मणिपुर में हिंसा और भय का माहौल बदल नहीं रहा है। हर बार जब लगता है कि कुछ सामान्य हुआ है तभी हिंसा भड़क जाती है और आम जन मारे जाते हैं। 7 अप्रैल को बिष्णुपुर जिले के ट्रोंगलाओबी गाँव में एक घर में बम से हमला हुआ और इसकी वजह से दो मासूम बच्चों की जान चली गई। इस घटना के बाद लगभग 500 लोगों की गुस्साई भीड़ ने पास ही स्थित सीआरपीएफ़ कैम्प में हमला कर दिया और वहां पर खड़ी गाड़ियों को जला डाला। इस हिंसक झड़प में 3 और नागरिकों की मौत हो गई। इस तरह 4 दिनों में 5 लोगों की मौत हो चुकी है। रणनीतिक रूप से संवेदनशील उत्तर-पूर्व में ये हालात भारत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं हैं।
मणिपुर पर पीएम का रवैया
आज का उत्तर-पूर्व हमेशा ऐसा नहीं था। 1949 में तमाम कोशिशों के बाद मणिपुर और त्रिपुरा का भारत में विलय हुआ था। फिर 70 के दशक में मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा पूर्ण राज्य बने, ‘मिज़ो शांति समझौते’ से होते हुए मिज़ोरम, 1987 में राज्य बना और चीन के लाख दबाव के बावजूद अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। पूरे उत्तर पूर्व में बहुत सारी उठा-पटक के बाद 90 के दशक के अंत में शांति की शुरुआत होने लगी थी। 2000-2014 के बीच का समय इस शांति को स्थायित्व में बदलने का समय था। शांतिपूर्ण बदलाव के समय में 2014 में मोदी सरकार आ गयी जिसे उत्तर पूर्व की शांति को मजबूती देनी थी लेकिन सरकार की अक्षमता मई 2023 में खुलकर तब सामने आ गई जब मणिपुर में मैतेई और कुकी-जो समुदाय के बीच भीषण हिंसा भड़क गई। हिंसा बढ़ती जा रही थी और मोदी सरकार लाचारों की तरह हिंसा को बढ़ते देख रही थी। गृहमंत्री अमित शाह ने 29 मई से 1 जून, 2023 के बीच मणिपुर का दौरा करके एक बेहतर काम किया लेकिन शायद उनमें वो क्षमता ही नहीं थी कि वो इस संघर्ष को रोक पाने के उपाय खोज पाते। शायद इसीलिए इसके बाद वो एक साल तक मणिपुर गए ही नहीं। अप्रैल 2024 में वो फिर से मणिपुर गए लेकिन इस बार उनका मक़सद मणिपुर में शांति नहीं, मणिपुर में लोकसभा चुनाव प्रचार करना था। इसके बाद वो आज तक मणिपुर नहीं गए। मतलब, भारत के गृहमंत्री, जिसके ऊपर भारत की आंतरिक सुरक्षा का वैधानिक दायित्व है वो मणिपुर जैसे संवेदनशील और हिंसाग्रस्त प्रदेश में 3 मई 2023 से आज तक मात्र दो बार ही गए, यह लापरवाही का चरम बिंदु है। गृहमंत्री ने भले ही दिल्ली में बैठकर कई समीक्षा बैठकें की हों लेकिन क्या उनके पास इतनी भी समझ नहीं कि भारत के गृहमंत्री का महत्व क्या होता है? अगर गृहमंत्री ने हर महीने मणिपुर की यात्रा की होती तो शायद वहाँ के लोगों में अलग किस्म का भरोसा बनता लेकिन दुर्भाग्य से अमित शाह 2 बार के अलावा मणिपुर गए ही नहीं।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कहानी तो बिल्कुल अलग ही दर्जे की है। एक लीडर की तरह सामने आकर समस्या से लड़ना उन्हें आता ही नहीं, परेशान लोगों का सामना करना उन्हें नहीं आता, शायद उन्हें यह भी नहीं आता कि आम लोगों के आँसू कैसे पोछे जाएँ, उन्हें राहत कैसे पहुंचाई जाए, उनके सवालों का सामना कैसे किया जाए? पीएम मोदी को यह सब बिल्कुल नहीं आता। उन्हें तो रेडियो के पीछे बैठकर ‘मन की बात’ ही करना आता है। क्या उनकी इसी अक्षमता के कारण वे मणिपुर में हिंसा शुरू होने के बाद से 28 महीनों तक मणिपुर झाँकने तक नहीं गए? उन्होंने 28 महीनों तक मणिपुर की यात्रा तक नहीं की। मेरे पास उचित शब्द नहीं है, सोचना होगा कि इसके लिए पीएम मोदी को किस विशेषण से संबोधित किया जाए। हो सकता है कि पीएम मोदी के लिए सही विशेषण की खोज मणिपुर के लोग बेहतर तरीक़े से कर पायेंगे।
28 माह तक गये मणिपुर गये ही नहीं थे मोदी
पीएम मोदी 28 महीने के बाद 13 सितंबर 2025 को मणिपुर की यात्रा पर गए और मणिपुर को ‘भारत माता के मुकुट का रत्न’ जैसी हवा-हवाई बातें करके चले आए। कोई माफ़ी नहीं माँगी कि 28 महीनों तक मणिपुर जलता रहा और वो क्यों नहीं आ पाए? यह भी नहीं बताया कि उनके लिए दिल्ली से मणिपुर का रास्ता इतना लंबा क्यों हो गया? उन्होंने यह भी नहीं बताया कि उन्हें ‘भारत माता के मुकुट का रत्न’, मणिपुर तक पहुँचने में 28 महीने क्यों लग गए? लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पीएम मोदी इन 28 महीनों में कहीं गए नहीं और मणिपुर में हो रही हिंसा के दुख में दिल्ली में ही बैठे रहे। पीएम मोदी ने इन 28 महीनों में कम से कम 34 देशों की यात्राएँ कीं।
3 मई 2023 के बाद पीएम ने इसी साल दिसंबर तक जापान, पापुआ न्यू गिनी, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, मिस्र, फ्रांस, यूएई, दक्षिण अफ्रीका, ग्रीस, इंडोनेशिया और दुबई समेत लगभग 11 देशों की यात्रा की। अगले साल 2024 में पीएम मोदी ने यूएई, कतर, भूटान, इटली, रूस, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, यूक्रेन, ब्रुनेई, सिंगापुर, नाइजीरिया, ब्राजील और गुयाना समेत लगभग 12 देशों का दौरा किया। इसके अलावा वर्ष 2025 में 13 सितंबर को मणिपुर जाने से पहले पीएम मोदी ने फ्रांस, अमेरिका, मॉरीशस, सऊदी अरब, साइप्रस, कनाडा, क्रोएशिया, घाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटीना और ब्राजील समेत 11 और देशों की यात्रा की।
इन यात्राओं से साफ़ है कि पीएम मोदी की ना तबीयत ख़राब थी, ना ही उनके लक्ज़री प्लेन में फ्यूल और अन्य सुविधाओं की कमी थी, न ही उन्हें सुरक्षा आदि की कमी रही, तो सवाल उठता है कि पीएम मोदी जलते हुए मणिपुर को संभालने 28 महीने तक क्यों नहीं गए होंगे? मुझे लगता है कि पीएम मोदी जानबूझकर मणिपुर नहीं गए, मणिपुर पीएम मोदी की प्राथमिकता में था ही नहीं।
दिल्ली में बैठे-बैठे भारत के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री सिर्फ़ ‘एक्सपेरिमेंट’ करते रहे जिसका खामियाजा मणिपुर भुगतता रहा। तमाम विरोध और प्रदर्शनों के बावजूद 21 महीनों तक मुख्यमंत्री बिरेन सिंह से इस्तीफ़ा नहीं माँगा गया। जबकि स्वयं बिरेन सिंह के ऊपर ही हिंसा फैलाने के आरोप लगते रहे हैं। जब चौतरफ़ा आलोचना होने लगी तब बिरेन सिंह ने इस्तीफ़ा दिया। इसके बाद लगभग एक साल के लिए प्रदेश को राष्ट्रपति शासन के अधीन कर दिया गया। इस दौरान भी केंद्र सरकार कुछ भी ठोस क़दम नहीं उठा सकी। जब यह प्रयोग भी असफल रहा तो 4 फ़रवरी 2026 को युमनाम खेमचंद सिंह को नया मुख्यमंत्री बनाया गया। यह प्रयोग भी 7 अप्रैल की घटना के बाद फुस्स साबित हुआ। अब यह साबित हो चुका है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पास मणिपुर को संभालने लायक नेतृत्व उपलब्ध नहीं है। बार बार अपने असफल प्रयासों से इन दोनों नेताओं ने यह साबित किया है कि वो इस देश के इतिहास के सबसे कमजोर और अक्षम नेता हैं।
मेरी नजर में ऐसे व्यक्ति को पीएम पद पर बने रहने की ज़रूरत ही नहीं, जिसके लिए उसके देश में जलते हुए प्रदेश को राहत देने के लिए कुछ ना हो। पीएम मोदी तो अपने अरबों के आवास में रहते हैं लेकिन क्या उन्हें पता है कि मणिपुर में कितनी अमानवीय परिस्थितियाँ हैं?
मणिपुर के हालात
दुनिया भर में होने वाली राजनीतिक हिंसा और संघर्षों का डेटा ट्रैक करने वाला स्वतंत्र अमेरिकी संगठन ACLED यानी ‘आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट’ ने एक साल पहले मई 2025 में एक रिपोर्ट जारी की थी, जो मणिपुर में 2023-2025 के बीच होनी वाली हिंसा पर बनाया गया महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसके अनुसार, लगभग शुरुआती 24 महीनों में मणिपुर में 1,000 से अधिक राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ और 396 मौतें हुई थीं। लगभग 67000 लोग शरणार्थी शिविरों में रहने को बाध्य हुए। NCBI के एक शोध के अनुसार, इस समय राहत शिविरों में रहने वाले 65.8% लोग PTSD (पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) से जूझ रहे हैं।
हिंसा का बदलता रूप
ACLED की रिपोर्ट बताती है कि मणिपुर में अब "पूर्ण जातीय अलगाव" (near-complete segregation) हो चुका है। यानी दोनों समुदाय अब एक दूसरे को देखना तक नहीं चाहते, एक दूसरे के क्षेत्रों में आना-जाना पूर्णतया प्रतिबंधित किया जा चुका है। इसके अनुसार, मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच एक अस्थिर युद्धविराम (uneasy truce) है, जो बीच-बीच में भयानक हिंसा के साथ टूटता रहता है। 7 अप्रैल, 2026 की घटना इसी की एक बानगी है। साल भर पहले ही इस रिपोर्ट ने बता दिया था कि मणिपुर में हिंसा का स्वरूप अब पारंपरिक युद्ध से बदलकर गुरिल्ला हमलों और ड्रोन/रॉकेट हमलों में बदल गया है। 7 अप्रैल की घटना इसका प्रमाण है।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की एक रिपोर्ट जिसे 'इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्रिब्यूनल' द्वारा तैयार किया गया था। इस न्यायाधिकरण की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने की थी। इसके मुताबिक 2023 से 2024 के बीच हजारों की संख्या में सरकारी हथियारों को लूटा गया जिनका इस्तेमाल हिंसा फैलाने के लिए किया गया। पुलिस शस्त्रागारों से लगभग 6,000 हथियार और लाखों कारतूस लूटे गए थे, जिनमें से केवल 2,500 ही बरामद हो पाए हैं। यह आम नागरिकों के बीच भारी असुरक्षा का सबसे बड़ा कारण है।
PUCL की रिपोर्ट ने एक और ज़रूरी बात का ज़िक्र किया है। इसके अनुसार, मणिपुर हिंसा अचानक भड़की कोई घटना नहीं थी, बल्कि यह "सुनियोजित और जातीय रूप से लक्षित" थी। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका मतलब यह था कि राज्य की बीजेपी सरकार बुरी तरह विफल रही, रिपोर्ट के अनुसार राज्य में संवैधानिक मशीनरी बुरी तरह विफल रही, इसके अलावा राज्य की पुलिस ने पक्षपाती रवैया अपनाया और महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए कुछ बेहद नृशंस अपराधों में ख़ुद पुलिस ने महिलाओं को भीड़ के हवाले किया था। इसके बावजूद दिल्ली में बैठी मोदी सरकार ने मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह को उनके पद से नहीं हटाया। इसका मतलब यह था कि मुख्यमंत्री को केंद्र का समर्थन प्राप्त था। मतलब राज्य सरकार द्वारा किये जा रहे हर ऐक्शन को समर्थन दिया जा रहा था, इसका मतलब ही है कि केंद्र सरकार भी उतनी ही दोषी है जितना मणिपुर की राज्य सरकार और पक्षपाती प्रशासन।
इतनी भीषण विफलता, असंवेदनशीलता और अक्षमता के बावजूद अगर केंद्र सरकार का इस्तीफ़ा नहीं हुआ है और न ही मणिपुर में हिंसा रुकी है तो इसका मतलब है कि देश इस समय इतिहास के सबसे निर्लज्ज नेतृत्व के अंतर्गत कार्य कर रहा है, जोकि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस व्यक्ति ने देश की समस्याओं को लेकर आँखें बंद कर रखी हैं उसे पीएम पद पर कैसे और क्यों बर्दाश्त किया जाना चाहिए?