हर गणराज्य को एक दिन उस प्रश्न से गुजरना ही पड़ता है जो चुनावी जीत-हार से बड़ा होता है- सत्ता किस तरह के विपक्ष को जगह देती है, और किस तरह का विपक्ष वह अपने आचरण से स्वयं गढ़ती है।

पिछले सप्ताह एआई इम्पैक्ट समिट में, जहाँ भारत अपनी तकनीकी आकांक्षाओं का वैश्विक प्रदर्शन कर रहा था, कुछ युवाओं ने मंच की सुव्यवस्थित कोरियोग्राफी तोड़ दी। शर्ट उतारकर नारे दिखाए गए। प्रधानमंत्री और वॉशिंगटन के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते का विरोध था। गिरफ्तारियाँ हुईं। कैमरे मुड़े। प्रधानमंत्री ने इसे “गंदी और नंगी राजनीति” कहा। विपक्ष के कई चेहरे भी असहज दिखे। गंभीरता का क्षण कुछ देर के लिए तमाशे में बदल गया।

पर लोकतंत्र तमाशे से नहीं टूटता। वह कारण की कमी से टूटता है।
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जब असहमति शालीन भाषा छोड़कर देह-प्रदर्शन का रूप ले ले तो समझना चाहिए कि संवाद के औपचारिक द्वार सिकुड़ रहे हैं। जब विरोध सूट-बूट से उतरकर सड़क की भाषा में उतर आए तो यह संकेत होता है कि कहीं कोई वैध मंच चुपचाप बंद कर दिया गया है।

भारत का संविधान एकालाप के लिए नहीं रचा गया था। उसके निर्माताओं ने केंद्रीकृत सत्ता का दंश देखा था। इसलिए संस्थाएँ गढ़ी गईं—संसद बहस के लिए, न्यायपालिका संतुलन के लिए, चुनाव आयोग निष्पक्षता के लिए, और मीडिया प्रश्नों के लिए।

नेहरू, अपनी सीमाओं के बावजूद, यह जानते थे कि विपक्ष बोझ नहीं, सेफ़्टी वाल्व है। दबाव को बाहर निकलने का रास्ता चाहिए—अन्यथा भट्ठी फटती है। आज वही वाल्व पतला पड़ता दिखता है।

बहुमत सरकारों का भ्रम

चुनावी बहुमत अक्सर सरकारों को यह भ्रम दे देता है कि जनादेश ही नैतिक सत्य है। धीरे-धीरे नियामक नरम पड़ते हैं, प्रसारक विनम्र हो जाते हैं, अदालतें ठहर जाती हैं, आयोग झुक जाते हैं। यह टूटन की तरह दिखाई नहीं देता। यह तलछट की तरह जमता है। और एक दिन नदी का बहाव बदल चुका होता है।
  • जब संसद में जगह कम पड़ती है, राजनीति हैशटैग में शरण लेती है।
  • जब समिति कक्षों में प्रश्नों को समय नहीं मिलता, वे सड़कों पर नारे बन जाते हैं।
  • एआई समिट का विरोध भद्दा था—पर वह लक्षण था।
  • लक्षणों को दंडित करने से बीमारी नहीं जाती।

आलोचनात्मक पत्रकारिता 

लोकतंत्र में जिम्मेदारी बराबर नहीं बँटती। सत्ता स्वभाव से असमान होती है। कार्यपालिका राज्य की मशीनरी चलाती है, सार्वजनिक भाषा का तापमान तय करती है, और संस्थागत संस्कृति का मानक निर्धारित करती है। आत्मविश्वासी सरकार प्रश्नों को आमंत्रित करती है। वह ऐसे संरक्षक नियुक्त करती है जिनकी प्रतिष्ठा दल से बड़ी हो। वह संसद में असुविधाजनक सवालों को सहती है। वह मीडिया को ठेके पर नहीं देती। वह जानती है कि आलोचनात्मक पत्रकारिता दुश्मनी नहीं- स्वच्छता है।
विचार से और
पर विपक्ष भी निर्दोष नहीं है।
  • नागरिकों को नौटंकी नहीं, विकल्प चाहिए।
  • नारे नहीं, नीति चाहिए।
  • ट्रेंडिंग हैशटैग नहीं, ठोस वैकल्पिक बजट चाहिए।
  • जब विपक्ष स्वयं को प्रदर्शन में बदल देता है, तो वह गंभीरता खो देता है। 
  • एक गणराज्य को ऐसे आलोचक चाहिए जो मनाएँ, सिर्फ उकसाएँ नहीं।
दुनिया के परिपक्व लोकतंत्र उदाहरण देते हैं।
  • ब्रिटेन में प्रधानमंत्री प्रश्नकाल टकराव को संस्थागत बनाता है।
  • अमेरिका में वॉटरगेट सड़कों पर नहीं, सुनवाइयों और अदालतों में सुलझा।
  • दक्षिण अफ्रीका ने असहमति को गवाही में बदला।
  • ब्राज़ील में अदालतें और संसद बार-बार कार्यपालिका को संतुलित करती रही हैं।
संस्थाएँ इसलिए टिकती हैं क्योंकि रेफरी सीधा खड़ा रहता है।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम इससे भी गहरी सीख देता है।
गांधी ने विरोध को नैतिक अनुशासन में बदला।
आंबेडकर ने चेताया कि संविधान केवल प्रावधानों से नहीं चलता—संवैधानिक आचरण से चलता है।
  • सुनने की आदत।
  • मतभेद को मिटाए बिना बहस करने की आदत।
  • पद का सम्मान करने की आदत—भले पदधारी पसंद न हो।
  • किसी गणराज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा शोरगुल वाला विपक्ष नहीं, कमजोर विपक्ष है।
  • कमजोर विपक्ष अहंकार को आमंत्रित करता है।
  • अहंकार संस्थाओं को खोखला करता है।
  • खोखली संस्थाएँ हताश रणनीतियाँ जन्म देती हैं।

लोकतंत्र तख्तापलट से कम, छोटे-छोटे समझौतों से अधिक टूटते हैं। वे समझौते जो धीरे-धीरे स्वतंत्रता को सजावट में बदल देते हैं।

दुनिया का भरोसा किस पर?

भारत आज तकनीक, अर्थव्यवस्था और कूटनीति में वैश्विक ऊँचाई चाहता है। समिट महत्वाकांक्षा दिखाते हैं। पर दुनिया भरोसा उसी देश पर करती है जो घर में आत्मविश्वासी हो। निवेशक, साझेदार, प्रतिद्वंद्वी—सब देखते हैं कि अदालतें स्वतंत्र हैं या नहीं, चुनाव निर्विवाद हैं या नहीं, पत्रकार निर्भीक हैं या नहीं।

वे गणराज्य को उसकी रोशनी से नहीं, उसकी आत्म-सुधार की क्षमता से मापते हैं।

एआई समिट की घटना भूल जाएगी। नारे भी।
पर मूल प्रश्न नहीं मिटेगा—क्या भारत वैध असहमति की जगह बढ़ा रहा है या घटा रहा है?
क्या वह ऐसा विपक्ष गढ़ रहा है जो शासन कर सके, या उसे कार्टून में बदल रहा है?
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परिपक्व लोकतंत्र आलोचकों से चुप्पी नहीं चाहता—गंभीरता चाहता है।
टकराव को दबाता नहीं—संस्थागत करता है।
संवैधानिक पदों पर आज्ञाकारी नहीं—साहसी लोग चाहता है।

और समझता है कि शक्ति का सर्वोच्च रूप संयम है।

अंततः, गणराज्य एक आईना है।
वह शासकों और चुनौती देने वालों—दोनों को दिखाता है।

अगर प्रतिबिंब विकृत दिखे, तो आईना तोड़ने से चेहरा नहीं बदलता।
चेहरा बदलना पड़ता है।

विपक्ष की सेहत सत्ता की उदारता नहीं—सत्ता की सुरक्षा है।
जब आवाज़ें सदन में नहीं सुनी जातीं, वे कहीं और मंच ढूँढ लेती हैं।

बेहतर है कि सदन का दरवाज़ा खुला रहे।
और उसके भीतर बोली जाने वाली भाषा उस गणराज्य के योग्य हो—जिसकी सेवा का दावा हम सब करते हैं।