कभी अपने सबसे मजबूत लाल किले में तीन दशक से ज्यादा समय तक राज करने वाले वाममोर्चा ने इस बार अपने राजनीतिक पुनर्वास के लिए नए चेहरों पर भरोसा जताया है. वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस के हाथों सत्ता गंवाने के बाद से ही उसके इस किले में कई दरारें पैदा होती रही हैं. अब हालत यह है कि बंगाल से न तो लोकसभा में उसका कोई प्रतिनिधित्व है और न ही विधानसभा में. लेकिन इस बार युवा कंधों पर सवार होकर उसे कम से कम विधानसभा में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है.
इस बार कांग्रेस के साथ उसका एक दशक पुराना गठबंधन टूट गया है. उसने पुराने नेताओं की जगह अपनी छात्र और युवा शाखा के नेताओं को बड़ी तादाद में मैदान में उतारा है. यह ऐसे चेहरे हैं जिनके दामन पर कोई दाग नहीं है. मोर्चा की रणनीति इन चेहरों के सहारे तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के दागी नेताओं पर निशाना साधना है. वह अपने चुनाव अभियान में लोगों से साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं को चुनने की अपील कर रही है.
पार्टी के एक नेता बताते हैं कि उम्मीदवारों की सूची में 27 महिलाओं के अलावा दर्जनों ऐसे उम्मीदवार हैं जिनकी उम्र 40 साल से कम है. इनको टिकट देने का मकसद राज्य के युवा वोटरों को आकर्षित करना है. पखासकर सीपीएम ने जिन युवा चेहरों को मैदान में उतारा है उनमें से कई लोग आर.जी. कर कांड के खिलाफ लंबे समय तक आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे हैं.
मोर्चा के नेताओं का कहना है कि हमने तृणमूल और भाजपा से असंतुष्ट वोटरों के सामने एक नया विकल्प पेश किया है.

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वर्ष 2011 में तृणमूल कांग्रेस से हारने के बावजूद पार्टी ने इस लाल किले में करीब 40 फीसदी वोटों पर कब्जा बरकरार रखा था. लेकिन अगले दस साल में यह कड़ा घटकर पांच फीसदी से नीचे पहुंच गया. इसी वजह से वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में उसका खाता तक नहीं खुल सका. वैसे, वोटों में गिरावट का यह सिलसिला काफी पहले ही शुरू हो गया था. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सीपीएम और उसके सहयोगी दलों को महज 6.28 फीसदी वोट और दो सीटें मिली थी. दोनों सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी रहे थे. तब भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा था और वह दो से 18 सीटों तक पहुंच गई थी.
चुनावी नतीजों से साफ था कि राजनीति में वाममोर्चा की खाली जगह पर भाजपा ने अपने पांव जमा लिए थे. उस साल वामपंथ समर्थक माने जाने वाले लोगों ने भी ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ भारी तादाद में भाजपा का समर्थन किया था.
उससे पहले वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिलने वाले वोट 40 से घट कर 23 फीसदी रह गए थे. 2016 के विधानसभा चुनाव में इसमें और गिरावट आई और यह 20.1 फीसदी तक पहुंच गया.विश्लेषकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस को चुनौती देने में वाममोर्चा की नाकामी की वजह से ही उसके वोटरों ने भारी तादाद में भाजपा को समर्थन दिया था. उनको लग रहा था कि अब भाजपा ही ममता बनर्जी सरकार को चुनौती दे सकती है.
यही वजह है कि 2019 में भाजपा को मिले वोटों का आंकड़ा 23 फीसदी बढ़ कर 40.6 फीसदी तक पहुंच गया. यानी सीपीएम को जिन 17 फीसदी वोटों का नुकसान हुआ वो भाजपा की झोली में गए थे. इससे दो साल बाद हुए चुनाव में भी भाजपा को इसका फायदा मिला और वह विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीतने में कामयाब रही. दूसरी ओर, सीपीएम और उसकी सहयोगी गकांग्रेस को खाता भी नहीं खुल सका और दोनों पार्टियां बंगाल की राजनीति में हाशिए पर पहुंच गईं. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भी वाममोर्चा का खाता नहीं खुल सका जबकि कांग्रेस को महज एक सीट ही मिल सकी. दूसरी ओर, भाजपा की सीटें भी 18 से घटकर 12 रह गई. तब तृणमूल कांग्रेस को काफी फायदा हुआ था.
वाममोर्चा के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर मानते हैं कि वामपंथी दल अपने समर्थकों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहे हैं. ज्यादातर नेता 34 साल तक सत्ता में रहने की खुमारी से मुक्त नहीं हो सके हैं. लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण पार्टी और प्रशासन के बीच की विभाजन रेखा धूमिल हो गई थी. विपक्ष से खास चुनौती नहीं मिलने की वजह से खासकर सीपीएम सर्वशक्तिमान होकर उभरी और पार्टी में भ्रष्टाचार भी जड़ें जमाने लगा. ज्यादातर सरकारी काम पार्टी दफ्तर से ही होने लगे थे. यह कहना ज्यादा सही होगा कि सीपीएम के दफ्तर समानांतर प्रशासन का केंद्र बन गए थे.
जानकारों के मुताबिक, वर्ष 2011 में सत्ता हाथ से निकलने के बाद पार्टी नेतृत्व के संकट से भी जूझने लगी. इसकी वजह से पार्टी का जनसंपर्क अभियान भी धीमा पड़ गया. ज्यादातर नए नेता घर-घर जाकर लोगों से मिलने की बजाय सोशल मीडिया और फोन से ही यह काम करने लगे. इससे निचले और मध्यम तबके के नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष पनपने लगा. लेकिन केंद्रीय नेताओं ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया.
इसके कारण कई तेज-तर्रार नेता पार्टी छोड़ कर दूसरे दलों में चले गए. इसी साल फरवरी में पार्टी के युवा नेता प्रतीकुर रहमान ने तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया. सीपीएम की राज्य समिति के सदस्य रहे रहमान का आरोप था कि प्रदेश नेतृत्व ने उनके काम की अनदेखी की और उनकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया. ऐसे में काम करना मुश्किल था. यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि प्रतीकुर ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ डायमंड हार्बर सीट से चुनाव लड़ा था.
विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी में अगर रहमान जैसे तेजतर्रार नेताओं की भी नहीं सुनी जा रही है तो साफ है कि संगठन में कई खामियां हैं. अंदरुनी गुटबाजी जारी रहने तक पार्टी के वोटरों का उसकी ओर लौटना मुश्किल ही लग रहा है.