बहस के पीछे एक और कारण यह है कि बीजेपी इन पार्टियों के प्रत्याशियों को अपने चुनाव-चिन्ह पर लड़वाती है जिसका परिणाम यह होता है कि वे आधिकारिक तौर पर उन्हीं के विधायक माने जाते हैं। पिछली बार बीजेपी ने 122 सीटें जीती थीं। इस बार भी पार्टी की यही नीति है कि वह इन सहयोगी दलों को अपने चुनाव-चिन्ह पर ही लड़वाये और अधिक सीट जीतकर ‘बड़ा भाई’ बन जाए? लिहाज़ा शिवसेना यह कह रही है कि वह 50:50 के फ़ॉर्मूले के तहत ही गठबंधन करेगी जो लोकसभा चुनाव के समय तय हुआ था। 

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इन सीटों का पेच कैसे सुलझेगा?

इन दोनों पार्टियों के गठबंधन में क़रीब एक दर्जन से ज़्यादा उन सीटों का भी पेच फँसा है जो पिछले चुनाव में जीत तो बीजेपी गयी थी लेकिन वे खाते में शिवसेना के रहती थीं। ऐसी ही एक सीट है मुंबई में गोरेगाँव विधानसभा। यहाँ से बीजेपी की विद्या ठाकुर जीतीं लेकिन जब गठबंधन की सरकार बनी तो यहाँ से हारे हुए सुभाष देसाई को शिवसेना के खाते से कैबिनेट मंत्री बनाया गया। मुंबई ही नहीं, शिवसेना के आधार वाले ठाणे, पुणे, नाशिक में भी बीजेपी ने उससे कई सीटें छीनी हैं जो शिवसेना इस गठबंधन में वापस लेने के लिए अड़ेगी। वहीं बीजेपी के नेता संकेत दे रहे हैं कि जीती हुई सीटें कैसे छोड़ी जा सकती हैं? बीजेपी के नेता 135 सीटों में से 122 सीटें पहले से ही तय मानकर चल रहे हैं।

क्या बन रही है तसवीर?

शिवसेना ने 2014 के चुनाव में 64 सीटों पर जीत हासिल की थी और ‘बड़े भाई’ बनने के लिए यह फासला बहुत लम्बा है। लिहाज़ा जानकार यह कह रहे हैं कि बीजेपी किसी भी हाल में शिवसेना को ‘बड़ा भाई’ बनाने के मूड में नहीं है। इसके पीछे एक कारण यह है कि बीजेपी अब कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायकों को अपने में शामिल कर जिताऊ उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाने में जुटी है ताकि अधिक से अधिक सीट जीत सके। उसने विपक्षी दल के नेता और कांग्रेसी नेता रहे राधाकृष्ण विखे पाटिल को आधिकारिक तौर पर अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है। कांग्रेस के कुछ विधायकों से भी वह चर्चा कर रही है। ऐसे में शिवसेना के ‘बड़े भाई’ बनने का ख्वाब तभी पूरा हो सकता है जब वह बीजेपी से ज़्यादा सीटें जीत सके।

संजय राय
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