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सिर्फ़ मनमोहन को कोसकर डूबती अर्थव्यवस्था को संभालेंगी निर्मला?

देश की अर्थव्यवस्था की ख़राब हालत को लेकर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में जो कहा वह भले ही गंभीर है पर देश के अख़बारों में इसे वैसी प्रमुखता नहीं मिली जैसी आम तौर पर इस सरकार के आरोपों या कांग्रेस के ख़िलाफ़ लगाए जाने वाले आरोपों को मिलती रही है। उन्होंने कहा है, ‘... सरकारी बैंक अब तक उस दलदल से बाहर आने के लिए सरकार के इक्विटी इनफ्यूज़न पर आश्रित हैं। राजन ने असेट क्वालिटी रिव्यू ज़रूर किया, लेकिन आज बैंकों की जो हालत है वह उस समय से शुरू हुई है।’ रघुराम राजन इसका जवाब दे चुके हैं फिर भी निर्मला सीतारमण ने इसे दोहराया है।

वैसे तो यह बैंकों के बारे में कहा गया है पर सब जानते हैं कि बैंकों की यह हालत क्यों और कैसे हुई है। यही नहीं, बैंकों की हालत को लेकर इस समय लोगों की चिंता पीएमसी बैंक के मामले में रिज़र्व बैंक का आदेश है। नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या आदि का क़र्ज़ लेकर विदेश भाग जाना भी चर्चा में रहा है। ये किसके क़रीबी हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में बैंकों की हालत के लिए रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ज़िम्मेदार ठहराना कहीं से किसी को ठीक नहीं लगेगा। इस बयान को अख़बारों में प्रमुखता नहीं मिलने से इस बात की पुष्टि भी हो गई है।

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मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि निर्मला सीतारमण का ऐसा कहना ‘नाच न आवे आँगन टेढ़ा’ जैसा मामला है और लोगों को उनकी बातों पर यक़ीन नहीं है। अपनी या अपने पूर्ववर्ती या अपनी पार्टी की सरकार की कमज़ोरी के लिए पिछली सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा देना और अभी की हालत के लिए आलोचना करने वाले को ही ज़िम्मेदार बताना भी राजनीति में बहुत गंभीर नहीं होता। लेकिन देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति जब बेहद ख़राब लग रही है, सरकार के पास इसे ठीक करने की कोई योजना नहीं है और इसे छिपाने, झुठलाने की कोशिशें हो चुकी हैं तब मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री को ख़राब आर्थिक हालत के लिए ज़िम्मेदार ठहराने का मतलब है कि निर्मला सीतारमण को मनमोहन सिंह के बारे में बताए जाने की ज़रूरत है। आर्थिक मामलों में अपने ज्ञान के बारे में नरेंद्र मोदी ख़ुद बता चुके हैं। इसलिए मनमोहन सिंह पर नरेन्द्र मोदी के आरोपों का वह मतलब नहीं है जो वित्त मंत्री और पूर्व रक्षा मंत्री तथा जेएनयू से पढ़ी निर्मला सीतारमण के बयान या आरोप का है।

मनमोहन सिंह ऐसे नहीं हैं कि उनपर फ़ोन करके अपात्र को क़र्ज़ दिलाने का आरोप लगाया जाए और कोई मान ले। प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री या रिज़र्व बैंक के गवर्नर के स्तर से किसी चाय या पकौड़े वाले को पचास हज़ार या लाख रुपए का क़र्ज़ देने की सिफ़ारिश नहीं की जाएगी और न ही ऐसे मामले इतने होंगे कि दो-चार नाम न गिनाए जा सकें। यही नहीं, राशि भी इतनी नहीं होगी कि कोई 10 साल बाद बैंक बैठना शुरू करें। 

जहाँ तक अर्थशास्त्र और आर्थिक ज्ञान की बात है, मनमोहन सिंह को 40 साल से ज़्यादा का अनुभव है और वह अर्थशास्त्र पढ़ाने से लेकर वाणिज्य व उद्योग मंत्री के सलाहकार, मुख्य आर्थिक सलाहकार, रिज़र्व बैंक के गवर्नर और योजना आयोग (अब नीति आयोग) के प्रमुख रह चुके हैं।

वह वित्त मंत्री और दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं और यह सब किसी राजनीति या धर्म के नाम पर नहीं, बल्कि शुद्ध योग्यता और प्रतिभा से हासिल कर पाए हैं।

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जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे...

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से चली आ रही आर्थिक नीति के क्रम में 1990-91 के दौर में जब आर्थिक अनिश्चितता जैसी स्थिति थी, उसे बदलने या उसपर सोचने की ज़रूरत थी तो पी.वी. नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बना दिया था। और तब तक उनका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं था। फिर भी उन्हें वित्त मंत्री बनाना देशी-विदेशी संस्थाओं को यह बताना था कि देश के आर्थिक मामले मज़बूत हाथों में हैं। उस समय तक देश में सरकारी उपक्रमों को बढ़ावा देने की नीति थी जो बाद में उदारीकरण के रास्ते चल पड़ी और अर्थव्यवस्था का ढाँचा ही बदल गया।

इस तरह के बुनियादी परिवर्तन को इतनी कामयाबी मिली कि जब समय आया तो 2004 में उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया। यह चौकीदार बनकर या घुसकर मारने जैसे जुमले से चुनाव जीतने का ईनाम नहीं था। यह परिश्रम और योग्यता की सफलता थी।

प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल ऐसा रहा कि 2009 में फिर चुनाव जीत गए। और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद पाँच साल का कार्यकाल पूरा करके दोबारा प्रधानमंत्री बनने वाले पहले कांग्रेसी नेता बने। 2014 में हार के बाद अब तो झूठा प्रचार और निराधार आरोप लगता है पर यह मानना पड़ेगा कि मनमोहन सिंह राजनीतिक तौर पर बीजेपी का मुक़ाबला नहीं कर पाए। लेकिन इससे उनका अर्थशास्त्र कमज़ोर नहीं हो गया।

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मनमोहन सिंह क्या बोले?

मुमकिन है, भ्रष्टाचार रोकने के पैमाने पर वह खरे नहीं उतरे हों और इसीलिए जनता ने उन्हें और उनकी पार्टी को लगातार तीसरी बार नहीं चुना हो। पर राजनीतिज्ञ तो वह पहले भी नहीं थे और वह राज्य सभा के ही सदस्य रहे हैं। इसीलिए निर्मला सीतारमण के आरोप का उन्होंने कोई जवाब ही नहीं दिया। उनके आरोप पर मनमोहन सिंह की प्रतिक्रिया पढ़ने लायक है। उन्होंने कहा है, ‘मैंने अभी-अभी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान देखे हैं। मैं उस बयान पर टिप्पणी करना नहीं चाहता पर इससे पहले कि कोई अर्थव्यवस्था को ठीक कर सके उसे इसके कारणों या बीमारियों को ठीक से जानना ज़रूरी है। सरकार अपने विरोधियों पर आरोप लगाने में पूरे मन से लगी हुई है। इसीलिए ऐसा समाधान तलाशने में असमर्थ है जो अर्थव्यवस्था को फिर से दुरुस्त करना सुनिश्चित करेगा।’ मनमोहन सिंह का ऐसा कहना बताता है कि देश अनुभवी हाथों में नहीं है।

जहाँ तक निर्मला सीतारमण की बात है, पिछली सरकार में रक्षा मंत्री रहते हुए वह रफ़ाल मामले में ‘द हिन्दू’ में छपी संपादक एन. राम की रिपोर्ट पर और उनकी पत्रकारिता पर टिप्पणी कर चुकी हैं और अब बैंकों की ख़राब हालत के लिए मनमोहन सिंह और रघुराम राजन को ज़िम्मेदार बताकर अपनी ही किरकिरी करा रही हैं।

संजय कुमार सिंह
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