फांसी की सज़ा पा चुके गोडसे पर फिल्म कैसेः गंभीर प्रश्न है कि जब खुद भारत अपने देश में राष्ट्रपिता के हत्यारे को महिमामंडित करने वाली फिल्म को रोक नहीं रहा है तो उसे किसी दूसरे देश की पत्रकारीय सामग्री पर रोक लगाने की मांग करने का क्या अधिकार है?फिल्म कोई पत्रकारीय सामग्री नहीं होती। मनोरंजन की श्रेणी में आती हैं फिल्में। फिल्म सेंसर बोर्ड किसी फिल्म को अश्लीलता, अपराध, नफरत, उन्माद और भेदभाव फैलाने की अनुमति नहीं देता। फिर भी गोडसे का महिमामंडन और गांधी को दोषी ठहराने वाली फिल्म पर कोई अंकुश लगाने की जरूरत ही नहीं समझी जा रही है।
भारत की प्रतिष्ठा महत्वपूर्णः भारत में सत्ताधारी दल बीजेपी के लिए मुश्किल यह है कि उसे वर्तमान प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा की चिंता तो रहती है लेकिन वह स्वयं पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की प्रतिष्ठा की जरा सी भी परवाह नहीं करती। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पूर्व प्रधानमंत्रियों- पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, डॉ मनमोहन सिंह- पर लगातार आपत्तिजनक टिप्पणियां करते रहे हैं। इस बात को भुला दिया जाता है कि भारत की प्रतिष्ठा सबसे महत्वपूर्ण है। मसला गंभीर तब हो जाता है जब सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा पाए नाथूराम गोडसे के कसीदे पढ़े जाने लगते हैं, फिल्में बनने लग जाती हैं और यह सब बड़े आराम से होने दिया जाता है।