“आज तक मेरे साथ यह कभी नहीं हुआ।लेकिन इधर मुझे भय लगने लगा है।मैं डर में घिरा रहता हूँ।”, एक युवा अध्यापक ने कहा। “मैं आपसे मिलकर ही बात करूँगा। फ़ोन का कोई भरोसा नहीं।”, एक युवा प्रशासनिक अधिकारी ने अफ़सोस के साथ कहा।यही बात एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने कही जो सरकार के कुछ उच्चतम पदों पर रह चुके हैं:”फ़ोन पर बात करना मुनासिब नहीं,मिलकर ही इस विषय पर चर्चा करते हैं।”“हम गोष्ठी करना तो चाहते हैं लेकिन हमें डर लगता है।”, कुछ विद्यार्थियों ने बतलाया। 
एक निजी विश्वविद्यालय की अध्यापक ने बतलाया कि एक मशहूर पॉडकास्ट-शृंखला में(जो सरकार की आलोचना के लिए जाना जाता है)भाग लेने के पहले उनसे कहा गया कि उनके सामने लंबा करियर पड़ा है, इस पॉडकास्ट में जाने के पहले उन्हें सोच लेना चाहिए।मैं आश्चर्यचकित था कि इस प्रच्छन्न धमकी के बावजूद वे उस पॉडकास्ट में शामिल हुईं।यह साहस अपवाद है। यह अनुमान करना कठिन नहीं है कि ऐसे दर्जनों अध्यापक होंगे जिन्होंने इस तरह के कार्यक्रमों में खुद ही जाना बंद कर दिया होगा।एक सहकर्मी ने,जो सांप्रदायिक राजनीति के विरोधी माने जाते हैं, बतलाया कि उनसे एक युवा अध्यापक ने परिसर के बाहर हुई मुलाक़ात में बतलाया कि फैकल्टी के गलियारे में उनसे मिलने से मना किया गया है।
एक युवा अध्यापक मिला और उसने कहा, आपको बुलाना तो बहुत चाहते थे लेकिन बुला नहीं सकते। एक वरिष्ठ अध्यापक ने, जो अपनी सेवा के अंतिम चरण में हैं, मिलते ही कहा, आपको निमंत्रित करना संभव नहीं। कई अध्यापक या अध्येता अपने साथ इस तरह की बातचीत के कई प्रसंग आपको सुना सकते हैं। यह जैसे उन्हीं पर आरोप मालूम होता है: आपने ऐसी स्थिति ही उत्पन्न की है कि आपको निमंत्रित करना संभव नहीं रह गया है। जो यह बोलते हैं वे यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि असल में वे भयभीत हैं और अपने लिए कोई असुविधाजनक स्थिति पैदा नहीं करना चाहते, कि वे खुद सुरक्षित रहना चाहते हैं।
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जो नौकरी के उम्मीदवार हैं, उन्होंने अपने सोशल मीडिया खातों को या तो तालाबंद कर दिया है या मिटा दिया है।हम उनकी बात कर रहे हैं जो इसके पहले तक इस सत्ता के आलोचक रहे हैं और फ़ेसबुक या दूसरी जगहों पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते रहे हैं।उनमें से कुछ अब सक्रिय रूप से सत्ता की प्रशंसा या प्रचार करते हुए देखे जा सकते हैं। मिल जाने पर वे कहते हैं कि भीतर से वे पहले जैसे ही हैं। आप सोचते रह जाते हैं कि यह दोहरा जीवन वे कैसे जी पाते हैं।
ऐसे अध्यापक या अध्येता,जो आज तक सांप्रदायिक राजनीति के विरोधी रहे हैं, अब ऐसे आयोजनों के आमंत्रण नामंज़ूर नहीं कर पा रहे जो हिंदुत्ववादी संगठनों या व्यक्तियों के द्वारा आयोजित किए जाते हैं।आयोजन के बाद मिलने पर वे उसकी निंदा करेंगे लेकिन उसमें जाएँगे ज़रूर। समझदार संपादकों के नेतृत्व में छपनेवाले अख़बारों में जब अटपटी खबरें छपती हैं या घृणा भरे लेख छपते हैं और आप उनसे सवाल करते हैं कि यह सब कुछ कैसे छपा तो वे जवाब नहीं देते। एकाध बार जब वे उत्तर देते हैं तो उन खबरों या प्रचारात्मक लेखों के पक्ष में बड़ी कमजोर दलील देते हैं।आप उनके स्वर में भय की छाया देख सकते हैं। 
एक ने कहा,“हम यह सब इसलिए छापते हैं कि आप जैसे लोगों के लिए जगह बचाई जा सके।”सबको पता है कि यह बहुत लचर दलील है।संपादक आलोचनात्मक लेखों को देर-देर तक लटकाए रखते हैं जिससे लेखक थक जाएँ और उन्हें याद दिलाना बंद कर दें। हिंदी के अख़बार तो अब कई लेखकों को छापते ही नहीं।इसका कारण क्या भय है या यह कि संपादक सक्रिय रूप से सत्ताधारी विचारधारा के पैरोकार हैं?
भय, भय, भय: भय चतुर्दिक पहरा दे रहा है। उसने स्वतंत्र मस्तिष्क को क़ैद कर रखा है। कल्पना कीजिए उस अध्यापक की जो भय में घिरा है। उसके लिए कक्षा में स्वतंत्र रूप से पढ़ाना कैसे संभव है? अध्यापकों में डर घर कर गया है। उनके विद्यार्थी उनके व्याख्यान या चर्चा रिकॉर्ड कर रहे होंगे और उनका कोई हिस्सा प्रसारित कर दिया जाएगा जिसके बाद उन पर कोई मुक़दमा कर सकता है, शारीरिक हमला कर सकता है, उनकी नौकरी पर आँच आ सकती है।कक्षाओं के ऊपर भय का साया है।विभागों में सहकर्मी एक दूसरे से खुल कर बात नहीं करते क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कौन किसे क्या खबर करने वाला है।

गोष्ठियों और सभाओं में खुलकर इस सत्ता और सत्ता की विचारधारा के ख़िलाफ़ या उसकी आलोचना में बोलने से कई समझदार लोग परहेज़ करने लगे हैं। वे अपने व्याख्यानों और लेखों के विषय भी अब बहुत सावधानी से चुनते हैं, वही जो पूरी तरह सुरक्षित हो।

प्रकाशक अपने पुराने लेखकों की किताबों की भी अब बार-बार कानूनी समीक्षा करवाते हैं।कोई भी शब्द या विचार, जो सत्ता को पसंद न हो, बार-बार देखा जाता है और उसकी क़िलेबंदी की जाती है जिससे मुक़दमे या राष्ट्रवादी हिंसा से बचाव हो सके।
शहर में, और यह बात सिर्फ़ दिल्ली की नहीं, सभागार मिलना मुश्किल है अगर आप ऐसे विषय पर कार्यक्रम करना चाहते हैं जो सत्ता को नापसंद है। एक साहब लखनऊ में एक कार्यक्रम के लिए जब वहाँ पहुँचे तो जिस अतिथिगृह में उन्हें ठहराना था, उसकी जगह उन्हें दूसरी जगह ले जाया गया। निर्धारित अतिथिगृह के संचालक ने अतिथि का नाम सुनकर हाथ जोड़ लिए।
रंगमंच, जो पहले दर्शकों को विचलित करने का ही एक माध्यम था, अब उन्हें गुदगुदाने, हँसाने या उनमें सकारात्मक भाव भरने के काम आ रहा है। या फिर इतनी वक्र शैली का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसकी गिरह खोलने में दर्शकों को पसीना आ जाता है। लगभग एक दशक से ज़्यादा मंच पर अगर मात्र निरापद विषयों पर नाटक खेले जाते रहें तो फिर दर्शकों में नाटक या रंगमंच का वास्तविक बोध भी समाप्त हो जाता है।उन्हें मालूम भी नहीं होता कि उनका आस्वाद या सौंदर्य बोध भय के कारण विकृत हो गया है।
कक्षाएँ और परिसर अब भय की जगह हैं।मेरे पास कुछ विद्यार्थी आए। उन्होंने कहा कि अगर हम प्रश्नों के उत्तर ईमानदारी से लिखें तो हमें भय है कि हमारे नंबर काट लिए जाएँगे।मैंने कहा कि फिर नंबर के लिए उन्हें वही लिखना चाहिए जो वे जानते हैं कि इस सत्ता को पसंद है। फिर सोचा कि क्या एक अध्यापक के तौर पर यह सलाह देना उचित था?

भय स्वाभाविक है। कहना आसान है कि भयभीत न हों, लेकिन उसके चलते होने वाली हानि का ख़तरा वास्तविक है।

अध्यापक नौकरी से मिकाले गए हैं, उनपर जाँच बिठाई गई है,कई जेल भेजे गए हैं। विद्यार्थियों को भी तरह-तरह से दंडित किया गया है। संपादकों, पत्रकारों ने नौकरी गँवाई है, मुक़दमे झेल रहे हैं, या जेल में हैं।ऐसी परिस्थिति में साहस की माँग करना क्या असंवेदनशीलता नहीं है? मैं ऐसे अध्यापकों को जानता हूँ, जो यह सोचकर कि स्वतंत्रता ही स्वाभाविक है,कुछ ऐसा लिख, बोल पड़े या उन्होंने ऐसे आयोजन किए जिनकी उन्हें सज़ा भुगतनी पड़ी। वे उसके बाद से ख़ामोश हो गए हैं। क्या यह उनकी कायरता है? क्या इसके लिए वही ज़िम्मेवार हैं?
जिनके पास कुछ भी संपत्ति है, वे जानते हैं कि सच बोलने का मतलब है, एनफोर्समेंट डाईरेक्टोरेट के छापे और जेल की तैयारी। विपक्ष के नेताओं को वे कहते हैं,हम आपकी मदद करना चाहते हैं लेकिन उसके बाद हम सुरक्षित नहीं रहेंगे।
जो साधनहीन हैं, वे भयभीत हैं क्योंकि वे साधनहीन हैं,जो साधनसंपन्न हैं, वे भयभीत हैं क्योंकि वे साधनसंपन्न हैं। स्वाधीन, निर्भय स्वर इस देश में अजूबा है और अचरज से देखा जाता है।बल्कि उसकी खिल्ली भी उड़ाई जाती है।
भय आज भारत का स्थायी भाव है। हमने जिस भय की अब तक बात की है, मानव-इतिहास में अनेक देशों में वैसा भय देखा गया है। उन्हें अधिनायकवादी व्यवस्था कहा जाता है। लेकिन एक दूसरे क़िस्म की व्यवस्था है जो मात्र अधिनायकवादी नहीं, जिसमें बहुसंख्यक आबादी में भय बिठाया जाता है कि वह अल्पसंख्यक होनेवाली है, कि वह चारों तरफ़ से अल्पसंख्यकों से घिरी है जो बहुसंख्यक हो जाएँगे। बहुसंख्या में यह भय अल्पसंख्या के लिए बहुत ख़तरनाक है क्योंकि बहुसंख्यक आबादी जब भयभीत बना दी जाती है तो वह आक्रामक और हिंसक हो उठती है। 
अल्पसंख्यकों को तरह-तरह की हिंसा का सामना करना पड़ता है।उसकी जगह सिकुड़ती जाती है क्योंकि सार्वजनिक जगहों पर प्रायः बहुसंख्यया का प्रभुत्व है। इस बहुसंख्या में जो भी शामिल हैं, उन सबमें इस हिंसा और आक्रामकता की संभावना है। बहुसंख्या में अपने कमजोर होने का काल्पनिक भय अल्पसंख्या में एक वास्तविक भय का निर्माण करता है।अल्पसंख्यकों को नहीं मालूम कि बहुसंख्यकों में कौन उसपर हमला करेगा और कौन नहीं।इस भय के कारण अल्पसंख्यक ट्रेन, बस, कक्षा, सभाओं में चुप रहते हैं। माँ-बाप बच्चों को टिफ़िन में गोश्त का कोई भी पकवान नहीं देते। बच्चों को बतलाया जाता है कि वे फ़ोन पर सलाम, आदाब जैसे अभिवादन न करें।
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कुछ लोगों को यह सब कुछ अतिशयोक्ति जान पड़ेगा लेकिन इस भय के उदाहरण रोज़ाना, हर जगह मिलते हैं। एक पत्रकार ने मुंबई की ट्रेन में एक सहयात्री से मुनिस्पैलिटी के चुनाव के बारे में हुई चर्चा का वर्णन किया है। सार्वजनिक व्यवस्था की बदहाली के सवाल पर दोनों एकमत थे। लेकिन उस सहयात्री ने कहा वह वोट सत्ताधारी दल को ही देगा क्योंकि उसे भय है कि बांग्लादेशी मुसलमान उसके इलाक़े में भर रहे हैं। यह काल्पनिक भय अब उसे उसी को चुनने को बाध्य करेगा जिसने उसकी ज़िंदगी दूभर कर रखी है। क्योंकि उस दल ने उसे इन बांग्लादेशियों से बचाने का वादा किया है।
यह एक बड़ा भय है जो भारत में पिछले 11 वर्षों में हिंदुओं में भर दिया गया है। इस बड़े भय ने उन भयों को जन्म दिया है जिनके बहुत थोड़े उदाहरण हम पहले पढ़ चुके हैं। इस भयाक्रांत समाज को स्वतंत्र कैसे कहा जाए हालाँकि सब ढोंग स्वतंत्र होने का ही कर रहे हैं?