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राहुल का मोदी पर तंज, 3 विफलताएँ हार्वर्ड स्कूल के शोध के विषय

राहुल गाँधी ने मोदी सरकार की तीन बड़ी विफलताएँ बताते हुए तंज कसे हैं कि ये भविष्य में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के शोध के विषय हो सकती हैं। उन्होंने इन विफलताओं का ज़िक्र तब किया जब कोरोना संक्रमण के मामले में रूस को पीछे छोड़ते हुए भारत दुनिया में तीसरा सबसे ज़्यादा प्रभावित देश बन गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसने के लिए कोरोना पर दिए गए उनके भाषण को भी आधार बनाया और इसके साथ ही कोरोना संक्रमण की बढ़ती रफ़्तार को दिखाया है। उस भाषण में प्रधानमंत्री कोरोना को 21 दिनों में हराने और थाली-ताली बजाने की बात कह रहे हैं। 

राहुल ने इसको लेकर ट्वीट किया। उन्होंने ट्वीट में लिखा, 'असफलता पर एचबीएस (हार्वर्ड बिजनेस स्कूल) का आने वाले शोध- 

1. कोरोना।

2. नोटबंदी।

3. जीएसटी का कार्यान्वयन।' 

लेकिन इस ट्वीट की खास बात वह है जिसमें राहुल गाँधी ने एक वीडियो को शेयर किया है। वीडियो के सबसे ऊपरी हिस्से में लिखा है- कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई। इस वीडियो में कोरोना पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए कई भाषणों के कुछ अंश लिए गए हैं। वीडियो के बैकग्राउंड में प्रधानमंत्री का भाषण चलता दिखाया गया है और इसके ऊपर भारत में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को और कैसे देश तीसरे स्थान पर पहुँच गया। वीडियो में प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं, 'महाभारत का युद्ध 18 दिन में जीता गया था। आज कोरोना के ख़िलाफ़ युद्ध पूरा देश लड़ रहा है उसमें 21 दिन लगने वाले हैं।... ताली बजाकर के, थाली बजाकर के.... घंटी बजाकर के। ... मोमबत्ती, दीया, टॉर्च या मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाएँ।'

प्रधानमंत्री के उन भाषणों को इसमें शामिल किया गया है जिनमें उन्होंने जनता कर्फ़्यू और लॉकडाउन की घोषणा की थी। तब उन्होंने कहा था कि जनता कर्फ़्यू के दिन देश भर में सभी लोग स्वास्थ्य कर्मियों का ताली-थाली और घंटी बजाकर सम्मान करें। बाद में उन्होंने मोमबत्ती, दीया, टॉर्च या मोबाइल की फ्लैशलाइट के बारे में भी ऐसी ही बात कही थी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात 21 दिन में कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई जीतने की बात उन्होंने लॉकडाउन की घोषणा के एक दिन बाद अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के लोगों को संबोधित करते हुए कही थी।

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हालाँकि 25 मार्च से लागू 21 दिवसीय लॉकडाउन की समाप्ति पर भी कोरोना का संक्रमण ख़त्म नहीं हुआ और यह लगातार बढ़ता गया। लॉकडाउन से पहले 24 मार्च को क़रीब साढ़े पाँच सौ संक्रमण के मामले थे, लेकिन पहले लॉकडाउन की समाप्ति तक संक्रमित होने वालों की संख्या साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। 

इसके बाद लगातार लॉकडाउन को बढ़ाया जाता रहा और अभी भी जब लॉकडाउन जारी है संक्रमण के मामले क़रीब 7 लाख तक पहुँचने वाले हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के सबसे विश्वास पात्र व्यक्ति और देश के गृह मंत्री अमित शाह ने ही माना था कि कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने में ग़लती हुई होगी। शाह ने नौ जून को एक इंटरव्यू में कहा था कि 'हमसे कुछ ग़लती हुई होगी, हम कहीं कम पड़ गए होंगे'। हालाँकि इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि उनकी निष्ठा सही थी।

नोटबंदी

राहुल गाँधी ने ट्वीट में नोटबंदी को बड़ी विफलता क़रार दिया। वह काफ़ी पहले से ही इसे विफल बताते रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा करते हुए कहा था कि इसके पीछे मुख्य मक़सद कालाधन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है व साथ ही कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़नी है। जनता ने प्रधानमंत्री का पूरा साथ दिया और लगभग महीने भर बैंकों की लाइनों में रातें जागकर गुजारीं ताकि खर्चे लायक नकदी मिल सके।

लोगों को हो रही दिक्कतों के बाद सरकार पर इतना दबाव पड़ा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ तक कह दिया था, 'भाइयो बहनो, मैंने सिर्फ़ देश से 50 दिन माँगे हैं। 50 दिन। 30 दिसंबर तक मुझे मौक़ा दीजिए मेरे भाइयो बहनो। अगर 30 दिसंबर के बाद कोई कमी रह जाए, कोई मेरी ग़लती निकल जाए, कोई मेरा ग़लत इरादा निकल जाए, आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे, मैं खड़ा होकर...देश जो सज़ा करेगा वो सज़ा भुगतने को तैयार हूँ।'

लेकिन लोगों की दिक्कतें बाद में भी बनी रहीं। काफ़ी बाद में रिजर्व बैंक ने कहा कि नोटबंदी के समय आठ नवंबर, 2016 को मूल्य के हिसाब से 500 और 1,000 रुपये के 15.41 लाख करोड़ रुपये के नोट चलन में थे और इनमें से 15.31 लाख करोड़ रुपये के नोट बैंकों में वापस आ चुके थे। अब तक जो रिपोर्टें आ रही हैं उसमें न तो देश से कालाधन व भ्रष्टाचार ख़त्म हुआ और न ही आतंकवाद ख़त्म हुआ। अर्थव्यवस्था चौपट हुई वो अलग। दुनिया भर से रिपोर्टें आ रही हैं कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर दूरगामी बुरा असर हुआ। अब सरकार भी यदि इसे सफल मानती तो नोटबंदी के फ़ायदे तो ज़रूर बताती। बता रही है क्या?

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जीएसटी का कार्यान्वयन

नोटबंदी के असर से अर्थव्यवस्था उबरनी शुरू ही हुई थी कि जीएसटी यानी माल एवं सेवा कर लागू कर दिया गया। सरकार की आलोचना की जाती है कि सरकार ने इसकी तैयारी नहीं कि थी और इसलिए बार-बार नियमों को बदलना पड़ा। व्यापारी वर्ग भी ख़ूब परेशान हुआ। कई रिपोर्टें बताती हैं कि जीएसटी देश के लिए अच्छा है लेकिन इसे सही तरीक़े से नहीं लागू किया गया और देश की अर्थव्यवस्था पर इसका असर काफ़ी ज़्यादा बुरा हुआ। 

अब कोरोना की मार से पहले ही अर्थव्यवस्था ऐसी हालत में पहुँच गई थी कि क़रीब-क़रीब सभी कोर सेक्टर की विकास दर नकारात्मक हो गई थी। रेटिंग एजेंसियों का आकलन बता रहा था कि जीडीपी बहुत कम रहने वाली है। लेकिन इस बीच कोरोना और लॉकडाउन ने पहले से ही ख़राब स्थिति में अर्थव्यवस्था को और चौपट कर दिया। 

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