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मसूद के वैश्विक आतंकी घोषित होने से ज़मीनी हालात बदलेंगे?

मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर देने से क्या पाकिस्तान में ज़मीनी हालात बदलेंगे? धार्मिक जमातों और फ़ौज के बीच हाफ़िज़ सईद ने जुगलबंदी करवाई और आज आलम यह है कि दुनिया में कहीं भी आतंकवादी हमला हो, शक की सुई सबसे पहले पाकिस्तान की ओर ही घूमती है। 
शेष नारायण सिंह

पाकिस्तानी आतंकवादी और जैश-ए-मुहम्मद के सरगना, मौलाना मसूद अज़हर को सुरक्षा परिषद् ने वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया है। दस साल की मशक्क़त के बाद अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन को यह सफलता मिली है। 2009 से ही यह कोशिश चल रही थी। चीन ने बार-बार प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया और हर बार मसूद अज़हर बच निकलता था। लेकिन इस बार चीन ने भी अपनी सहमति दे दी। सहमति देने के पहले प्रस्ताव के उन हिस्सों को निकलवा दिया जिसमें पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले का ज़िक्र था। चीन की शायद कोशिश यह थी कि वह इस काम का श्रेय भारत को न लेने दे लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ख़बर आते ही जयपुर की एक चुनावी सभा में इसका श्रेय ले लिया और मसूद अज़हर पर संयुक्त राष्ट्र में हुई कार्रवाई को अपनी सफलता बता दी।

पाकिस्तान ने दावा किया है कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के फ़ैसले को पूरी तरह लागू करेगा। वैश्विक आतंकवादी घोषित होने के बाद मसूद अज़हर के सारे बैंक खाते बंद कर दिए जाने चाहिए, उसको हथियार रखने से रोका जाना चाहिए और उसकी यात्राओं पर रोक लगा दी जानी चाहिए।

जानकार बताते हैं कि पकिस्तान ऐसा कुछ नहीं करेगा। दुनिया ने देखा है कि हाफ़िज़ सईद भी वैश्विक आतंकवादी घोषित होने के बाद पाकिस्तान में पूरी शानो-शौकत से रह रहा है।

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पाकिस्तान की ऐसी हालत क्यों?

पाकिस्तान ने आतंकवाद को अपना हथियार बनाकर बहुत बड़ी ग़लती की है। नतीजा यह है कि वह अपने 70 साल के इतिहास में सबसे भयानक मुसीबत के दौर से गुज़र रहा है। आतंकवाद का भस्मासुर उसे निगल जाने की तैयारी में है। देश के हर बड़े शहर को आतंकवादी अपने हमले का निशाना बना चुके हैं। पाकिस्तान का विखंडन हुआ तो उसके इतिहास में बांग्लादेश की स्थापना के बाद यह सबसे बड़ा झटका माना जाएगा। अजीब बात यह है कि पड़ोसी देशों में आतंकवाद को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के चक्कर में पाकिस्तान ख़ुद आतंकवाद का शिकार हो गया है। 

जब अमेरिका की मदद से पाकिस्तानी तानाशाह जनरल ज़िया उल हक़ आतंकवाद को अपनी सरकार की नीति के रूप में विकसित कर रहे थे तभी दुनिया भर के समझदार लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि आतंकवाद की आग उनके देश को ही लपेट सकती है। लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी। 

जनरल ज़िया ने धार्मिक उन्मादियों और फ़ौज के ज़िद्दी जनरलों की सलाह से देश के बेकार फिर रहे नौजवानों की एक जमात बनायी थी जिसकी मदद से उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान और भारत में आतंकवाद की खेती की थी। उसी खेती का ज़हर आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवालिया निशान बन कर खड़ा हो गया है। अमेरिका की सुरक्षा पर भी उसी आतंकवाद का साया मंडरा रहा है जो पाकिस्तानी हुक्मरानों की मदद से स्थापित किया गया था। दुनिया जानती है कि अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन, अल क़ायदा अमेरिकी पैसे से ही बनाया गया था और उसके संस्थापक ओसामा बिन लादेन अमेरिका का ख़ास चेला हुआ करता था। बाद में लादेन ने ही अमेरिका पर आतंकवादी हमला करवाया और पाकिस्तान की हिफाज़त में आ गया, जहाँ उसको अमेरिका ने पाकिस्तानी फ़ौज की नाक के नीचे से पकड़ा और मार डाला। ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अमेरिका की विदेशनीति में पाकिस्तान के प्रति रुख में ख़ासा बदलाव आया है।

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अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है पाक

आज हालात यह हैं कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व की लड़ाई में इतनी बुरी तरह से उलझ चुका है कि उसके पास और किसी काम के लिए फ़ुर्सत ही नहीं है। आर्थिक तबाही के कगार पर खड़े पाकिस्तान के पास सऊदी अरब और चीन से क़र्ज़ के सिवा आर्थिक जंजाल से बचने का और कोई तरीक़ा नहीं है। यह याद करना दिलचस्प होगा कि भारत जैसे बड़े देश से पाकिस्तान की दुश्मनी का आधार कश्मीर है। वह कश्मीर को अपना बनाना चाहता है, लेकिन आज वह इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ से उसको कश्मीर पर कब्ज़ा तो दूर, अपने चार राज्यों को बचा कर रख पाना ही टेढ़ी खीर नज़र आ रही है। कश्मीर के मसले को ज़िंदा रखना पाकिस्तानी शासकों की मजबूरी है। 

मसूद अज़हर और उसी की तरह के अन्य आतंकवादी हाफ़िज़ सईद और सैय्यद सलाहुद्दीन जैसे लोगों के चलते पाकिस्तान की छवि बाक़ी दुनिया में एक असफल राष्ट्र की बन चुकी है। अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे पाकिस्तान में आतंकवादियों का इतना दबदबा कैसे हुआ, यह समझना कोई मुश्किल नहीं है।

फ़ौज और धार्मिक अतिवाद का गठजोड़

पाकिस्तान की आज़ादी के कई साल बाद तक वहाँ संविधान नहीं तैयार किया जा सका था। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की बहुत जल्दी मौत हो गयी और सहारनपुर से गए और नए देश के प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान का क़त्ल कर दिया गया। उसके बाद वहाँ धार्मिक लोगों की ताक़त बढ़ने लगी। धर्म के सहारे राजनीति करने वालों ने फ़ौज को बहुत महत्व देना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि जब संविधान बना तो फ़ौज देश की राजनीतिक सत्ता पर कंट्रोल कर चुकी थी। जैसा आजकल भारत में है उसी तरह धार्मिक जमातों का प्रभाव बहुत तेज़ी से बढ़ रहा था। पाकिस्तान के इतिहास में एक मुकाम यह भी आया कि सरकार के मुखिया को नए देश को इसलामी राज्य घोषित करना पड़ा। 

पाकिस्तान में अब तक चार फ़ौजी तानाशाह हुक़ूमत कर चुके हैं, लेकिन पाकिस्तानी समाज और राज्य का सबसे बड़ा नुक़सान जनरल ज़िया-उल-हक़ ने किया। उन्होंने पाकिस्तान में फ़ौज और धार्मिक अतिवादी का गठजोड़ कायम किया जिसका खामियाज़ा पाकिस्तानी समाज और राजनीति आजतक झेल रहा है।

पाकिस्तान में सक्रिय सबसे बड़ा आतंकवादी हाफ़िज़ सईद जनरल ज़िया की ही पैदावार है। हाफ़िज़ सईद तो मिस्र के काहिरा विश्वविद्यालय में दीनियात का मास्टर था। उसको वहाँ से लाकर ज़िया ने अपना धार्मिक सलाहकार नियुक्त किया। धार्मिक जमातों और फ़ौज के बीच उसी ने सारी जुगलबंदी करवाई और आज आलम यह है कि दुनिया में कहीं भी आतंकवादी हमला हो, शक की सुई सबसे पहले पाकिस्तान पर ही जाती है। आज पाकिस्तान एक दहशतगर्द और असफल कौम है और आने वाले वक़्त में उसके अस्तित्व पर सवाल बार-बार उठेगा। पाकिस्तान को अपने राष्ट्रहित का ध्यान रखते हुए आतंकवादियों को संरक्षण देने से बाज़ आना चाहिए वरना उसकी तबाही की रफ़्तार और तेज़ हो जाएगी।

शेष नारायण सिंह
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