पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय को बीजेपी का मज़बूत वोट बैंक माना जाता है। इस तबके के समर्थन से ही पार्टी का चुनावी प्रदर्शन लगातार निखरता रहा है। लेकिन अब एसआईआर की कवायद ने बड़ी तादाद में इस समुदाय के लोगों के नाम कट गए हैं। समुदाय के नेताओं का दावा है कि लगभग 70 प्रतिशत मतुआ परिवार इस एसआईआर की प्रक्रिया से प्रभावित हुए हैं। इससे इन लोगों में भारी नाराजगी है।
बीजेपी ने भरोसा दिया था कि नागरिकता कानून के तहत नागरिकता मिलने के बाद उनके नाम मतदाता सूची में बने रहेंगे। लेकिन अब तार्किक विसंगति वाले ऐसे मतदाता कम से कम इस बार तो चुनाव में वोट नहीं दे सकेंगे। राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या इस तबके की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ेगी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी भी मतुआ-बहुल इलाकों में अपनी रैलियों में यह मुद्दा उठा रही हैं।
मतुआ महासंघ के मुताबिक, राज्य के विभिन्न जिलों में इस समुदाय की आबादी करीब एक करोड़ से ज्यादा है। यह 294 में से कम से कम 45 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं। खासकर कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले के अलावा नदिया जिले के 20 विधानसभा इलाकों में इनकी अहम मौजूदगी है।

जानिए, मतुआ समुदाय क्या है

मतुआ समुदाय की शुरुआत 1860 में अविभाजित बंगाल में समाज सुधारक हरिचंद ठाकुर ने की थी। समुदाय के लोग उन्हें भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं और श्री श्री हरिचंद ठाकुर कहते हैं। 1947 में देश के विभाजन के बाद हरिचंद ठाकुर के परिवार वाले सीमा पार कर पश्चिम बंगाल में बस गए। यहां मतुआ समुदाय का जिम्मा हरिचंद ठाकुर के परपोते प्रथम रंजन ठाकुर ने संभाला और उनकी पत्नी वीणापाणि देवी को ही मतुआ माता या बड़ो मां यानी बड़ी मां कहा जाने लगा। बोरो मां ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आने वाले इस समुदाय के शरणार्थियों के लिए बांग्लादेश सीमा पर पर ठाकुरनगर नाम से एक बस्ती बसाई। वर्ष 2000 के बाद यह समुदाय एक संगठित वोट बैंक के रूप में उभरा।
हरिचंद ठाकुर के परपोते प्रथम रंजन ठाकुर के दौर से ही परिवार का राजनीतिक रसूख और दखल रहा है। वह 1962 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी जीते थे। बड़ो मां मतुआ समुदाय के लोगों के लिए बहुत ही सम्मानित थीं। वह खुद तो राजनीति से दूर रहीं। लेकिन 2010 में उनकी ममता बनर्जी से नजदीकियां बढ़ीं और उन्होंने उसी साल दीदी को मतुआ समुदाय का संरक्षक घोषित कर दिया। 2011 के चुनावों में ममता बनर्जी को इसका जबरदस्त फायदा मिला। मतुआ वोटों पर टीएमसी की पकड़ मजबूत हो गई।

2014 में मतुआ माता के बेटे कपिल कृष्ण ठाकुर टीएमसी के टिकट पर लोकसभा पहुंच गए। उनकी मौत के बाद उपचुनाव में टीएमसी ने उनकी पत्नी ममता बाला ठाकुर को टिकट दिया और उन्होंने जीत हासिल की। लेकिन बाद में बीजेपी ने इस वोट बैंक में सेंध लगाई और इसी परिवार के शांतनु ठाकुर को टिकट दिया, जो वर्ष 2019 में जीत कर संसद पहुंचे।

मतुआ समुदाय का राजनीतिक झुकाव

शुरुआत में मतुआ समुदाय का झुकाव वाम दलों की ओर था, लेकिन समय के साथ यह बदलता गया। ममता बनर्जी के उभार के बाद यह समुदाय बड़ी संख्या में तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ गया। 2011 और 2016 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को इसका काफी फायदा मिला। लेकिन 2019 लोकसभा और 2021 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस वोट बैंक में सेंध लगाई। पीएम मोदी नेतृत्व में बीजेपी ने कई सीटों पर बढ़त बनाई।
भाजपा इस समुदाय को नागरिकता कानून के तहत नागरिकता देने का वादा करती रही है। लेकिन इसकी प्रक्रिया जटिल होने की वजह से अब तक इस समुदाय के ज्यादा लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकी है। जरूरी दस्तावेजों के अभाव में अब मतदाता सूची से भी उनके नाम कट गए हैं।

'नागिरकता देने का वादा था'

मतुआ नेता और तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद ममता बाला ठाकुर ने कहा है कि हम लोग तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से यहां आए थे। केंद्र सरकार ने हमें नागरिकता देने का वादा किया था। लेकिन अब एसआईआर की कवायद ने हमें शरणार्थी से घुसपैठिया बना दिया है।

उत्तर 24-परगना जिले के सीमावर्ती उत्तर पांचपोता गांव में रहने वाली मतुआ आबादी का बड़ा हिस्सा वर्ष 1980 में खुलना (बांग्लादेश) में उत्पीड़न से आजिज आकर यहाँ पहुंचा था। लेकिन इनमें से दर्जनों लोगों के नाम मतदाता सूची से कट गए हैं।

यहां आने के बाद इन सबके पैन कार्ड और वोटर कार्ड बन गए। ज्यादातर लोगों के पास आधार कार्ड भी हैं। लेकिन अब एसआईआर ने इन सबको अधर में लटका दिया है।
इसी गांव के प्रणब मंडल का कहना है कि हमें शुरू से ही भरोसा दिया गया था कि एसआईआर के दौरान किसी हिंदू का नाम नहीं कटेगा। लेकिन हकीकत इसके उलट है। अब हम क्या करें, यह समझ नहीं पा रहे हैं। उनका सवाल है कि कल को केंद्र सरकार हमें घुसपैठिया बता कर बांग्लादेश वापस भेजने का प्रयास करे तो हम कहां जाएंगे।

ममता की रणनीति

ममता बनर्जी ने इसी दुखती रग मरहम लगाते हुए कहा है कि बंगाल में कोई डिटेंशन कैंप नहीं खुलेगा और वो यहां से एक व्यक्ति को भी बाहर नहीं भेजने देंगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मतुआ समुदाय भाजपा का अहम वोट बैंक रहा है। पार्टी उनको नागरिकता देने के वादे करती रही है। नागरिकता कानून भी इसी समुदाय को ध्यान में रखते हुए पारित किया गया था। तब इलाके के लोगों ने बड़े पैमाने पर जश्न मनाया था। लेकिन अब एसआईआर के दौरान बड़े पैमाने पर इस समुदाय के लोगों के नाम कटने की वजह से उनमें भारी नाराजगी है। उनकी यह नाराजगी भाजपा को भारी पड़ सकती है।