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क्या भारत ने चीन के सपने पर ब्रेक लगा दिया है?

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही ह्वाबे पर अपने यहाँ रोक लगाई थी। ब्रिटेन ने ह्वाबे को पिछले साल 5-जी का लाइसेंस दिया था, उससे भी ह्वाबे को हाथ धोना पड़ेगा क्योंकि कोरोना की वजह से ब्रिटेन में भी चीन के ख़िलाफ़ भारी गुस्सा है।
रंजीत कुमार

पूर्वी लद्दाख के सीमांत भारतीय इलाकों पर जिस तरह कब्जा कर चीन ने भारत से पंगा लिया है, क्या इसके नतीजे के तौर पर हम चीनी स्वप्न को ध्वस्त होते हुए देखेंगे?
2013 में सत्ता ग्रहण करने के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने लोगों को चीन की ऐतिहासिक महानता की ओर ध्यान दिलाया था और आह्वान किया था कि उसी महानता को फिर हासिल करने का वक़्त आ गया है। इसके लिये उन्होंने चीनियों से कहा था कि चाइनीज ड्रीम यानी ‘चीनी सपना’ को हासिल करने के लिये देश को अपना पूरा योगदान दें।

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क्या है चीनी सपना?

इस चीनी सपने की स्पष्ट परिभाषा और लक्ष्य चीनी राष्ट्रपति ने नहीं बताया था। लेकिन चीनी कम्युनिस्ट प्रकाशनों में इस चीनी सपने का जिक्र करते हुए कहा गया था कि 2049 में जब चीन अपनी स्थापना की सौवीं सालगिरह मनाएगा तब तक चीन को एक वैश्विक ताकत के तौर पर स्थापित करना कम्युनिस्ट पार्टी का मुख्य लक्ष्य होगा।

इसी चीनी सपने को साकार करने के लिये राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पूरी पृथ्वी पर आक्रामक नीतियाँ अपनाईं।

चीनी हथकंडा

इस वजह से पिछले 7 सालों के भीतर चीन ने अपने ज़मीनी और सागरीय पड़ोसियों से लेकर अफ्रीका महाद्वीप और लातिन अमेरिका तक के छोटे द्वीप देशों पर अपनी आर्थिक और राजनीतिक छाप छोड़ने के लिये हर तरह के हथकंडे अपनाये हैं।
वह यूरोप जैसे अमीर महाद्वीप को भी अपने चंगुल में लेने में कामयाब होता जा रहा था। इन देशों की जनता चीन की इस आर्थिक और सामरिक आक्रामकता का कोई जवाब नहीं दे पा रही थी क्योंकि इन देशों के शासकों को चीन ने अपने प्रभाव में लेना शुरू कर लिया था।

चीन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

मिसाल के तौर पर इटली के मिलान शहर में बीते फरवरी में कोरोना महामारी फैलने के ख़िलाफ़ चीन-विरोधी प्रदर्शन हुए। स्थानीय लोगों ने जब चीनी व्यापारियों पर अपना गुस्सा उतारना शुरू किया तो मिलान के मेयर ने सार्वजनिक तौर पर चीनियों को गले लगाकर यह दिखाने की कोशिश की कि चीन महामारी के लिये ज़िम्मेदार नहीं है और चीन इटली का हितचिंतक है। 
मिलान शहर में कोरोना के बहाने चीन के ख़िलाफ़ गुस्सा इसलिये फूटा कि चीनियों ने चमड़ा कारोबार पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है, जिससे स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी छिन गई थी।

ऑस्ट्रेलिया पर चीनी नज़र

चीनी व्यापारियों ने कमोबेश इसी तरह अपना आर्थिक साम्राज्य कई अन्य देशों में फैलाया है। ऑस्ट्रेलिया इसकी एक और मिसाल है, जहाँ के छोटे कारोबार पर कब्जा करने के बाद वह बड़ी कम्पनियों को हथियाने पर निगाहें गड़ाने लगा था। ऑस्ट्रेलिया के सीनेटर भी चीन के चंगुल में आ गए थे और वे ऑस्ट्रेलियाई संसद में चीन के पक्ष में बोलने से नहीं हिचकते थे।
ऑस्ट्रेलिया के लोगों ने चीन की इस चाल को समझा है कि चीन की मंशा उस देश को अपने सामरिक प्रभाव में लेने की है।
जब ऑस्ट्रेलिया ने चीन से फैली कोरोना महामारी की जाँच की ज़रूरत बताई तो चीन ने धमकी दी कि वह अपने पर्यटकों और छात्रों को ऑस्ट्रेलिया जाने से रोकेगा और कृषि उत्पादों का आयात रोक देगा। लेकिन ऑस्ट्रेलियाई शासक चीन की इस धमकी के आगे नहीं झुके और हिंद प्रशांत इलाक़े में चीन की आक्रामक समर नीतियों का मुक़ाबला करने के लिये नई रक्षा नीति घोषित कर दी।

भारत ने जिस तरह चीनी सैन्य अतिक्रमण का क़रारा जवाब दिया है और उसकी चुनौती से निबटने के लिये जो तेवर अपनाए हैं, उससे चीन हक्का-बक्का रह गया है।

भारत का आर्थिक हमला

जिस तरह भारत सरकार ने चीनी डिजिटल कम्पनियों पर हमला बोला है, उसने चीनी कम्पनियों को झकझोर कर रख दिया है और उसकी प्रतिक्रिया में दूसरे देश भी कदम उठाने की हिम्मत करेंगे। चीनी कम्पनियों के ख़िलाफ़ भारत में की गई कार्रवाई की तर्ज पर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने भी मंगलवार को चीनी डिजिटल कम्पनियों पर प्रतिबंध लगाने का इरादा जाहिर कर दिया। 

चीनी कम्पनियों के ख़िलाफ़ भारत में जो माहौल बना है वह अमेरिका अपने यहाँ बहुत पहले से बनाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन इस माहौल का असर बाकी दुनिया पर नहीं पड़ रहा था।

चीन का आर्थिक साम्राज्यवाद

अब चीन की चिंता है कि जिस तरह भारत ने चीनी आर्थिक साम्राज्यवाद को चुनौती दी है, उससे दूसरे देश भी प्रेरणा लेंगे। आखिरकार चीन ने केवल भारत बल्कि अमेरिका से लेकर यूरोपीय देशों और दूसरे अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देशों की अर्थव्यवस्था चौपट की है, लेकिन वहाँ की सरकारें चीन के ख़िलाफ़ कुछ ठोस नहीं कर पा रही थीं।
चीन अपने सब्सिडी वाले औद्योगिक उत्पादों के ज़रिये न केवल अमेरिका बल्कि भारत और दूसरे छोटे देशों की अर्थव्यवस्था को चौपट करने में कामयाब होता गया।
इसका असर यह हो रहा था कि सभी देश चीनी मालों के बाज़ार में तब्दील होने लगे थे और सभी देशों का घरेलू निर्माण उद्योग तबाह होने लगा।

बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव

इसका नतीजा यह निकला कि चीन ने विश्व अर्थव्यवस्था के लिये ग्लोबल सप्लाई चेन बनाने में कामयाबी पा ली और इसे स्थायी बनाने के लिये ही चीनी राष्ट्रपति ने ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ (बीआरआई) की महत्वाकांक्षी योजना लागू करनी शुरू की। न केवल चीन ने शिनजियांग से पाकिस्तान के ग्वादर तक 2,200 किलोमीटर लम्बा चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) बना रहा है, बल्कि चीन को यूरोप से जोड़ने के लिये रेल लाइनें तक बिछा रहा है। चीन इस तरह यह सुनिश्चित कर रहा है कि वह इन परिवहन मार्गों के ज़रिये अपने औद्योगिक और उपभोक्ता माल की बदौलत पूरी दुनिया पर छा जाएगा।
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भारत का इनकार

लेकिन भारत ने चीनी बीआरआई में शामिल होने से इनकार कर दिया। पर, भारत चीनी माल को भारतीय बाज़ार में छाने से नहीं रोक सका। चीन के ख़िलाफ़ भारतीयों का गुस्सा इसलिये फूटा कि चीन ने 15 जून को गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकों को मारकर भारतीयों की अस्मिता पर चोट की।
चीन के ख़िलाफ़ माहौल बनने का असर यह होगा कि भारत के अरबों डॉलर के डिजिटल, उपभोक्ता और 5-जी बाज़ार से चीनी कम्पनियों को हाथ धोना पड़ेगा।

चीन पर आर्थिक चोट?

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही ह्वाबे पर अपने यहाँ रोक लगाई थी। ब्रिटेन ने ह्वाबे को पिछले साल 5-जी का लाइसेंस दिया था, उससे भी ह्वाबे को हाथ धोना पड़ेगा क्योंकि कोरोना की वजह से ब्रिटेन में भी चीन के ख़िलाफ़ भारी गुस्सा है।

इस तरह चीनी कम्पनियों को जिस तरह विश्व बाज़ार से हाथ धोना पड़ रहा है, उसका असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा जिससे चीन की विकास दर प्रभावित होगी। चीनी माल पर निर्भरता ख़त्म करने के लिये जिस तरह अमेरिका से लेकर भारत में माहौल बनता जा रहा है उससे चीनी निर्यात और चीनी निर्माण उद्योग भी काफी प्रभावित होगा।

इन सब का सम्मिलित असर चीन की घरेलू राजनीति पर पड़ेगा। फलस्वरूप दुनिया भर में पाँव फैलाने की चीनी रणनीति आगे नहीं बढ़ पाएगी। 2049 तक चीन कैसे सपने देखेगा, इस बारे में अब कयास ही लगाए जा सकते हैं।

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