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अच्छा,  तो आप हिंदी पढ़ाते हैं ?

सुबह जयपुर से दिल्ली की उड़ान वक्त पर पकड़ पाने की बदहवासी थी। लेकिन गेट पर भीड़ न थी। ओम थानवी जी ने हाथ मिलाया और फिर आने की दावत देते हुए अपनी कार में बैठ गए। मैं गेट की तरफ़ बढ़ा। सी आई एस एफ़ के जवान ने हाथ बढ़ाया। मैंने टिकट और अपना पहचान पत्र दिया। दोनों का मिलान करने के बाद पहचान पत्र वापस करते हुए कहा, “अच्छा, तो आप हिंदी पढ़ाते हैं!” “जी।” मैंने उत्तर दिया। “ मुझे बहुत अच्छा लगता है जब कोई हिंदीवाला मिलता है।” अधिकारी ने कहा। मेरे चेहरे पर प्रश्नवाचक भाव उभरता देख बात साफ़ की, “आजकल कहाँ रह गए हैं अपनी भाषा में पढ़नेवाले। हिंदी, संस्कृत तो ख़त्म ही हो रही है।” 
मैं बतला सकता था कि हर सत्र में हम एम ए में तक़रीबन 800 का दाख़िला अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय में लेते हैं। प्रत्याशी 3000 तक होते हैं। किसी कॉलेज में हिंदी के पाठ्यक्रम में शायद ही कोई जगह ख़ाली रहती हो। बी ए, एम ए तो रहने दीजिए, हमने  इस साल 220 शोधार्थियों को दाख़िला दिया है। संस्कृत विभाग को भी फलते फूलते ही देखता हूँ हालाँकि मेरे राजस्थान के अध्यापक मित्रों ने संस्कृत की स्थिति वहाँ के कॉलेजों में चिंतनीय बतलाई।
लेकिन जयपुर हवाई अड्डे के उस गेट पर चिंता सिर्फ़ यह नहीं थी। अपनी भाषा अपनी भाषा होती है। वह मात्र भाषा नहीं, मूल्यों और  संस्कारों की वाहक है: “अब मोरल एजुकेशन भी कहाँ रह गया?” शिकायत कुछ गहरी थी और व्यापक भी। “हमारे समय राम राम नहीं करने पर दंड मिलता था। अब तो बच्चे यह जानते ही नहीं। सेक्स एजुकेशन और न जाने क्या क्या पढ़ाया जा रहा है अभी।” अधिकारी ने कहा कि उससे कोई परेशानी नहीं लेकिन “मोरल वैल्यू" की बात तो रहती ही है!  यह सब कुछ जो मैकॉले ने किया उसी का नतीजा है।
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मैं तो पार हो गया था लेकिन मेरे बाद और मुसाफ़िर अपने टिकट और पहचान  की जाँच का इंतज़ार कर रहे थे। मैं भी कुछ अधीर हो रहा था क्योंकि बोर्डिंग पास अभी मुझे लेना था। लेकिन सीआईएसएफ़ के उस अधिकारी की चिंता इस सांसारिकता से कहीं आगे की थी। वह मैकॉले के समय से भारतीय सभ्यता के क्षरण की चिंता की पीड़ा थी।
चिंता वह वास्तविक थी, रणनीतिक नहीं, यह 7-8 मिनट की उस बातचीत से जाना जा सकता था हालाँकि मेरी भूमिका उस संवाद में श्रोता की ही थी। लेकिन मैं  सोचता रहा कि इस चिंता को  कैसे  समझें! हिंदी के अध्यापक होने के कारण मुझे जो अयाचित आदर मिला था वह इस आशा से कि मैं खोए हुए भारतीय मूल्य और छीजती जा रही भारतीय सभ्यता और उसके संस्कारों का संरक्षण ही नहीं कर रहा हूँगा बल्कि उनके  संवर्धन के दायित्व का अहसास भी मुझे होगा।
हिंदी, भारतीयता, संस्कार : इन सबके बीच के संबंध को लेकर एक आम दिमाग़ी घालमेल हमारे समाज की विशेषता है। अपना कुछ खो जाने का भाव और एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक अन्याय का अहसास, उसका दंश सोने नहीं देता। लेकिन यह हुआ कैसे?
हम दोनों के पास वक्त होता तो मैं शायद मैं एक दिन पहले के जयपुर के अपने अनुभव। सीआईएसएफ़ के अपने मित्र के असुरक्षा भाव को कुछ कम कर सकता था। राजस्थान साहित्य अकादेमी ने वार्षिक पुरस्कार समारोह में स्कूल, कॉलेज के छात्रों को भी कविता, कहानी, निबंध के लिए पुरस्कृत किया था। वे सब हिंदी में ही लिखनेवाले लोग थे। न मेवाड़ी, न राजस्थानी, न ढूँढ़ारी, न मारवाड़ी, किसी में नहीं। सबसे कम उम्र की विजेता ने हिंदी को राष्ट्र भाषा और मातृ भाषा कहकर उसमें लिखने के अपने गर्व का उल्लेख किया था। अकादेमी के प्रतिनिधि ने यह अतिरिक्त या अनिवार्य सूचना दी थी कि अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में पढ़ने के बावजूद वे हिंदी में लिखती हैं।  
राजस्थान में भारत में आजकल बहुनिंदित विचार धर्मनिरपेक्षता को माननेवाली सरकार है। कार्यक्रम की शुरुआत अवश्य कुछ विशिष्ट हुई। पुस्तकों के आगे दीप प्रज्ज्वलन के साथ। लेकिन देखा सबने अपने जूते उतार रखे थे। यानी हर कोई अपने संस्कारों को लेकर अत्यंत सावधान था। याद आया, कई साल हड़बड़ी में चप्पल पहने मंच पर चढ़ गया था जहाँ गायन शुरू होनेवाला था। अशोक वाजपेयी आपे से बाहर हो गए थे। वे धार्मिक तो क़तई नहीं लेकिन मंच की पवित्रता से वे समझौता नहीं कर सकते थे।
कार्यक्रम में एक धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल, कांग्रेस पार्टी के कला और संस्कृति मंत्री श्री बुलाकी दास कल्ला  मौजूद थे। अपने व्याख्यान में उन्होंने कम से कम दस उद्धरण गीता, पुराणों और वेदों से दिए: ठेठ संस्कृत में बिना लड़खड़ाए। उनके सारे उदाहरण, प्रतीक इन्हीं परंपराओं से आए भले ही अपने भाषण का अंत उन्होंने एक उर्दू शायर की पंक्तियों से किया। मुझे जो अच्छा लगा वह यह कि उन्होंने यह कहा कि अगर 18 पुराण नहीं पढ़ सकते तो सिर्फ़ इतना ही याद रखना काफ़ी होगा “अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् | परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||” इन सबमें यही दो बातें ख़ास हैं,“परोपकार पुण्य है और परपीड़न पाप है।” भारतीय परंपरा से यही उन्हें मिला है। लेकिन इस संस्कृति के स्वघोषित रक्षकों को क्या मिला है?  भाषण का अंत उन्होंने “सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया” की कामना के साथ ही किया।  
यह भी देखा कि साहित्य अकादेमी की सर्वोच्च परिषद् का नाम सरस्वती सभा है जिसकी एक सदस्य तसनीम ख़ान भी हैं। यह भी सुना कि पहले जब एक ही अकादेमी थी तो उसका नाम संगम था।
यह सब याद आता रहा हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच के बाद उड़ान की प्रतीक्षा करते हुए। मैं अभी भी उस भाव का कारण और स्रोत खोज रहा था जो मेरे अधिकारी मित्र के मन में था, उस शिकायत का कि एक बड़ी खाई हमारी अपनी संस्कृति और हमारे बीच पैदा हो गई है। जिस खाई को हम जैसे हिंदी के लोग पाटेंगे, इसकी उम्मीद उन्हें थी। यही वेदना निर्मल वर्मा की थी कि भारतीय चेतना ( जैसा दूसरा नाम हिंदू चेतना ही है) में एक फाँक पैदा हो गई है।
निर्मल वर्मा हों या अभी अनाम हमारे सीआईएसएफ़ के अधिकारी हों, वे कल्ला साहब की तरह संस्कृति को लेकर आश्वस्त क्यों नहीं? यह उन पर आरोप नहीं है। अभी भी मैं सोच रहा हूँ कि जो कुछ पिछले दिन कई घंटे तक देखा और सुना, उसमें और हमारे सीआईएसएफ़ के अधिकारी मित्र की चिंता में इतना अंतर क्यों है।
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अपूर्वानंद
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