सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद क्या पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल में अपील करने वाले मतदाता वोट डालने की स्थिति में होंगे? क्यों यह मुश्किल काम लग रहा है?
बंगाल मतदाता सूची से नाम काटे जाने पर विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरण मतदान के दो दिन पहले तक जिन वोटरों के नामों को हरी झंडी दिखा देगा वो अपने वोट डाल सकेंगे। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने इसे अपनी जीत बताते हुए इस पर खुशी जताई है। लेकिन जमीनी हकीकत को ध्यान में रखें तो इस निर्देश से अब वोटरों को खास फायदा नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि अब मतदान में समय बहुत कम बचा है।
मतदान में सिर्फ़ छह दिन बचे
राज्य में पहले चरण के मतदान में अब महज छह दिन बचे हैं। यानी 23 अप्रैल को होने वाले मतदान में वही लोग वोट डाल सकेंगे जिनके नाम न्यायाधिकरण से 21 अप्रैल तक क्लीयर हो जाएंगे। इसी तरह दूसरे चरण के मतदान के लिए कटऑफ़ की तारीख 27 अप्रैल है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि इतने कम समय में आखिर कितने वोटरों की शिकायतों का निपटारा संभव होगा?राज्य चुनाव आयोग के आँकड़ों के मुताबिक़, अब तक शिकायतों के निपटारे के लिए गठित 19 न्यायाधिकरणों के समक्ष 34 लाख से ज़्यादा शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं। यहाँ इस बात का ज़िक्र प्रासंगिक है कि तार्किक विसंगति वाली सूची में रहे 60 लाख से ज़्यादा वोटरों में से क़रीब 27 लाख के नाम मतदाता सूची से कट गए हैं। इनके अलावा पहले भी सूची से जिनके नाम कटे हैं वो भी न्यायाधिकरण के समक्ष इस फ़ैसले को चुनौती दे सकते हैं।
न्यायाधिकरण क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य के तमाम जिलों के लिए हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों की अध्यक्षता में 19 न्यायाधिकरण का गठन किया गया है। चुनाव आयोग के मुताबिक़, इन न्यायाधिकरणों ने बीते 13 अप्रैल से काम शुरू किया है। इनमें रोजाना औसतन दस मामलों की सुनवाई हो रही है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि रोजाना इतने मामले ही निपटाए भी जा रहे हैं। कुछ मामलों में कुछ शंका होने पर सुनवाई अगले दिन तक खिंच रही है। लेकिन अगर मान भी लें कि रोजाना 160 मामले भी निपटाए जा रहे हैं तो पहले चरण के मतदान से पहले मुश्किल से करीब दो हजार वोटरों की शिकायतों का ही समाधान हो सकेगा। लेकिन उनमें से कितने वोटरों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने का निर्देश दिया जाएगा, यह भी साफ़ नहीं है।राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल यह नहीं बता सके हैं कि अब तक कितने मामलों की सुनवाई हुई है और उनमें से कितने लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं। इस बारे में पूछे गए एक सवाल पर उनका कहना था कि फिलहाल डैशबोर्ड काम नहीं कर रहा है। इसलिए यह आंकड़ा देना संभव नहीं है।
चुनाव आयोग के एक अधिकारी बताते हैं कि न्यायाधिकरण में अपील करने का मतलब यह नहीं है कि ऐसे तमाम लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएंगे। यह फैसला न्यायाधिकरण पर निर्भर है कि वह किन लोगों के नाम को हरी झंडी दिखाता है। राज्य में ऐसे वोटरों की संख्या भी लाखों में हैं जिनको अपील करने के एक सप्ताह बाद भी न्यायाधिकरण की ओर से कोई सूचना नहीं मिली है।
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विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कोलकाता स्थित पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय विधि विज्ञान विश्वविद्यालय में कानून के प्रोफेसर सरफराज अहमद खान का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से वोटरों को कितना फायदा होगा, यह कहना मुश्किल है। उनके मुताबिक, अब सबकुछ इस बात पर निर्भर है कि न्यायाधिकरण कैसे और कितनी तेजी से शिकायतों का निपटारा करते हैं। लेकिन यह साफ नहीं है। अगर रोजाना औसतन सौ मामलों का भी निपटारा हुआ तो मतदाता सूची में शामिल होने वाले वोटरों की तादाद ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही होगी।
उनका कहना था कि वर्ष 2002 में वोट डालने वाले या पासपोर्ट धारक वोटरों को इस बार वोट डालने की अनुमति मिलनी चाहिए थी। भले तार्किक विसंगति के कारण उनके नाम सूची से हटा दिए गए हों।
राजनीतिक दलों ने इस फ़ैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे आम लोगों की जीत बताते हुए कहा है कि तृणमूल कांग्रेस ने ही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसी पर यह फैसला आया है। अब कई अन्य लोग भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे। उन्होंने न्यायाधिकरणों के कामकाज पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
लेकिन तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यह फैसला काफी देरी से आया है। न्यायाधिकरणों को बहुत पहले से काम शुरू करना था। लेकिन पहले तो इनके गठन में देरी हुई और फिर आधारभूत सुविधाओं की कमी के कारण अब 13 अप्रैल से काम शुरू हुआ है। लेकिन सुनवाई की गति बेहद धीमी है। ऐसे में कुछ हजार लोगों के नाम भले मतदाता सूची में शामिल हो जाएं, लाखों वोटरों को इस बार मताधिकार से वंचित होना पड़ेगा।
दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि एसआईआर की जटिलताएं तृणमूल कांग्रेस की पैदा की हुई हैं। उसने प्रशासनिक हथकंडे का इस्तेमाल कर चुन-चुन कर मतुआ और शरणार्थियों के नाम मतदाता सूची से कटवा दिए हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने कहा है कि चुनाव चाहे जिस मतदाता सूची के आधार पर हो, इस बार तृणमूल कांग्रेस की हार तय है।
भट्टाचार्य ने कहा है कि पार्टी एसआईआर की प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं है। पार्टी की ओर से भारी तादाद में फार्म सात जमा किए गए थे। लेकिन उन पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले को तृणमूल कांग्रेस भले अपनी जीत बता रही हो, इससे चुनावी नतीजों पर कोई खास अंतर नहीं पड़ेगा।