वैसे तो दुनिया में अभी भी पाँच छह युद्ध जारी हैं और उनकी गंभीरता को कम नहीं माना जा सकता लेकिन ईरान पर इसराइल और अमेरिकी हमले के बाद लड़ाई ने जो स्वरूप लिया है वह भयावह है और विश्वयुद्ध ज्यादा दूर नहीं लगता। और पुराने दो विश्वयुद्धों से अलग बात यह है कि यह यूरोप की जमीन पर होने की जगह एशिया को अखाड़ा बनाए हुए है और अमेरिका दूर बैठा सारे तमाशे कर रहा है। अभी हमारे ऊपर सीधा हमला नहीं हुआ है न हमारी सीधी भागीदारी है लेकिन अर्थव्यवस्था, राजनयन, इतिहास, संस्कृति और समाज से लेकर हर स्तर पर हमारी इस इलाके से ऐसी भागीदारी है कि हम इससे अप्रभावित नहीं रह सकते।

एक तो यह हमारे पास है। दूसरे करीब एक करोड़ भारतीय इस इलाके के उन देशों में रहकर काम करते हैं जहां युद्ध अपने पूरे रौद्र रूप में शुरू हो चुका है। उनकी कमाई और रोजी-रोटी से ज्यादा उनकी जान की बन आई है और उनसे जुड़े हिन्दुस्तानी परिवारों और पूरे हिन्दुस्तान में बेचैनी महसूस की जा रही है। फिर तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने लगी है जिसका असर कितना और कैसा होगा इसकी कल्पना मुश्किल है। जंगी विस्फोटों और तेल तथा गैस के ठिकानों से होने वाले प्रदूषण का असर भी कहीं एक जगह भर नहीं रुकेगा। जंग वैसे भी कितने स्थायी दोस्त और उससे ज्यादा दुश्मन बना देता है।
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भारत का रुख क्या है?

भारत ने युद्ध के अरब देशों में पसरने और ईरान द्वारा अमेरिकापरस्त अरब देशों के ठिकानों पर आक्रमण करने के बाद शांति और अयुद्ध के पक्ष में बयान दिया है लेकिन अभी भी काफी सारे लोगों को इंतजार ही है कि वह ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई और उनके साथियों की हत्या की निंदा करे, ईरान पर इसराइली हमले और अमेरिकी दखल की निंदा करे। उसके बगैर उसका बयान अधूरा है और यही गिना जाएगा कि वह इसराइल और अमेरिका की कार्रवाई के पक्ष में है। इसमें यह तथ्य और जुड़ जाएगा कि हमले से ठीक पहले हमारे प्रधानमंत्री की इसराइल यात्रा होती है और वहां की संसद को संबोधित करने वाले वे पहला भारतीय प्रधानमंत्री बन जाते हैं। वैसे भी बीजेपी और संघ इसराइल का पक्षधर रहा है। अनेक समझौतों के साथ वह गर्मजोशी भी इसी पक्ष में ली जाएगी जो मोदी और नेतन्याहू के बीच दिखी।

इस बीच, भारत ने मुश्किल ठिकानों पर फंसे हिंदुस्तानियों को स्वदेश लाने का काम जरूर शुरू कर दिया है। लेकिन जब संख्या करोड़ के आसपास हो तो यह काम कैसा और कितना मुश्किल है यह भी कल्पना की जा सकती है।

जंग शुरू करने के पीछे अमेरिका या इसराइल की मंशा ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना या उसके परमाणु ठिकानों को ध्वस्त करना है, इस थ्योरी को आज कोई नहीं मानता। बल्कि अभी तक ईरान पर जो हमले हुए हैं उनमें स्कूल तो निशाने पर आये हैं लेकिन किसी परमाणु ठिकाने का नंबर नहीं आया है।

ईरान का रुख

और अभी तक ईरान का जो रवैया है और ईरानी आमजन में जो प्रतिक्रिया है उससे लगता नहीं कि वह बहुत आसानी से हथियार डालेगा या अमेरिका आसानी से उसके यहां वेनेजुएला जैसा सत्ता परिवर्तन करा लेगा। लगभग पचास साल से सत्ता पर काबिज मौजूदा सैनिक और धार्मिक जमात का ईरानी गठजोड़ वैसे भी इतना मजबूत बन चुका है कि वह किसी 86 साल के बूढ़े नेता के न रहने के चलते बिखरने वाला नहीं है। और अमेरिका ईरान में अपने सैनिक या सहयोगी सैनिक भेजकर वहां की लड़ाई में टिक पाएगा इसकी गुंजाइश भी नहीं लगती। वैसे भी अमेरिका ईरान में सत्ता परिवर्तन कराने का खेल खेलकर मात खा चुका है। यह लड़ाई कभी औरतों के नाम पर होती है तो कभी लोकतंत्र के नाम पर। अब वह सीधे जंग में उतरने के बाद ये नाम भी नहीं ले सकता। और वियतनाम से लेकर दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि वह इतने नाराज़ देश की सरजमीं पर क़दम भी रखने से बचेगा। वह बाहरी खेल से सत्ता परिवर्तन ज़रूर चाहेगा।
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भारत के लिए ईरान कितना अहम?

हमारे लिए ईरान और खामेनेई के पक्ष में बयान भी न दे पाने की वजह ईरानी शासन का अभी तक चला स्वरूप ही है। इसमें बीजेपी का इसराइल और मुसलमान ‘प्रेम’ तो कारण है ही, प्रधानमंत्री की ट्रम्प से ‘मैत्री’ भी एक कारण है। लेकिन सच कहें तो सबसे बड़ा कारण ईरान शासन का अब तक का रिकॉर्ड भी है जो सही मतलब में लोकतंत्र और औरतों के खिलाफ रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद इसी सरकार ने उससे व्यापारिक और अन्य संबंध रखे थे, प्रधानमंत्री वहां दौरा भी कर आये थे। और चाबहार बंदरगाह वाली संधि करके फूले न समाते थे। 

पर उससे भी बड़ी बात यह है कि खामेनेई की मौत के बाद ईरान का कसूर कम हो गया है और इसराइल तथा अमेरिका का कसूर प्रमुख बन गया है। ऐसा भी हो गया है कि आज ईरान खाड़ी के आधा दर्जन से ज्यादा अमेरिकापरस्त देशों के नागरिक ठिकानों पर सीधे हमला करने की ग़लती कर रहा है तब भी उसका कसूर कम लगता है। जिस बेहयाई और बर्बर ढंग से उसके शासन प्रमुख की हत्या की गई है और उसके यहाँ हमले हो रहे हैं उसमें हर जबाबी कार्रवाई को ‘उचित’ बताने के पर्याप्त तर्क मौजूद हैं।
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इसलिए भारत द्वारा शांति, अयुद्ध और स्थिरता के पक्ष में बयान देना सही हो सकता है लेकिन यह अपर्याप्त है। युद्ध आज जिस दौर में और भीषण स्वरूप में है और हम उसमें जिस तरह उलझे पड़े हैं वह इससे ज्यादा कुछ की मांग करता है। अक्सर युद्ध में सही गलत की चर्चा आपको एक पक्ष में खड़े होने और फिर उसके लिए युद्ध करने तक ले जाती है। इससे शांति और स्थिरता कभी नहीं आती। महाभारत की कथा सब जानते हैं और अंत भी सबको पता है। युद्ध का असली जबाब अहिंसा ही है जो सत्य के प्रति शत-प्रतिशत जबाबदेह होनी चाहिए। और हमारी शांति, स्थिरता और वसुधैव कुटुंबकाम की चाह के साथ हमें सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस भी होना चाहिए। यह सही है कि आज के राजनयन में देशहित सर्वोपरि है लेकिन एक झूठ का खेल हमें कहां ले जाता है यह हमने ऑपरेशन सिंदूर पर इन्हीं ट्रम्प साहब के सच झूठ के मामले में देखा है, इसी अमेरिका से व्यापार समझौते के लालच में देखा है। इसलिए सच के पक्ष में बोलाना, सच की बुनियाद पर रिश्ते बनाना ही समझदारी है, नैतिक है, इतिहास में नाम अमर करने वाला है।