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पिच पर चीते की तरह भागने वाले जोंस ज़िदगी की रेस में रन-आउट क्यों हो गये?

1984 से लेकर 1994 तक के एक दशक के वन-डे करियर ने जोंस को पूरी दुनिया में एक अलग पहचान दी। औसत और स्ट्राइक रेट अगर दोनों को मिलाकर उस दौर के बल्लेबाज़ों का आकलन किया जाए तो जोंस सिर्फ महान विव रिचर्ड्स से ही उन्नीस थे। रिचर्ड्स की ही तरह जोंस ने वन-डे क्रिकेट में अपनी एक अलग छवि बनायी। 
विमल कुमार

भारत के पूर्व क्रिकेटर संजय बांगर ने ऑस्ट्रेलिया के पूर्व बल्लेबाज़ डीन जोंस के निधन के बाद टीवी पर कॉमेंट्री के दौरान एक दिलचस्प बात कही- जोंस अक्सर अंग्रेज़ी में H का जिक्र तीन संदर्भ में करते थे। HEROES, HAPPINESS और HARDSHIP

एक कोच के तौर पर जोंस अक्सर युवा खिलाड़ी से यही सवाल करते थे कि उनके हीरो कौन हैं, उन्हें किस बात से खुशी मिलती है और ज़िंदगी में उन्होंने किस तरह की तकलीफें झेली हैं। बहरहाल, इस बात में शायद ही दो राय हो कि एक क्रिकेटर के तौर पर दुनिया भर में कई युवा खिलाड़ियों के लिए वो हीरो थे। ऑस्ट्रेलिया और ऑस्ट्रेलिया से बाहर भी। 

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बल्लेबाज़ी की शैली बदली

अपने निराले अंदाज़ से वन-डे क्रिकेट में बल्लेबाज़ी की शैली बदलने वाले जोंस ने क्रिकेट प्रेमियों को पहले खेल के मैदान पर और बाद में ‘प्रोफेसर डीनो’ बनकर कॉमेंटटेर के रूप में ढेरों खुशियां दीं। और जहां तक तकलीफ झेलने की बात है तो खिलाड़ी के तौर पर उन्हें हमेशा इस बात का मलाल रहा होगा कि 46 से ज़्यादा का टेस्ट औसत होने के बावजूद उन्हें उस दौर में ऑस्ट्रेलिया के लिए सिर्फ 52 टेस्ट मैच ही खेलने को क्यों मिले। 

कसक हमेशा उन्हें शायद इस बात के लिए भी रहेगी कि सार्वजनिक तौर पर उन्होंने कॉमेंट्री के दौरान ‘ग़लतफहमी’ में साउथ अफ्रीका के बल्लेबाज़ हाशिम अमला को मज़ाक में ही सही आतंकवादी क्यों कह दिया था।

तीसरे टेस्ट में जड़ा दोहरा शतक

लेकिन, क्रिकेट हमेशा जोंस को एक बड़े जिगर वाले खिलाड़ी के तौर पर याद करेगा। बात जब भी जोंस की होगी तो भारत के साथ उनके अदभुत रिश्ते का ज़िक्र भी ज़रुर होगा। आखिर अपने तीसरे टेस्ट में ही जोंस ने एक ऐसा दोहरा शतक बनाया जिसे भारतीय ज़मीं पर खेली गयी महानतम पारियों में से एक गिना जाता है। उस समय के ऑस्ट्रेलियाई कोच बॉब सिंपसन ने उस पारी को किसी भी ऑस्ट्रेलियाई द्वारा खेली गई महानतम पारी बताया था। 

भारत में मिली शौहरत 

इसे कुदरत का महज एक संयोग ही कहा जा सकता है कि जिस देश में जोंस ने आखिरी सांस ली, उसी देश ने उन्हें उनके मुल्क से शायद ज़्यादा प्यार दिया और शौहरत दी। 1986 में चेन्नई टेस्ट में दोहरे शतक के अलावा भारत में खेले गये 1987 वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया को चैंपियन बनाने वाले एक बड़े हीरो जोंस भी थे। 

1984 से लेकर 1994 तक के एक दशक के वन-डे करियर ने जोंस को पूरी दुनिया में एक अलग पहचान दी। औसत और स्ट्राइक रेट अगर दोनों को मिलाकर उस दौर के बल्लेबाज़ों का आकलन किया जाए तो जोंस सिर्फ महान विव रिचर्ड्स से ही उन्नीस थे।

रिचर्ड्स की ही तरह जोंस ने वन-डे क्रिकेट में अपनी एक अलग छवि बनायी। जोंस ने दिखाया कि सिर्फ चौके, छक्के ही नहीं बल्कि चीते की तेज़ी से भागते हुए 1 रन को 2 में, 2 रन को 3 में और कभी-कभी ऑस्ट्रेलिया के विशालकाय मैदानों में 3 को 4 रन में बदलकर बिना जोखिम लिए तेज़ी से रन बनाये जा सकते हैं। आने वाली पीढ़ी के बेहतरीन कामयाब बल्लेबाज़ों ने इस फॉर्मूले को आजमाया जिसमें माइकल बेवन और धोनी जैसे बल्लेबाज़ भी आते हैं। 

क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद जोंस पूर्व ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज रिचो बेनो की तरह कॉमेंट्री में इतने कामयाब हुए कि शायद नई पीढ़ी को ये अहसास भी ना हो कि जोंस खुद अपने दौर में कितने उम्दा खिलाड़ी थे। मौजूदा दौर की टी20 क्रिकेट के लिए तो शायद एक स्वभाविक प्रतिभा। 

स्लेटर और स्टायरिस रोये

बहरहाल, क्रिकेट जगत हमेशा जोंस को एक शानदार खिलाड़ी के साथ बेहद हंसोड़, बेबाक, और करिश्माई शख्सियत के तौर पर याद करेगा। जोंस को याद करते हुए अगर पूर्व ऑस्ट्रेलियाई ओपनर माइकल स्लेटर की आँखें नम हो गईं तो न्यूज़ीलैंड के स्कॉट स्टायरिस भी कैमरे के सामने अपने आंसुओं को रोक नहीं पाये। 

शो मस्ट गो ऑन

ब्रेट ली ने मुंबई के ट्रायडेंट होटल में जोंस के आखिरी लम्हे में उन्हें बचाने की कोशिश की। लेकिन, जोंस के गुज़र जाने के कुछ ही घंटे बाद ये तमाम साथी खिलाड़ी कॉमेंट्री करते हुए नज़र आये। वजह थी कि जोंस खुद यही चाहते थे ऐसा ही हो। उनका हमेशा यही मानना रहा कि क्रिकेट से बड़ा कोई नहीं। शो मस्ट गो ऑन। 

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गावस्कर ने सुनाया किस्सा

लेकिन, चलते-चलते जो किस्सा सुनील गावस्कर ने सुनाया, वो शायद जोंस के व्यक्तित्व को बयां करने के लिए सबसे सही है। गावस्कर ने कहा कि कैसे एक बार इंग्लैंड में रेस्ट ऑफ़ द वर्ल्ड टीम के साथ खेलते हुए वो एक बस में जोंस के साथ ओल्ड-ट्रैफर्ड मैदान की तरफ जा रहे थे। बस में एक वीडियो चल रहा था और गावस्कर ने कहा कि मैं इस वीडियो को पूरा देखने के बाद दो मिनट देर से आता हूं। थोड़ी देर बाद जब गावस्कर मैदान के गेट के अंदर जाना चाह रहे थे तो गार्ड ने उन्हें ये कहकर रोक दिया कि वो अंदर नहीं जा सकते। 

गार्ड ने जब उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम सुनील गावस्कर बताया तो गार्ड तपाक से बोला- सही में जोंस ने मुझे पहले ही बता दिया था कि वो छोटा सा भारतीय आयेगा और खुद को गावस्कर बतायेगा। उसे एंट्री मत देना! 

लेकिन, हमेशा सबको हंसाने वाले जोंस ने अचानक ऐसे दुखद अंदाज़ में जिंदगी से विदा ली कि हर कोई यही सोच रहा है कि क्रिकेट में इतनी तेज़ी से भागने वाला क्रिकेटर आखिर ज़िदगी की रेस में रन-आउट’ कैसे हो सकता है…। 

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