मज़दूरों का 'पैदल घर चलो' जारी है। सैकड़ों किलोमीटर की दूरी फंलागते औरतों-बच्चों के साथ पुलिस के डंडों से होकर गुजरते भूखे प्यासे वे चले जा रहे हैं। कोरोना से इनकी लड़ाई में ये अकेले हैं। सरकार का मतलब सिर्फ़ पुलिस का डंडा है! वे लौट तो रहे हैं पर गाँव में भी सब कुछ सहल नहीं। उनकी क़दमताल पर हमसे आपसे शीतल के सवाल।
1984 से अमर उजाला, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे, समय सूत्रधार, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आदि में 1993 तक लगातार रिपोर्टिंग की। इसके बाद पारिवारिक व्यवसाय में क़रीब दो दशक गुज़ारने के बाद पत्रकारिता में पुनर्वापसी को प्रयासरत। बीच में 2010-11 में 'समकाल' पाक्षिक समाचार पत्रिका का क़रीब एक वर्ष प्रकाशन किया ।














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