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कांग्रेस की माँग, रफ़ाल पर कोर्ट अपना फ़ैसला वापस ले

कांग्रेस ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को रफ़ाल डील पर अपना फ़ैसला वापस ले लेना चाहिए। साथ ही उसे सरकार के ख़िलाफ़ न्यायालय की अवमानना का नोटिस जारी करना चाहिए। राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता आनंद शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को गुमराह किया जिसके आधार पर कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया है। शर्मा ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी के उनके साथियों को कुंभ में अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहिए। 
रफ़ाल डील पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद से ही कांग्रेस मोदी सरकार पर हमलावर है। पार्टी ने केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में तथ्यात्मक सुधार करने की बात पर हमला बोला है। रविवार को कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आनंद शर्मा ने कहा कि अदालत इस मामले का फ़ैसला करने के लिए सही जगह नहीं है। शर्मा ने कहा कि अगर पीएम ने कुछ ग़लत नहीं किया है तो वे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का सामना करने से क्यों डर रहे हैं। 
ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में लिखी इस बात पर -  कि सरकार सीएजी को रफ़ाल विमानों की क़ीमत से जुड़ी जानकारियाँ दे चुकी है और लोक लेख समिति (पीएसी) उसकी जाँच कर चुकी है -  कांग्रेस फ़ैसले वाले दिन से ही हमलावर बनी हुई है क्योंकि उसका कहना है, सीएजी ने रफ़ाल पर अपनी रिपोर्ट दी ही नहीं है इसलिए पीएसी द्वारा उसकी जाँच का सवाल ही नहीं उठता। उसका कहना है कि सरकार ने कोर्ट को ग़लत सूचना दी और इस ग़लत सूचना के कारण ही कोर्ट ने उसे क्लीन चिट दी। कांग्रेस इसी आधार पर चाहती है कि कोर्ट अपने फ़ैसले को वापस ले।
कांग्रेस की यह माँग जायज़ हो सकती है कि फ़ैक्ट में सुधार के बाद केस की वस्तुस्थिति में परिवर्तन आया है और इस कारण कोर्ट को अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। लेकिन इस ग़लती के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं है।
आपको मालूम होगा कि सरकार ने फ़ैसले के अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि फ़ैसले के पैराग्राफ़ 25 में सुधार कर लिया जाए ताकि अदालत के फ़ैसले से किसी तरह का संदेह या ग़लतफ़हमी पैदा न हो। सरकार ने कहा कि उसने कोर्ट को सीलबंद लिफ़ाफ़े में जो जानकारी दी थी, उसमें लिखा गया था कि सीएजी को रफ़ाल सौदे की क़ीमत से जुड़ी जानकारियाँ दे दी गई हैं (और) लोक लेखा समिति उसकी जाँच करती है। उसने यह नहीं कहा था कि लोक लेखा समिति ने इसकी जाँच कर ली है जैसा कि कोर्ट के फ़ैसले में लिखा हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार ने कोर्ट को ग़लत जानकारी नहीं दी बल्कि कोर्ट ने ही उसका ग़लत अर्थ निकाला था।
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