बीच कूप-मंडूक जाहिलों के ऐसे-ऐसे बयान और वीडियोज देखने को मिले कि मेरा बी.पी. हाई हो गया। नागपुर में 22 फरवरी को वामन मेश्राम के नेतृत्व में लाखों बहुजनों ने आरएसएस का घेराव किया। एक ब्राह्मण ने फेसबुक पर लिखा कि ‘ये लोग क्या उखाड़ लेंगे?’ यह उन लोगों की सोच है, जिन्हें कभी नहीं सुधरना है, और जो हमेशा हैवान ही बने रहना चाहते हैं। ज़ाहिर है कि ऐसे लोग अपने उन मातापिता की संतान हैं, जिन्हें नफ़रत और हैवानियत विरासत में मिली है, और जो उनके लिए सबसे मूल्यवान सभ्यता है।

एक वीडियो में देखा, एक जाहिल लड़की चीख-चीखकर बोल रही थी कि यह देश कभी धर्मनिरपेक्ष नहीं था और न होगा। उसके बयान से ही लग रहा था कि वह हैवानियत की शिक्षा प्राप्त किए हुए है। वह सुशिक्षित नहीं है, इसलिए उसे इतिहास का भी ज्ञान नहीं है। भारत में आठ सौ साल मुसलमानों ने शासन किया। किसी भी सुल्तान और मुगल बादशाह ने भारत को इस्लामी राष्ट्र नहीं बनाया, जबकि वे आसानी से बना सकते थे। लगभग दो सौ साल अंग्रेज़ों ने भारत पर राज किया, पर अंग्रेज़ों ने भी भारत को ईसाई राष्ट्र नहीं बनाया। वह जाहिल लड़की किस आधार पर कह रही है कि भारत कभी धर्मनिरपेक्ष नहीं था। 1947 में देश आज़ाद हुआ और आज़ाद देश के नेताओं ने भी हिन्दू राज्य नहीं, धर्मनिरपेक्ष राज्य क़ायम किया। संविधान में भी भारत धार्मिक राज्य नहीं है। लेकिन उस जाहिल लड़की को इसका भी ज्ञान नहीं है। उसके दिमाग़ में बस वही कचरा भरा हुआ है, जो आरएसएस और भाजपा के जाहिलों ने भरा है।
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त्रासदी राजनीति से भी पहले साहित्य में घुसी

भयानक पीड़ा तो यह देखकर हुई कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के ब्राह्मण जज भी अपनी ज़हालत और संवेदनहीनता का परिचय दे रहे हैं। संक्षेप में यह कि ब्राह्मणवाद का रूपवाद मानवता के लिए एक भयानक त्रासदी है। यह भयानक त्रासदी राजनीति से भी पहले साहित्य में घुस गई थी। रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी तक, परशुराम चतुर्वेदी से लेकर रामविलास शर्मा तक, शम्भू नाथ से लेकर बद्रीनारायण तिवारी तक, नया-पुराना शायद ही कोई ब्राह्मण लेखक हो, जो ब्राह्मणवाद न चलाता हो। ब्राह्मणवाद का सीधा अर्थ है स्वतन्त्रता को न मानना, समानता को न मानना, भ्रातृत्व को न मानना, और वर्णव्यवस्था-जातिभेद में विश्वास करना। यही ब्राह्मण-बुद्धि या ब्राह्मण-खोपड़ी है। इसी आठ मार्च को ब्राह्मण-खोपड़ी के सारे सवर्ण लोग ओबीसी के अधिकारों के ख़िलाफ़ दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठे हो रहे हैं। सारे सवर्णों में ब्राह्मण भी हैं, क्षत्रिय भी हैं और वैश्य भी हैं।

क्षत्रियों और वैश्यों का ब्राह्मणवाद से क्या सम्बन्ध? इस खेल को समझिए। क्षत्रियों ने अपना कोई क्षत्रियवाद नहीं चलाया, उनकी बुद्धि ब्राह्मण खोपड़ी की ही बुद्धि है। इसलिए क्षत्रिय भी ब्राह्मणवाद चलाता है। वह ब्राह्मण के सामने दोयम दर्जे का नागरिक है, जिसे वह इसीलिए सहर्ष स्वीकार करता है, क्योंकि वह ब्राह्मण-बुद्धि से चलता है। मनुस्मृति ने क्षत्रियों को बुद्धि नहीं दी है, उसे बस एक ही काम दिया है, शूद्रों से ब्राह्मणों की रक्षा करना। शूद्र ब्राह्मण और उसकी व्यवस्था के ख़िलाफ़ सिर न उठायें, इसके लिए मनु क्षत्रिय को शूद्र पर हर जुल्म करने को कहता है। 

यह तो भला हो, लोकतंत्र का, जो कुछ क्षत्रिय पढ़-लिखकर अच्छी नौकरियों में आ गए, डीएम-एसपी बन गए हैं। किन्तु उनकी बुद्धि ब्राह्मणवाद वाली ही है। उन्होंने अपनी अलग बुद्धि विकसित नहीं की। इसलिए साहित्य में शुकदेव सिंह भी ब्राह्मणवाद चलाते थे, पी. एन. सिंह भी, नामवर सिंह भी, और आज के ठाकुर भी।

वैश्य भी ब्राह्मण के आगे अपनी तीसरे दर्जे की नागरिकता को सहर्ष स्वीकार करते हैं। उसे ब्राह्मण-व्यवस्था में अपनी तीसरी श्रेणी पर कोई अफ़सोस नहीं है। वैश्यों ने भी अपना वैश्यवाद नहीं चलाया, क्योंकि उसकी बुद्धि भी ब्राह्मण खोपड़ी से विकसित हुई है। इसलिए वह भी ब्राह्मणवाद ही चलाता है। वह ब्राह्मणवाद के दायरे से बाहर कुछ नहीं सोचता। ऐसा शायद ही कोई वैश्य परिवार हो, जो दो-चार ब्राह्मणों को न पालता हो। मंदिर निर्माण से लेकर ब्राह्मण महात्माओं के प्रवचनों, उनके ठहरने और उनकी दक्षिणा आदि का सारा प्रबंध वैश्य समुदाय ही करता है। उसकी अपनी कोई बुद्धि नहीं है। इसलिए भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर पुरुषोत्तम अग्रवाल तक सब ब्राह्मणवाद चलाते हैं।

भारत में केवल दो वर्गों ने ब्राह्मण-खोपड़ी का परित्याग किया और अपनी अलग बुद्धि का विकास किया। उनमें सिख और दलित-पिछड़े आते हैं। हालाँकि उच्च वर्ग की पिछड़ी जातियां, जैसे यादव, पटेल आदि ब्राह्मण-बुद्धि से ही चलते हैं। लेकिन दलित वर्गों ने अपनी ही अलग चेतना और अलग बुद्धि का विकास किया। दलितों ने आरम्भ से ही ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ विद्रोह किया, और उसके उल्ट स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व के मूल्यों को स्वीकार किया और जातिविहीन समाज के निर्माण पर ज़ोर दिया।
विचार से और
इतिहास में जिसने भी ब्राह्मण बुद्धि को नकारा, क्रान्ति उसी ने की। वे चाहे बुद्ध हों, महावीर हों, चार्वाक हों, नागार्जुन हों, और चाहे मीराबाई तथा रमा पंडिता जैसी स्त्रियाँ हों। अक्क महादेवी, आण्डाल और लल्ला जैसी महिलाएं भी ब्राह्मण खोपड़ी से नहीं चलीं, और एक बड़ी सामाजिक क्रान्ति की। किन्तु ब्राह्मण-खोपड़ी ने उन पर शिव, कृष्ण और विष्णु भक्ति का रंग चढ़ाकर उनकी क्रान्ति का सत्यानाश करके ही चैन लिया।
 
सिख कभी ब्राह्मण खोपड़ी से नहीं चले। उन्होंने अपनी समतावादी विचारधारा पर अपने नए धर्म का निर्माण किया। ब्राह्मण खोपड़ी ने सिखों पर बहुत ज़ुल्म ढाए। ब्राह्मणों ने ही मुगलों को सिखों के गुरु साहेबान के ख़िलाफ़ भड़काया था कि वह इस्लाम के समानांतर आदि ग्रन्थ तैयार कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप सिखों का भारी नरसंहार हुआ और कई गुरु साह्रेबान शहीद कर दिए गए। लेकिन ब्राह्मण खोपड़ी सिखों को हिन्दू बनाने में क़ामयाब नहीं हुई, और न सिखों ने आदि गुरु ग्रन्थ साहब में किसी ब्राह्मण खोपड़ी की रचना शामिल की।

यह देश तभी बदलेगा, जब लोग ब्राह्मण-खोपड़ी से सोचना और चलना बंद करेंगे। गाँधी ब्राह्मण-खोपड़ी से चले थे, इसलिए समाज को नहीं बदल सके। किन्तु आंबेडकर अपनी बुद्धि से चले थे, और एक बड़ी सामाजिक क्रान्ति उन्होंने की, न सिर्फ दलितों की मुक्ति में, बल्कि देश के नवनिर्माण में भी।

(कँवल भारती की फेसबुक वॉल से साभार)