इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि गैर मान्यता प्राप्त मदरसों को सिर्फ मान्यता नहीं होने के कारण बंद नहीं किया जा सकता। अदालत ने यूपी की योगी सरकार द्वारा बंद कराए गए मदरसे को 24 घंटे में खोलने का आदेश दिया है।
यूपी के इस गैर मान्यता प्राप्त मदरसे को खोलने का आदेश हाईकोर्ट ने दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के गैर मान्यता प्राप्त यानी प्राइवेट मदरसे को 24 घंटे में खोलने का आदेश दिया है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि एक गैर-मान्यता प्राप्त मदरसा मान्यता मिलने तक किसी सरकारी अनुदान का दावा नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है जो अधिकारियों को मदरसा शिक्षा बोर्ड द्वारा मान्यता न मिलने के कारण उसके संचालन और उसे बंद करने या रोकने की अनुमति देता हो। हाईकोर्ट के इस फैसले का एक अर्थ यह भी है कि यूपी में प्राइवेट मदरसे बेरोकटोक चलाए जा सकते हैं। पिछले दिनों ऐसी ही कमियों के आधार पर यूपी की योगी सरकार ने कई मदरसों पर बुलडोज़र चला दिए थे।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा पिछले साल मई में पारित आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रजा को राज्य मदरसा बोर्ड द्वारा मान्यता न मिलने के आधार पर बंद करने का निर्देश दिया गया था।
उस मदरसे ने जिला अधिकारी के आदेश को चुनौती देते हुए अदालत का रुख किया था।अदालत ने अपने फैसले में कहा, “नियमों में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है जो अधिकारियों को मदरसे के गैर-मान्यता प्राप्त होने के आधार पर उसके संचालन को रोकने की पावर देता हो।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मदरसा शिक्षा बोर्ड याचिकाकर्ता मदरसे के छात्रों को उसके द्वारा आयोजित परीक्षाओं में बैठने की अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं होगा।अदालत ने कहा, “छात्रों को मदरसे से प्राप्त योग्यता का लाभ राज्य सरकार से संबंधित किसी भी उद्देश्य के लिए दावा करने का हक नहीं होगा।”
अदालत ने आदेश दिया कि मदरसे के प्रवेश द्वार पर लगाई गई सील मुहर आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने के 24 घंटों के भीतर खोली जाए।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि उत्तर प्रदेश गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता, प्रशासन और सेवा विनियम, 2016 के नियम 13 में प्रावधान है कि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसा को कोई राज्य अनुदान नहीं मिलेगा, लेकिन इसमें यह नहीं कहा गया है कि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि वे सरकार से कोई अनुदान नहीं मांग रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में अंजुम कादरी बनाम भारत संघ मामले में अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया था। पहली श्रेणी, जो संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत संरक्षित है, उन मदरसों से संबंधित है जो राज्य से कोई सहायता या मान्यता नहीं मांगते, जबकि दूसरी श्रेणी उन मदरसों की है जो सहायता चाहते हैं। तीसरी श्रेणी उन मदरसों की है जो केवल मान्यता चाहते हैं लेकिन सहायता नहीं। अनुच्छेद 30(1), जो सहायता या मान्यता की आवश्यकता न रखने वाले मदरसों की रक्षा करता है, सभी अल्पसंख्यकों चाहे धार्मिक हों या भाषाई को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और प्रशासित करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है, ताकि वे अपनी अलग संस्कृति, लिपि और भाषा को संरक्षित रख सकें। याचिकाकर्ता मदरसे ने तर्क दिया कि वह पहली श्रेणी में आता है क्योंकि वह न मान्यता मांग रहा था और न ही सहायता, और संविधान के तहत संरक्षित है।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसा अनावश्यक जटिलताएं पैदा कर सकता है क्योंकि छात्रों को उससे प्राप्त योग्यता के आधार पर कोई लाभ दावा करने का हक नहीं होगा। इन तर्कों को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि गैर-मान्यता के आधार पर मदरसे के संचालन पर रोक लगाने वाला कोई नियम नहीं है।
मदरसों पर फैसला संविधान की रक्षा करता है: मौलाना मदनी
इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा गैर मान्यता प्राप्त मदरसों पर दिए गए ऐतिहासिक फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने इसे भारत के संविधान की सर्वोच्चता और उसके मूल सिद्धांतों की स्पष्ट पुष्टि बताया। मौलाना मदनी ने कहा कि यह फैसला उन सरकारों और अधिकारियों के लिए कड़ी फटकार है जो गैर मान्यता प्राप्त मदरसों और मक्तबों को बंद करने को उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्रवाइयां न केवल असंवैधानिक थीं बल्कि अंततः उनके लिए शर्मिंदगी का कारण बनीं।
उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद श्रावस्ती जिले के तीस मदरसों की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में कानूनी कार्यवाही कर रही है, और संगठन उत्तराखंड सरकार की कार्रवाइयों के खिलाफ भी लोकतांत्रिक उपाय तलाश रहा है। मौलाना मदनी ने कहा कि यह फैसला हमारी चल रही कोशिशों को काफी मजबूती प्रदान करता है। साथ ही, उन्होंने मदरसा प्रशासकों को सलाह दी कि वे अपने आंतरिक प्रबंधन और शैक्षिक मानकों को लगातार बेहतर बनाते रहें ताकि किसी भी हस्तक्षेप के लिए कोई बहाना न बचे।
मौलाना मदनी ने कहा कि हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केवल मान्यता न होने के आधार पर किसी मदरसे को बंद करना, सील करना या उसके संचालन में बाधा डालना आधार नहीं बन सकता। अदालत ने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा विनियम प्रशासन को गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद करने का कोई अधिकार नहीं देते।
उन्होंने कहा कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित संवैधानिक सिद्धांत की प्रभावी पुन: पुष्टि करता है, जिसके अनुसार वे अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान जो न सरकारी सहायता मांगते हैं और न मान्यता, भारत के संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत पूर्ण संरक्षण प्राप्त करते हैं।
मौलाना मदनी ने उत्तर प्रदेश सरकार और सभी अन्य राज्य सरकारों से अपील की कि वे इस फैसले और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के प्रकाश में अपनी नीतियों की समीक्षा करें तथा मदरसों के खिलाफ किसी भी मनमानी, अवैध या भेदभावपूर्ण कार्रवाई से तुरंत बचें।