प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 9 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के हल्दिया में एक चुनावी रैली को संबोधित करने पहुंचे। 2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में बीजेपी 'पोरिबर्तन' का नारा बुलंद कर रही है। मोदी ने टीएमसी सरकार पर तीखा हमला बोला, छह 'मोदी गारंटी' का ऐलान किया और दावा किया कि भारत तेज़ी से प्रगति कर रहा है, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार बंगाल को पीछे खींच रही है। फैक्ट्रियां बंद, युवा पलायन कर रहे हैं, महिलाओं पर अपराध बढ़े और केंद्र की योजनाओं का नाम बदलकर श्रेय लिया जा रहा है- ऐसे कई आरोप लगाए।
रैली ख़त्म होते ही टीएमसी ने जवाब दिया। राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने एक्स पर '7 पॉइंट रियलिटी चेक' जारी कर हर दावे का तथ्यात्मक खंडन किया। यह कोई नया मामला नहीं। प्रधानमंत्री पर पिछले 12 साल से आरोप लगता रहा है कि चुनावी रैलियों, संसद और 'मन की बात' में वे गलत तथ्य पेश करते हैं या तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। राष्ट्रीय मीडिया इन पर चुप्पी साध लेता है, लेकिन स्वतंत्र फ़ैक्ट-चेक एजेंसियां बार-बार पोल खोलती हैं। इस बार भी पीएम के दावों की पोल फ़ौरन ही खुल गई।
'पीएम के दावे' और टीएमसी का 'फ़ैक्ट चेक'
हल्दिया रैली के सात दावों को देखें तो पैटर्न साफ़ है।
- दावा 1: भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, टीएमसी बंगाल को पीछे खींच रही है।
- तथ्य: भारत दुनिया का सबसे ग़रीब आबादी वाला देश है; चार में से पांच लोग रोज़ाना 171 रुपये से कम कमाते हैं। बंगाल का जीएसडीपी 15 साल में पांच गुना बढ़ा।
- दावा 2: बंगाल में फैक्ट्रियां बंद, लोग दूसरे राज्यों में काम ढूंढ रहे हैं।
- तथ्य: 2011-2025 में रजिस्टर्ड कंपनियां 83% बढ़ीं।
- दावा 3: बीजेपी राज्यों में विकास है।
- तथ्य: 21 करोड़ भारतीय मल्टीडायमेंशनल ग़रीबी में, केंद्र ने बंगाल के 2 लाख करोड़ के फंड रोके।
- दावा 4: टीएमसी ने युवाओं को धोखा दिया।
- तथ्य: बंगाल में बेरोज़गारी घटी, देशभर में एक तिहाई युवा NEET में नहीं।
- दावा 5: सरकारी नौकरियां पारदर्शी होंगी।
- तथ्य: केंद्र में हर पांच पद में एक ख़ाली।
- दावा 6: टीएमसी राज में महिलाओं पर अपराध बढ़े।
- तथ्य: कोलकाता चार साल सबसे सुरक्षित शहर रहा।
- दावा 7: पीएम आवास योजना का नाम बदला गया।
- तथ्य: केंद्र ने 11 लाख लाभार्थी वंचित रखे, बंगाल ने 'बंग्लार बाड़ी' से 32 लाख घर दिए।
मोदी का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड
ये सात पॉइंट्स सिर्फ़ एक रैली के नहीं, बल्कि 2014 से चले आ रहे पैटर्न का हिस्सा हैं। अब मोटा-मोटा अंदाज़ा लगाएं: पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंचों चुनावी रैलियों, संसद में संबोधन, साक्षात्कार, और 'मन की बात' से कितनी बार झूठ बोला या तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा? फ़ैक्ट-चेकर इन (FactChecker.in) ने 2014-2019 के बीच कम से कम 43 बड़े दावों को ग़लत साबित किया- FDI के आंकड़े, एयरपोर्ट निर्माण, स्मार्ट सिटी फंड, ग्रामीण विद्युतीकरण आदि। ऑल्ट न्यूज़, बूम लाइव, स्क्रॉल और द क्विंट जैसी एजेंसियों ने हर साल या हर चुनाव में दर्जनों उदाहरण और दस्तावेज़ पेश किए। 2017 में ऑल्ट न्यूज ने 10 बड़े झूठों की सूची बनाई। 2024 लोकसभा चुनाव में स्क्रॉल ने पांच दिनों के भाषणों को 'झूठों का कैटलॉग' बताया। कुल मिलाकर स्वतंत्र फैक्ट-चेकर्स ने सैकड़ों ऐसे उदाहरण रिकॉर्ड किए हैं। ट्रंप की तरह रोज़ाना ट्रैकिंग नहीं हुई, लेकिन चुनावी मौक़ों पर यह संख्या सैकड़ों में पहुंच जाती है।
ऐतिहासिक तत्वों का तोड़-मरोड़
पुराने उदाहरणों को देखें तो पैटर्न और स्पष्ट हो जाता है। 2018 कर्नाटक विधानसभा चुनाव रैली में मोदी ने दावा किया कि जवाहरलाल नेहरू सरकार ने फ़ील्ड मार्शल केएम करियप्पा और जनरल केएस थिमय्या का अपमान किया। पीएम मोदी ने कहा कि 1948 में थिमय्या आर्मी चीफ़ थे और कृष्णा मेनन डिफेंस मिनिस्टर। फैक्ट-चेकर्स ने पोल खोली—थिमय्या 1948 में आर्मी चीफ नहीं थे, मेनन 1957 में रक्षा मंत्री बने थे। यह ऐतिहासिक तथ्यों का सीधा तोड़-मरोड़ था, भावनाएं भड़काने के लिए।
कांग्रेस के घोषणा पत्र पर झूठ
2024 लोकसभा चुनाव रैलियों में मोदी ने बार-बार कहा कि कांग्रेस का मेनिफ़ेस्टो 'महिलाओं के मंगलसूत्र छीनने' और संपत्ति बांटने का वादा करता है। OBC आरक्षण मुसलमानों को देने का दावा किया। 'द हिंदू' और फैक्ट-चेकर्स ने जांच की—मेनिफेस्टो में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। विरासत टैक्स का मुद्दा तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। ये दावे रैलियों में दोहराए गए, वायरल हुए, लेकिन बाद में ख़ारिज हो गए।
आर्थिक मुद्दों पर खोखले दावे
आर्थिक दावों में भी यही चला। 2014-19 के बीच कई रैलियों में मोदी ने कहा कि 2.5 साल में 130 बिलियन डॉलर FDI आया—वास्तविक आंकड़ा 101.72 बिलियन था (फैक्टचेकर इन)। ग्रामीण विद्युतीकरण में 95% सफलता का दावा किया, लेकिन स्वतंत्र रिपोर्ट्स में गुणवत्ता की कमी उजागर हुई। लॉकडाउन के दौरान सरकार की कई बातें 'आधे सच्चे और पूरे झूठ' साबित हुईं—कारवां मैगजीन ने मिसडायरेक्शन और लाइज़ की लंबी सूची बनाई।राष्ट्रीय मीडिया की संदिग्ध भूमिका
राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका यहां संदिग्ध है। कई चैनल रैली को 'ऐतिहासिक' बताते हुए लाइव प्रसारित करते हैं, लेकिन डेरेक ओब्रायन का 7-पॉइंट चेक या फैक्ट-चेक रिपोर्ट्स को 'विपक्षी प्रचार' करार देते हैं। अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के आखिरी दिनों में 'द वॉशिंगटन पोस्ट' ने उनकी 30,573 झूठी या भ्रामक बातों की पूरी फ़ेहरिस्त छाप दी थी। एक स्वतंत्र फैक्ट-चेक टीम ने ट्रंप के हर भाषण, ट्वीट और बयान को ट्रैक किया और दस्तावेज़ किया। सवाल उठता है—ट्रंप की झूठ की तरह कब छपेगी पीएम मोदी के झूठ की फेहरिस्त? क्या भारतीय मीडिया या कोई स्वतंत्र संस्था कभी ऐसी व्यापक रिपोर्ट जारी करेगी? क्या कोई मीडिया संस्थान या स्वतंत्र एजेंसी ऐसी व्यापक रिपोर्ट बनाने और उसे जनता के सामने पेश करने की हिम्मत जुटा सकेगी?
पीएम मोदी बार-बार क्यों बोलते हैं झूठ?
तो सवाल फिर वही, आखिर पीएम मोदी चुनावी रैलियां में क्यों बोलते हैं झूठ? इसके कई कारण हैं। पहला कारण चुनावी रणनीति है। रैलियां भावनाओं का मंच हैं। 'टीएमसी ने युवाओं को धोखा दिया', 'मंगलसूत्र छीन लेंगे', 'घुसपैठियों की फैक्ट्री'—ये सरल नारे वायरल होते हैं। जटिल आंकड़ों की ज़रूरत नहीं। 'कन्फ़र्मेशन बायस' काम करता है—समर्थक इसे सच्चाई मानते हैं। 2014, 2019, 2024 के चुनावों में 'अच्छे दिन', 'घर-घर शौचालय' जैसे स्लोगन इसी रणनीति का हिस्सा थे।
दूसरा कारण है, सत्ता की जवाबदेही से बचना। 12 साल सत्ता में रहने के बावजूद 'पहली सरकार' या 'विपक्षी राज्य' को दोष देना आसान है। बंगाल में फंड रोकने का मुद्दा उलटकर 'विकास विरोध' बना दिया जाता है। CMIE रिपोर्ट की बेरोजगारी, महंगाई, किसान संकट से ध्यान हट जाता है। ट्रंप भी 'फेक न्यूज' का रोना रोकर अपनी असफलताओं को छिपाते थे।
तीसरा कारण, मीडिया और सोशल मीडिया का इको-चैंबर। रैली का 30 सेकंड क्लिप लाखों व्यूज़ पा लेता है। फ़ैक्ट-चेक आने तक कहानी तय हो चुकी होती है। संसद में विपक्ष के नोटिस पर बहस टाल दी जाती है। चौथा कारण, लोकप्रियता का दबाव। 'विकास पुरुष' की छवि बनाए रखने के लिए बड़ी तस्वीर पेश करनी पड़ती है। लेकिन वास्तविकता जटिल है—NEET घोटाले, कोविड के बाद की चुनौतियां। झूठे दावे इनसे ध्यान भटकाते हैं।
क्या पैटर्न सिर्फ मोदी-ट्रंप तक सीमत?
यह पैटर्न सिर्फ मोदी या ट्रंप तक सीमित नहीं है। और भी नेता झूठे दावे करते हैं। लेकिन सत्ता पक्ष की ज़िम्मेदारी ज़्यादा है। विपक्ष भी ग़लतियां करता है, पर प्रधानमंत्री पद से आने वाले दावों की विश्वसनीयता लोकतंत्र की नींव है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विश्वसनीयता की ये नींव कमज़ोर हुई है। ये लोकतंत्र को कमज़ोर करने की कोशिश है। लेकिन लोकतंत्र को मज़बूत करने की कोशिशें भी हो रही हैं। फ़ैक्ट-चेकर्स आज 'वॉचडॉग' बन चुके हैं।
लोकतंत्र में चुनावी भाषण मतदाताओं को सूचित करने के लिए होने चाहिए, भ्रमित करने के लिए नहीं। जब प्रधानमंत्री जैसे पद से सैकड़ों ग़लत दावे आते हैं तो विश्वास टूटता है। बंगाल 2026 का चुनाव इसी लड़ाई का प्रतीक है—'तथ्य बनाम मिथ्या।' मोदी जानते हैं कि भावनाएं तथ्यों से मज़बूत होती हैं। लेकिन इतिहास गवाह है—लंबे समय में तथ्य जीतते हैं। अब हर नागरिक का कर्तव्य है कि रैली के नारों से आगे जाकर आरटीआई, सरकारी पोर्टल और स्वतंत्र रिपोर्ट्स से जांच करे। ट्रंप की तरह मोदी की झूठ की पूरी फेहरिस्त कब छपेगी? शायद तब, जब मतदाता ख़ुद जागरूक हो जाएंगे और मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। लोकतंत्र की मज़बूती तभी है जब हम भावनाओं के साथ तथ्यों को भी जगह दें।
ट्रंप के मामले में अमेरिकी मीडिया ने 30,573 झूठों की पूरी डेटाबेस जारी की। भारत में मुख्यधारा अक्सर चुप रहती है। सूचना का लोकतंत्र अब यूट्यूब, एक्स और स्वतंत्र साइट्स पर शिफ्ट हो चुका है।