लाखों लोग सर पर गठरियाँ रखे औरतों, बूढ़ों और बच्चों के साथ शहरों से अपने गांव घर के रास्तों पर हैं। इधर दृश्यों को देखकर लोगों को भारत विभाजन की याद आ रही है। हालाँकि दोनों में कोई समानता नहीं है, क्योंकि सन् सैंतालीस के बँटवारे में लाखों लोग मारे गए थे और क़रीब सवा सौ करोड़ लोग विस्थापित हो गए थे। मगर दूसरे अर्थों में आज के दृश्य भी विभाजन के ही हैं और इनमें भी हिंसा छिपी हुई है। ये विभाजन है अमीर ग़रीब का और जातियों का और इनमें हिंसा है अपमान की उपेक्षा की। वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की विशेष टिप्पणी।
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