डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ईरान का नया नेतृत्व बात करने को तैयार है और उसे भी इसमें कोई दिक़्क़त नहीं है। यही वह ट्रम्प है जो कल तक यह कह रहा था कि अमेरिका और इसराइल के हमले के बाद ईरान में जनता सत्ता पलट देगी। ईरान के प्रमुख आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और ईरान सरकार के कई प्रमुख अधिकारियों की हत्या पर डींग हाँकते हुए ट्रम्प में कहा कि हमने एक निशाने में 48 को उड़ा दिया। ट्रम्प ने इस हमले के बाद अमेरिका में ईरानियों के जश्न की भी चर्चा की। लेकिन यह साफ़ हो गया है कि ट्रम्प को उसी ईरानी नेतृत्व से बात करने को मजबूर होना पड़ा है जिसे सत्ता से बेदख़ल कर देने का दावा करते हुए यह हमला किया गया था। इस जंग में ट्रम्प के साथ नेतन्याहू भी है। नेतन्याहू ने ईरान की जनता से अपील की थी कि वह सरकार को उखाड़ फेंके। लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। सरकार बनी हुई है।
ट्रम्प का कहना है कि बातचीत में ईरान को वह सब दे देना चाहिए जो उससे माँगा जा रहा है। लेकिन अमेरिका या इसराइल को क्या चाहिए, यह साफ़ नहीं है। इन दोनों मुल्कों ने ईरान पर हमला उस वक्त किया जब वह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ की निगरानी में अमेरिका से वार्ता कर रहा था। मध्यस्थ देश ओमान के विदेश मंत्री ने कहा था कि वार्ता सकारात्मक रास्ते पर है और ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधि कई जगह एक-दूसरे से सहमत हैं। ठीक इसी समय अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला कर दिया। यानी वार्ता, समझौते वग़ैरह से न तो ट्रम्प को कोई लेना देना था और न ट्रम्प के दोस्त या मालिक नेतन्याहू को। नेतन्याहू अमेरिका का मालिक है, यह अमेरिका के ही लोग कह रहे हैं। अमेरिका पूरी तरह जयानवादी इसराइली गिरोह के चंगुल में है और उसी के इशारे पर वह फ़ैसले करता है।
ईरान का परमाणु बम कहाँ गया?
अगर अमेरिका को ईरान की परमाणु ऊर्जा परियोजना से इसलिए एतराज़ है कि वह परमाणु बम बना सकता है तो ईरान ने 15 साल पहले ही यह वादा कर दिया था कि वह परमाणु बम नहीं बनाएगा। इस फ़ैसले के लिए आयतुल्लाह ही ज़िम्मेवार थे। उसने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ उसकी परमाणु ऊर्जा परियोजना की जाँच कर सकती हैं। ईरान ने आज तक बम नहीं बनाया है। लेकिन अमेरिका को इससे कोई लेना देना नहीं। पिछले साल भी उसने यही कहकर ईरान पर हमला किया था कि वह उसकी बात नहीं मान रहा। उस वक्त भी हमला रोक कर अमेरिका को ईरान से बात करनी पड़ी थी। अभी उस हमले को साल भी नहीं गुजरा है। ऐसा क्या हुआ कि इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर दुबारा हमला किया? इरादा साफ़ था: सत्ता परिवर्तन। ख़ामेनेई और ईरान के शीर्ष नेतृत्व की हत्या तख्तापलट की योजना का हिस्सा है।
ईरान के इतिहास को जाननेवाले बार-बार कह रहे थे कि ईरान इराक़ या लीबिया नहीं है। यहाँ सर्वोच्च नेता के न रहने पर भी निरंतरता और स्थायीत्व बनाए रखने के लिए पुख़्ता और पेचीदा व्यवस्था है। इसीलिए आयतुल्लाह की हत्या के बाद भी सरकार स्थिर जान पड़ती है। ईरान पर हमला शुरू होने के बाद और हमले के बीच ईरान के विदेश मंत्री ने कहा था कि वे हमेशा बात करने को तैयार हैं ताकि उनके मुल्क ईरान पर यह हमला रुके। वे अमन चाहते हैं।ईरान ने अपने ऊपर हमले के जवाब में अपने आस पास के मुल्कों और साइप्रस तक में अमेरिकी फ़ौजी ठिकानों पर मिसाइलें दागना जारी रखा है। ईरानी मिसाइलें इसराइल में भी अफ़रा तफ़री मचा रही हैं। अमेरिका के फ़ौजी इन हमलों में मारे जा रहे हैं।
ईरान को जननेवालों का कहना है कि ईरान अपने ऊपर हमलों को झेल भी सकता है और लंबे वक्त तक जवाबी कार्रवाई भी करता रह सकता है? क्या इन्हीं हमलों से घबराकर अमेरिका को अब सत्ता पलट का राग बंद करके वार्ता की बात करनी पड़ रही है? जैसा उसे पिछले साल करना पड़ा था?
यूरोप के देशों का रवैया
सबसे हास्यास्पद और भयानक बात यह है कि यूरोप के देश अमेरिका और इसराइल के हमले की निंदा करना तो दूर, ईरान की निंदा कर रहे हैं। वे ईरान पर आरोप लगा रहे हैं कि वह पड़ोसी मुल्कों पर हमला कर रहा है। लेकिन ईरान ने साफ़ किया है कि वह इन मुल्कों में क़ायम अमेरिकी फ़ौजी ठिकानों पर हमला कर रहा है और इन मुल्कों से उसकी कोई दुश्मनी नहीं है। मध्य पूर्व के ये देश अमेरिका के दुमछल्ले ही हैं और उन्होंने अपने यहाँ अमेरिका को फ़ौजी ठिकाने क़ायम करने की इजाज़त देकर पहले ही दिखला दिया है कि उन्हें अपनी संप्रभुता की परवाह नहीं है। ईरान ठीक ही कह रहा है कि इन ठिकानों का इस्तेमाल उस पर हमले के लिए किया जा रहा है और इसलिए उसे आत्मरक्षा में जवाबी हमले का अधिकार है।
अमेरिका की ढिठाई देखने लायक़ है कि वह ईरान पर ही आरोप लगा रहा है कि वह उसके मित्र देशों पर बिना किसी उकसावे के हमला किया है। कोई उकसावा नहीं? यानी ईरान पर बम गिराए जाते रहें, उसके लोगों, नेताओं की हत्या होती रहे और वह ख़ामोश रहे?
अमेरिका का इरादा क्या?
क्या इन हमलों की वजह यह है कि अमेरिका ईरान के लोगों को एक मानवीय सरकार देना चाहता है? कि वह ईरान में जनतंत्र बहाल करना चाहता है? इससे बड़ा मज़ाक़ और क्या हो सकता है? अमेरिका का इरादा बिलकुल साफ़ है: वह चाहता है कि पूरी दुनिया उसके पैर के अंगूठे के नीचे रहे। और उसके लठैत इसराइल को पूरा मध्य पूर्व चाहिए। अमेरिका इस वक्त दुनिया का सबसे हिंसक और अपराधी देश है। उसकी बराबरी में सिर्फ़ इसराइल है। यूरोप के देशों ने अपने आचरण से साफ़ कर दिया है कि उनकी अपनी कोई आवाज़ नहीं, कि वे पूरी तरह अमेरिका के दास देश हैं।
भारत का रवैया
भारत की क्या हालत है? इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उसने ईरान पर हमले की निंदा नहीं की है। उसने एक राज्य प्रमुख की दूसरे मुल्कों द्वारा की गई हत्या की निंदा नहीं की है। अलबत्ता, उसके प्रधानमंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात पर हमले की निंदा ज़रूर की है। क्या भारत अमेरिका और इसराइल के साथ है? ईरान पर उनके हमले के चंद रोज़ पहले भारत के प्रधानमंत्री इसराइल की राजधानी में युद्ध अपराधी नेतन्याहू से गलबहियाँ और हँसी ठट्ठा करते देखे गए थे। क्या चलते चलते उनके कान में नेतन्याहू ने फुसफुसा दिया था कि वह ईरान पर हमला करने जा रहा है? क्या इस हमले में भारत की ख़ामोश सहमति है? जो भी हो, यह साफ़ है कि ब्रिक्स समूह के देशों में भारत अकेला देश है जिसने ईरान पर हमले की निंदा नहीं की है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस तरह पूरी दुनिया में भारत का सर नीचा कर दिया है। लेकिन क्या भाजपा को इसकी परवाह है? उसका सपना तो यही है कि वह दक्षिण एशिया का इसराइल बन सके।
दुनिया इस वक्त ख़तरनाक मुहाने पर खड़ी है। ईरान पर हमले के चलते जो जंग शुरू हुई है, वह फैल सकती है। ज़रूरी नहीं कि वह जल्दी ख़त्म हो जाए। आयतुल्लाह की हत्या मात्र एक राज्य प्रमुख की हत्या नहीं है। शियाओं में आयतुल्लाह का दर्जा पोप जैसा है। उनकी हत्या नस्रल्लाह की हत्या जैसी नहीं। उससे अमेरिका के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में जो नफ़रत और कड़वाहट पैदा हुई है, उसके नतीजे नहीं होंगे, यह सोचना मूर्खता है। यह सब तभी रुक सकता है जब दुनिया के सबसे बड़े गुंडे अमेरिका और उसके लठैत इसराइल पर दुनिया लगाम लगा सके। उसकी हिम्मत किसके पास है?