एक और हिंदू त्योहार बीत गया है। फूहड़पन, अश्लीलता,घृणा और हिंसा के प्रदर्शन का एक और मौक़ा अभी अभी गुजरा है। मुसलमानों को बेइज्जत करने का एक और अवसर। जगह-जगह से ऐसी खबरें और तस्वीरें अभी भी आ रही हैं जिनमें रामनवमी और हनुमान जयंती के जुलूस में शामिल हिंदू मस्जिदों, मदरसों पर चढ़कर नाच रहे हैं, वहाँ लगे हुए धार्मिक निशान नोंचकर फेंक रहे हैं और उनपर भगवा झंडा लगा रहे हैं। अगर वे ऐसा नहीं भी कर रहे हैं तो तलवार और हथियार के साथ आक्रामक नारे लगाते हुए जुलूसों के दृश्य आम हैं।
प्रायः पुलिस उनको ऐसा करने से नहीं रोकती। मुसलमानों का कोई विरोध भी नहीं दिख रहा है।मुसलमानों को अपने तजुर्बे से मालूम है कि अगर इस हिंसक हिंदू भीड़ से उन्होंने अपनी मस्जिद, मदरसे, मकान को बचाने की कोशिश की या हिंसा का थोड़ा भी प्रतिरोध किया तो उन्हें ही गिरफ़्तार किया जा सकता है, उनके घर और दुकानों पर बुलडोज़र चलाया जा सकता है।
दिल्ली, झारखंड, बिहार,मध्य प्रदेश से तनाव और हिंसा की खबरें मिली हैं। पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक हिंसा हुई है। ख़ासकर मुर्शिदाबाद में। इसका कारण बतलाते हुए तर्क यह दिया जाएगा कि मुसलमानों पर हिंसा इसलिए हुई क्योंकि वहाँ चुनाव होनेवाले हैं। मान लिया गया है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा प्रचार या हिंसा हिंदुओं को संगठित या गोलबंद करने का एक या सबसे कारगर तरीक़ा है। इसलिए यह जायज़ भी हो जाता है क्योंकि जनता को गोलबंद करना तो एक जनतांत्रिक अधिकार है! हिंदू भावनाओं के संगठन के लिए मुसलमान-विरोधी उत्तेजना अनिवार्य मान ली गई है। यह भी कहा जाता है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा का असली उद्देश्य असली मसलों से हिंदुओं का ध्यान भटकाना है। यानी इस हिंसा में भी निशाना हिंदुओं का मन है, मुसलमान नहीं हैं!
जो हो, अदालतों को भी इससे कोई एतराज नहीं रह गया है।पुलिस और प्रशासन को तो यह उचित ही लगता है। कुछ जगहों को छोड़ दें तो प्रशासन हिंदुओं को इसकी इजाज़त देता है कि वे यह हिंसा करें या विष वमन करें। उनसे बात करें तो कुछ अधिकारी तर्क देंगे कि हिंदुओं की भड़ास है, निकल जाने दीजिए।रोकने पर वे और भड़क सकते हैं और हिंसा हो सकती है।क्या मुसलमान थोड़ी-बहुत गाली बर्दाश्त नहीं कर सकते? या थोड़ी सी तोड़ फोड़? अगर उनके घर में घुसकर कोई भगवा झंडा लगा ही दे रहा है तो क्या इससे उनके देह में कोई घाव लग रहा है? वे भगवा झंडे से क्यों नफ़रत करते हैं और क्यों अपने घर में नहीं लगाने देते? मुसलमान इतने छुई मुई क्यों हैं और इतने असहिष्णु क्यों हैं कि थोड़ी घृणा और हिंसा उनसे बर्दाश्त नहीं होती?
अब यह इतना सामान्य हो गया है कि कोई अख़बार, कोई टी वी चैनल इस घृणा और हिंसा की आलोचना नहीं करता। कोई राजनीतिक दल इस पर कुछ नहीं बोलता क्योंकि उन्हें यह डर सताता है कि इन जुलूसों में उनके वोटर भी होंगे और उनकी आलोचना करने से वे उनसे बिदक जाएँगे। इसका ज़िक्र करना ही बुरा माना जाता है क्योंकि इससे नकारात्मकता फैलती है। लिखने-बोलने वालों को भी ऊब होती है क्योंकि यह तो हर साल होता है और साल में कई बार होता है। वे एक ही बात कितनी बार बोलें या लिखें! लेकिन हम ज़रा ख़ुद को मुसलमानों की जगह रखकर देखें और सोचें कि हर साल, और साल में कई बार अगर यह सब झेलना पड़े तो हम पर क्या असर होगा? और क्या पहली बार तो हम कुछ करेंगे, लेकिन अगली बार अपने घरों के किवाड़ और अपने कान बंद कर लेंगे? क्या हमारे भीतर कोई प्रतिक्रिया न होगी?
आम तौर पर धार्मिक अवसरों पर लोग अपने सबसे अच्छे रूप में दीखना चाहते हैं। वे सिर्फ़ कपड़े ही नए नहीं पहनते, यह भी चाहते हैं कि कम से कम उस दिन वे भले दिखलाई पड़ें। धार्मिक अवसरों से लोग पवित्रता का भाव ग्रहण करना चाहते हैं, मानो रोज़मर्रा की धूल मिट्टी से लिपटी हुई आत्मा धुल जाए। लेकिन अब दुर्गापूजा हो या राम नवमी या हनुमान जयंती, हिंदू जैसे और ग़लाज़त में ख़ुद को लिथेड़ लेते हैं। ऐसे अवसरों पर उनमें से कई लुटेरे और हत्यारे बन जाते हैं।
हिंदू पर्व त्योहार भारत भूमि पर और उसमें रहनेवालों पर हिंदुओं का दबदबा साबित करने के मौक़े बन गए हैं। हिंदू इसे अपना हक़ मानते हैं कि वे ऐसे मौक़े पर मुसलमानों के गलियों में भड़काऊ नारे लगाते हुए, हथियार भाँजते हुए जुलूस निकालें। मस्जिदों, मदरसों के भीतर घुस जाएँ, तोड़फोड़ करें। रोकने पर वे बुरा मान जाते हैं।
इस देश में दूसरे धर्मों के लोग भी अपने त्योहार मनाते हैं। ईद, बक़रीद, बड़ा दिन, गुड फ़्राइडे,मुहर्रम, किसी मौक़े पर हम वैसे जुलूस निकलते नहीं देखते जैसे हिंदू त्योहारों में निकलते हैं। कोई हिंदुओं के घरों या मंदिरों के आगे नाचना, गाना नहीं चाहता। कोई हिंदुओं से ज़बर्दस्ती अल्लाह या गॉड की तारीफ़ में जय जयकार नहीं करवाता जैसे हिंदू मुसलमानों का गला दबाकर उनसे जय श्रीराम का नारा लगवाते हैं। मुसलमान, सिख, ईसाई,बौद्ध, सब अपने त्योहार अपने लोगों के बीच हँसी-ख़ुशी, शांति के साथ मनाते हैं। सिर्फ हिंदू ही हैं जो अपने त्योहारों में दूसरे धर्म के लोगों के साथ ज़बर्दस्ती करते हैं।
हमने किसी हिंदू धार्मिक नेता, संत, साधु को यह कहते नहीं सुना कि हिंदुओं को ऐसा नहीं करना चाहिए।बल्कि हिंदू धार्मिक संत-साधु हिंदुओं को हिंसा के लिए और भी भड़काते हैं। वे उन्हें गाली-गलौज करना सिखलाते हैं, ख़ुद आगे बढ़कर गाली गलौज करते हैं।
यह लिख रहा था कि एक वीडियो पर नज़र पड़ी। उसमें एक जुलूस में लड़कियाँ और औरतें उछल उछल कर नाचती और गाती हुई दीखती हैं। डी जे पर एक भड़काऊ गाना बज रहा है। गाना क्या है, मुसलमानों की माँ के नाम भद्दी भद्दी गालियाँ भरी हुई हैं। वे लड़कियाँ उन शब्दों को मज़े ले-लेकर गा रही हैं।और नाच रही हैं। गाली में जो करने की धमकी है, मानो उसे वे कल्पना में ख़ुद कर रही हों। अश्लीलता के आनंद का ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन देखकर किसी भी समाज को ज़मीन में गड़ जाना चाहिए। लेकिन यह हिंदू समाज के लिए गर्व का विषय बन गया है। या वह इससे बेपरवाह है।
आम तौर पर ऐसे जुलूसों में किशोर लड़के-लड़कियाँ दिखलाई पड़ते हैं। ये जुलूस और धार्मिक अवसर धार्मिक शिक्षा के अवसर नहीं हैं।ये घृणा, हिंसा और अश्लीलता में हिंदुओं को दीक्षित कर रहे हैं।इसे लेकर कहीं चिंता नहीं है।
क्या हिंदू यह सोचते हैं कि यह मुसलमानों को सबक़ सिखलाने के लिए, उनकी औक़ात बतलाने के लिए ज़रूरी है? कि यह सब सिर्फ़ एक दिन के मज़े का मामला है और बाद में वे स्वस्थ बने रहेंगे? घृणा के इस नाले में जब वे ऊभ चूभ करते हैं तो क्या सोचते हैं कि यह गंदगी सिर्फ़ सतह पर रहेगी, यह उनकी आत्मा का कुछ नहीं करेगी? वे ख़ुद कितने विकृत हो रहे हैं, इसके बारे में वे कब सोचेंगे? क्या अश्लील घृणा के आनंद के नशे में वे नहीं देख पा रहे कि अब उनको देखकर बाक़ी लोगों को घिन आने लगी है?