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यूपी: अघोषित आपातकाल का सामना कर रहे किसान

कृषि क़ानूनों पर छिड़े विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे धरनों को गांधीवादी परंपरा का मानते हुए उसकी प्रवृत्ति को कहीं से आपत्तिजनक नहीं माना था। तब यूपी में इस तरह के जंगलराज के क्या मायने हैं? आज़ादी के बाद से यूपी लोकतांत्रिक धरना-प्रदर्शनों का केंद्र रहा है।
अनिल शुक्ल

7 जनवरी को वाराणसी के 8 सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गुंडा नियंत्रण एक्ट के तहत नोटिस थमा दिया गया। ये सभी ज़िले के गणमान्य नागरिक हैं। इनमें उप्र भाकपा किसान सभा के सचिव जयशंकर सिंह, किसान सभा (माकपा) के जिला सचिव रामजी सिंह, स्वराज अभियान के जिला संयोजक रामजनम यादव सहित अन्य किसान संगठनों के कार्यकर्ता हैं। 

सफाई देने का आदेश 

अपर जिला मजिस्ट्रेट रणविजय सिंह के हस्ताक्षरों से 29 दिसंबर को जारी नोटिस के जरिये इन सभी को आगामी 15 जनवरी को मजिस्ट्रेट न्यायालय में हाज़िर होकर सफाई देने का आदेश दिया गया है। इस नोटिस को रद्द किये जाने की मांग को लेकर बड़ी तादाद में शहर के गणमान्य और प्रबुद्ध जनों के हस्ताक्षर युक्त ज्ञापन वाराणसी के मंडल आयुक्त और एसएसपी की मेज पर जमा होने शुरू हो गए हैं।

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पीछा कर रहे पुलिसकर्मी

मिस्रिख (सीतापुर) में सक्रिय 'संगतिन किसान मज़दूर संगठन' की नेता ऋचा सिंह 7 जनवरी को पूर्वान्ह ट्रैक्टर रैली में शामिल होने के लिए अपने घर से स्कूटी से रवाना हुईं तो उन्होंने पाया कि 3 पुलिस वाले बाइक पर उनके पीछे हैं। कुछ ही दूर आरएमपी कॉलेज पर उन्हें रोक लिया गया। उन पुलिस वालों ने उनकी बात मिस्रिख कोतवाल से करवाई। कोतवाल ने उन्हें झाड़ लगाते हुए 'अनुरोध' किया कि वह घर लौट जाएँ। उन्होंने पुलिस अधिकारी का निर्देश नहीं माना और रैली में शरीक होने पहुँच गईं। पुलिस वाले लगातार उनका पीछा करते रहे। शाम 6 बजे जब वह घर से लखनऊ जाने के लिए रवाना हुई तो उन्हें घर से निकलते ही रोक लिया गया। कुछ ही देर में वहाँ सीओ सिटी, सिटी मजिस्ट्रेट आदि पहुँच गए। वह घर लौट आईं। साढ़े दस बजे तक वे वहीं उनके घर पर बैठे रहे। बड़े अफसरों के जाने के बाद छोटे पुलिसकर्मी घर के बाहर बैठ गए। 

अगली सुबह जब उन्होंने घर से बाहर कदम रखना चाहा तो उन्हें निकलने से रोका गया। उन्होंने बताया कि वह डॉक्टर को दिखाने जा रही हैं लेकिन उन्हें नहीं जाने दिया गया। कुछ ही देर में एसडीएम और कोतवाल एक सरकारी डॉक्टर को लेकर आ गए। डॉक्टर ने उन्हें जाँच करके 'चिंता की कोई बात नहीं' का सर्टिफिकेट दे दिया। 

9 से लेकर 11 जनवरी तक ऋचा सिंह को घर से बाहर नहीं निकलने दिया गया। 12 जनवरी को लखनऊ के किसान प्रदर्शन में शामिल होने के लिए वह चोरी छिपे घर से निकल सकीं।

सुरेन्द्र सिंह चाहर का मामला 

9 जनवरी को आगरा के गांव नगला परमाल के सुरेन्द्र सिंह चाहर सुबह 6 बजे किरावली तहसील में पूर्वाह्न होने वाली किसान पंचायत की तैयारियों के लिए निकल रहे थे, तभी पुलिस ने आकर उन्हें दबोच लिया। दिन भर ढूंढा गया लेकिन पता नहीं चला कि पुलिस उन्हें कहाँ ले गयी है। तब दोपहर को उनके साथियों ने एसएसपी के यहाँ धरना दिया तो पता चला कि फतेहपुर सीकरी पुलिस उन्हें पकड़ कर ले गयी है। जम कर हुए हो हल्ले के बाद अपराह्न उन्हें छोड़ा गया।

किसान आंदोलन पर देखिए चर्चा- 

उठा ले गई पुलिस 

9 जनवरी को ही आगरा के किसान नेता सोमवीर यादव अपने गाँव मदरा से दिल्ली बॉर्डर के धरने में शामिल होने के लिए निकल रहे थे, तभी डौकी थाना पुलिस उन्हें उठा कर ले गई। शाम तक उन्हें बिना लिखा-पढ़ी के थाने में बैठाये रखा। देर शाम को छोड़ा लेकिन फोन अगले दिन वापस करने को यह कह कर ले लिया कि सर्विलांस पर लगेगा। 

Yogi government against kisan andolan in up - Satya Hindi

'ऊपर से आदेश' 

30 दिसम्बर सुबह 6 बजे। कांग्रेस की मथुरा-वृन्दावन महानगर कमेटी के अध्यक्ष उमेश शर्मा एडवोकेट और उनके परिजन ठीक से जागे भी नहीं थे कि पुलिस उनके घर में धड़धड़ाती हुई घुस आई। पुलिस चौकी होलीगेट (थाना कोतवाली, मथुरा) के इंचार्ज सहित काई अन्य पुलिसकर्मियों ने उन्हें बताया लि वे शांति भांग के अंदेशे में शर्मा को 'हाउस अरेस्ट' करने के इरादे से आए हैं। 

शर्मा द्वारा इस सम्बन्ध में एसडीएम अथवा सिटी मजिस्ट्रेट के सीआरपीसी से संबंधित किसी आदेश को दिखाए जाने के बाबत पूछे जाने पर जवाब मिला कि ऐसा कोई आदेश उनके पास नहीं है, उन्हें बस 'ऊपर से आदेश' है।

इस संबंध में नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में अवैध गिरफ़्तारी से मुक्ति की मांग को लेकर शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मधुवनदत्त चतुर्वेदी ने याचिका दायर की। अदालत ने स्थानीय पुलिस को नोटिस जारी करके 31 दिसंबर को जवाब दाखिल करने का आदेश जारी दिया। इसके बाद बिना किसी विधिवत घोषणा के पुलिस वाले शाम 5 बजे शर्मा के आवास से चले गए। 

इस दिन शहर कांग्रेस ने 'किसान बचाओ गाय बचाओ रैली’ का आह्वान किया था। शर्मा उसमें शामिल न हो सके। पुलिस की कोशिशों के विपरीत इस गिरफ़्तारी के विरोध में दूसरे दलों के लोग बड़ी तादाद में रैली में शामिल हुए। 

न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकारों का कचूमर निकाल देने वालीं ये कोई 2-3 ज़िलों की इक्का-दुक्का वारदातें नहीं, समूचे उत्तर प्रदेश में हो रही हृदय विदारक दास्तानों का अंश मात्र है। 

पिछले 2 हफ़्तों में 'प्रदेश' का ऐसा कोई जिला नहीं है, जहाँ किसान आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं के इस तरह की हाउस अरेस्ट या गिरफ्तारियाँ न हो रही हों। इस सारे सिलसिले को शुरू कैसे किया गया, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं।

नोडल अधिकारियों की तैनाती

दिसम्बर के आख़िरी हफ़्ते में जब यह ख़बर उड़ी कि यूपी के 75 जिलों में नोडल अधिकारियों के रूप में अलग-अलग आईएएस अधिकारियों की नियुक्तियां की गई हैं जिनका उद्देश्य धान की खरीद में होने वाली शिक़ायतों को हल करना, गन्ने की खेती की दिक़्क़तों को सुलझाना, सभी ज़िलों में गौवंश के लिए शेड का प्रबंधन जैसी कृषिगत समस्याओं का निवारण करना है तो सबसे ज़्यादा किसान ही चौंके थे। 

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इन अधिकारियों को 3 दिन के भीतर एक्शन प्लान बनाने और रिपोर्ट करने के निर्देश दिए गए थे। माना गया कि ये सारी क़वायद खेती संबंधी तीनों क़ानूनों से फैलने वाले 'भ्रम' को दूर करने के उद्देश्य से की जा रही है। इन अधिकारियों को अपने अंचल के किसान नेताओं और किसान यूनियनों से चर्चा करने के निर्देश भी दिए गए थे। लखनऊ स्थित सचिवालय एनेक्सी से उन्हीं दिनों यह चर्चा भी फूटी थी कि प्रत्येक ज़िले के थानों में  एक 'किसान सेवा केंद्र' खोला जाएगा जिसमें एक ‘समर्पित’ अधिकारी बैठाया जायेगा।
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प्रदेश के इतिहास में खेती-किसानी के सवाल पर पहली बार होने वाली आईएएस अधिकारियों की ऐसी सघन नियुक्तियां सचमुच हैरान करने वाली थीं। 29 दिसंबर से 2 जनवरी तक ये सघन अभियान चला। किसान कार्यकर्ताओं की शिकायतों को सुनने, उन्हें समझाने-बुझाने (और जहाँ ज़रूरी हुआ वहां धमकाने) की कार्रवाइयों के दौर-दौरे जम के चले। 

किसानों पर नज़र रखने की साज़िश 

कई किसान संगठनों ने संशय प्रकट किया कि ऐसा किसान नेताओं और किसान संगठनों की गतिविधियों पर नज़र रखने और उनकी रोकथाम करने की नीयत से हो रहा है। जनवरी के पहले और दूसरे हफ़्ते में जिस तरह बड़े पैमाने पर किसान गतिविधियों का दमन, नेताओं को हाउस अरेस्ट करना, घेराबंदी, हिरासत, फ़ोन सर्विलांस आदि की घटनाएं सामने आई हैं, उससे किसान संगठनों के संशय की पुष्टि हुई। 

पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री का कहना है कि किसान आंदोलन पर जैसी सख्ती यूपी सरकार बरत रही है उसका दूसरा उदाहरण देश में और कहीं देखने को नहीं मिलता।

'सत्य हिंदी' से बातचीत में शास्त्री कहते हैं, "पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हालत यह हैं कि एसडीएम और दरोगा ग्रामीण इलाकों के गणमान्य लोगों को बुलाकर धमकाते हैं कि तुम अगर किसान आंदोलन से जुड़े तो इसके नतीजे बहुत बुरे होंगे।" बाग़पत के सांसद सत्यपाल सिंह की आलोचना करते हुए शास्त्री कहते हैं कि पुलिस-प्रशासन की बात तो अलग, सांसद क्षेत्र के प्रधानों और दूसरे मुअज्जिज़ लोगों को बुलाकर धमका रहे हैं। 

शास्त्री कहते हैं, “यह वही सत्यपाल सिंह हैं जिन्होंने कुछ साल पहले बजट निर्माण की यह कहकर आलोचना की थी कि इसकी ड्राफ्टिंग में किसानों को भी शामिल किया जाना चाहिए।” किसान कांग्रेस के पश्चिमी उत्तर प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अनिल चौधरी का कहना है "किसान जहां भी पंचायत करते हैं, वहाँ बड़ी तादाद में पुलिस पहुंचकर उन्हें धमकाने लगती है और पूरे प्रदेश की यही कहानी है।” 

किसान नेता अवधेश सोलंकी कहते हैं, "सब जगह एलआईयू (गुप्तचरों) का जाल बिछा है। फतेहपुर सीकरी से सांसद और बीजेपी के किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार चाहर भी ग्राम प्रधानों और दूसरे किसान कार्यकर्ताओं को धमकाते घूम रहे हैं।"  

कृषि क़ानूनों पर छिड़े विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे धरनों को गांधीवादी परंपरा का मानते हुए उसकी प्रवृत्ति को कहीं से आपत्तिजनक नहीं माना था। तब यूपी में इस तरह के जंगलराज के क्या मायने हैं? आज़ादी के बाद से यूपी लोकतांत्रिक धरना-प्रदर्शनों का केंद्र रहा है।

अलोकतांत्रिक रवैया

विरोधी पार्टियों के शासन काल में स्वयं बीजेपी विभिन्न मांगों को लेकर सड़कों पर उतरती रही है लेकिन कभी भी न तो उसे बारहमासी धारा 144 का सामना करना पड़ा है और न ही दूसरे प्रकार की गिरफ़्तारियां झेलनी पड़ी हैं। लेकिन अब उसका रवैया पूर्णतः अलोकतांत्रिक है। तमाम मोर्चों पर जिस तरह योगी सरकार फेल हो रही है और जनता में आक्रोश बढ़ रहा है, उसे हल करने का उसके पास एक ही मंत्र है-जनता पर पाबंदी।

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