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महाराष्ट्र बीजेपी में फिर विरोध के स्वर, वरिष्ठों को दरकिनार करने का आरोप

महाराष्ट्र में एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में विद्रोह के स्वर मुखर होने लगे हैं। इस बार यह नाराजगी 21 मई को होने वाले विधान परिषद चुनाव को लेकर है। इन चुनावों में बीजेपी में टिकट बंटवारे को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं। 

बीजेपी ने गोपीचंद पडलकर, रणजीत सिंह मोहिते पाटिल, प्रवीण दटके और डॉ. अजीत गोपछडे को मैदान में उतारा है जबकि देवेंद्र फडणवीस सरकार में राजस्व मंत्री रहे एकनाथ खडसे, पंकजा मुंडे, विनोद तावड़े, चंद्रशेखर बावनकुले जैसे वरिष्ठ नेताओं को मौका नहीं दिया गया है। 

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जिन नेताओं को विधान परिषद के लिए टिकट दिया गया है, उसमें पडलकर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में आये थे। वही स्थिति रणजीत सिंह मोहिते पाटिल की भी है। उनके पिता विजय सिंह मोहिते पाटिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में थे और प्रदेश में उप मुख्यमंत्री भी रहे हैं। रणजीत सिंह मोहिते पाटिल भी राष्ट्रवादी कांग्रेस की तरफ से सांसद रह चुके हैं और पिता-पुत्र दोनों, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में आए थे। 

प्रवीण दटके नागपुर महानगरपालिका में नगरसेवक हैं और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के करीबी हैं जबकि गोपछडे का संबंध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है। 

इस टिकट बंटवारे से एक बार फिर फडणवीस पर सवाल खड़े होने लगे हैं कि क्या वह पार्टी में वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर अपने प्रतिद्वंद्वियों को ख़त्म कर रहे हैं? टिकट बंटवारे को लेकर एक बार फिर वरिष्ठ नेता एकनाथ खडसे विरोध की भूमिका में आ गए हैं। 

खडसे ने कहा है कि विधान परिषद वरिष्ठ नेताओं का सभागृह होता है लेकिन जिन्हें टिकट दिया गया है वे दूसरी पार्टी से आए नेता हैं तथा इसमें से एक ने ‘नरेंद्र मोदी गो बैक’ के नारे भी लगाए हैं।

विदर्भ में अच्छी-खासी पकड़ रखने वाले चंद्रशेखर बावनकुले भी इस मामले को लेकर मीडिया के समक्ष आने वाले हैं। लेकिन निगाहें पूर्व मंत्री पंकजा मुंडे पर लगी हैं कि वे क्या निर्णय लेंगी। 

उठे थे बगावती सुर 

महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद दिसंबर, 2019 में पंकजा मुंडे, एकनाथ खडसे, चंद्रशेखर बावनकुले आदि ने बगावती सुर बुलंद किये थे लेकिन बाद में पार्टी के दिल्ली स्तर के नेताओं के दखल के बाद मामला शांत हो गया था। उस समय एकनाथ खडसे की नागपुर में विधानसभा अधिवेशन के दौरान एनसीपी प्रमुख शरद पवार और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से भेंट करने की ख़बरें चली थीं। खडसे को लेकर यह कहा जा रहा था कि वह एनसीपी में चले जाएंगे। 

पवार से मिले थे खडसे

खडसे ने दिल्ली जाकर पवार से मुलाक़ात भी की थी और उस मुलाक़ात के बाद बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे की जयंती पर उनकी बेटी पंकजा मुंडे द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने प्रदेश बीजेपी के नेताओं पर जमकर हमले किये थे। उन्होंने बार-बार इस बात को कहा था कि महाराष्ट्र में सेठजी-भटजी (बनियों और ब्राह्मणों) की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी को मुंडे और उन्होंने ओबीसी के लोगों से जोड़कर उसका आधार बढ़ाया। 

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खडसे ने कहा था कि उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया, पार्टी की कोर कमेटी से भी बाहर कर दिया गया और बैठकों में भी नहीं बुलाया जाता। उस कार्यक्रम में पंकजा मुंडे और खडसे ने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि वे पार्टी छोड़ दें। 

कार्यक्रम के बाद पंकजा मुंडे ने अपने पिता के नाम पर बनी एक सामाजिक संस्था के बैनर तले कार्यक्रम करने भी शुरू कर दिए थे लेकिन बाद में सब कुछ शांत हो गया था। शायद पार्टी हाईकमान की तरफ से उन्हें विधान परिषद का कोई आश्वासन मिला हो। लेकिन अब विधान परिषद के टिकट बंट चुके हैं तो विद्रोह के स्वर फिर से मुखर हैं। 

बीजेपी 4 सीटों पर प्रत्याशी उतार रही है, चौथी सीट के लिए संख्या बल कम पड़ रहा है। यही स्थिति कांग्रेस के दूसरे प्रत्याशी के लिए भी है। यदि बीजेपी में इन विरोधी स्वरों के चलते मत विभाजन होता है तो विधान परिषद की उसकी एक सीट खतरे में पड़ सकती है। 

आने वाले दिन प्रदेश में बीजेपी के लिए कड़ी चुनौती वाले हैं। देखना है पार्टी हाईकमान फिर से दखल देकर इन नेताओं को शांत कराने में कितना सफल हो पाता है। 

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संजय राय
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