ईरान परमाणु कार्यक्रम पर कई बड़ी शर्तें मान गया था और यह अमेरिका के लिए अब तक की सबसे बड़ी सफलता थी तो फिर अचानक हमला क्यों हो गया? जानिए मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ क्या कहते हैं।
ईरान जब परमाणु मुद्दे पर क़रीब-क़रीब हर शर्त मान चुका था तो फिर अमेरिका-इसराइल ने अचानक हमला क्यों कर दिया? यह हमला भी तब किया जब आगे की और वार्ता भी तय थी? जानकार इस मुद्दे को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उनकी छवि बचाने की नीति से जोड़कर देख रहे हैं।
अमेरिका और इसराइल के ये हमले ऐसे समय में हुए हैं जब ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत चल रही थी। जून 2025 में भी ऐसे हमले हुए थे, लेकिन तब बातचीत टूटने की वजह से। इस बार फर्क ये है कि बातचीत में बड़ी सफलता मिल रही थी, फिर भी हमला हो गया। अक्सर मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले ओमान ने पहली बार 28 फ़रवरी को सीबीएस न्यूज़ से बात की। ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने बताया कि ईरान ने बहुत बड़ी शर्तें मान ली थीं।
ईरान ने वादा किया था कि वह परमाणु सामग्री का भंडारण जीरो कर देगा, अपनी 60% समृद्ध यूरेनियम को ईंधन में बदल देगा जो वापस नहीं बदला जा सकता और अमेरिकी निरीक्षकों को अपनी परमाणु साइटों पर आने देगा। ये सब तुरंत लागू हो सकते थे। मंत्री ने कहा कि ये शर्तें ओबामा के समय के ईरान न्यूक्लियर डील से भी बेहतर हैं। ट्रंप हमेशा से ऐसा ही चाहते थे। अमेरिका के लिए ये बहुत अच्छा सौदा था।
खाड़ी के देशों में रिपोर्टिंग करने वाले और गल्फ न्यूज़ के पूर्व संपादक बॉबी नक़वी ने सत्य हिंदी से बातचीत में समझाया कि आख़िर जब ईरान परमाणु समझौतों और अंतरराष्ट्रीय शर्तों पर पूरी तरह सहमत हो चुका था तब अमेरिका और इसराइल ने अचानक हमला क्यों किया।
बॉबी नक़वी ने कहा, 'पिछले तीन-चार दिनों से वार्ता को लेकर सकारात्मक रिपोर्टें आ रही थीं। लेकिन इसराइल ने जो अचानक हमला कर दिया, वह कई मायनों में काफ़ी हैरान करने वाला देखा जा रहा है। ओमान के विदेश मंत्रालय में एक कंसल्टेंट ने बातचीत को लेकर पूरी डिटेल दी है। पिछले 45 साल में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इतना अचीव नहीं किया जितना ट्रंप प्रशासन ने इस बातचीत में अचीव कर लिया था। इसमें तीन बड़ी बड़ी चीजें थीं। ईरान ने 28 फरवरी को ही कमिट कर दिया था कि वह समृद्ध यूरेनियम को ज़ीरो स्तर पर ले आएगा। ईरान ने यह भी मान लिया था कि वह आईएईए को अपने यूरेनियम संवर्धन केंद्र तक पहुंच देगा। वार्ता में सबकुछ ठीक रहा और अगले ही पल हमला हो गया। तो लोग चौंक गए कि आख़िर ये क्यों हो गया!'
खाड़ी देशों के मामलों के जानकार बशीर अली अब्बास ने द इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि लगता है कि ओमान को पता था कि अमेरिका हमला करने वाला है। उन्होंने लिखा है कि व्हाइट हाउस एक 'कमिटमेंट ट्रैप' में फँस गया था, यानी वे अपनी पुरानी प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हट सकते थे। ट्रंप के लिए इतनी अच्छी डील भी चेहरे बचाने के लिए काफी नहीं थी। नतीजा ये हुआ कि हमला हो गया, बिना ये सोचे कि रेजिम चेंज यानी सत्ता बदलने का लक्ष्य हासिल होगा या नहीं, भले ही बड़े नेता मारे जाएं।
जून 2025 और अब का फ़र्क
जून 2025 में अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को तबाह करने का बहाना बनाया था। फोर्डो साइट पर नुक़सान हुआ था और ट्रंप ने दावा किया कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम ख़त्म हो गया। अब फ़रवरी 2026 में कुछ अधिकारी कह रहे हैं कि ईरान एक हफ्ते में परमाणु हथियार बना सकता है। लेकिन सत्ता बदलने के लिए नया बहाना है ये कहना कि बातचीत में कोई नतीजा नहीं निकला। ऐसा तब है जब और भी बैठकें तय थीं।
अब्बास ने लिखा है, 'ट्रंप ख़ामेनेई की मौत पर जीत का दावा कर सकते हैं, लेकिन अगर ईरान का शासन नया नेता चुनकर टिका रहता है तो ये साबित होगा कि व्यवस्था मजबूत है। ये बदलाव व्यवस्था के अंदर होगा, न कि पूरी व्यवस्था का। ख़ामेनेई की मौत से ईरान को अब संयम रखने की कम वजह बची है और वो बड़े हमलों की धमकी पर अमल कर सकता है।
ईरान ने पहले कहा था कि अगर अमेरिका सीमित हमला भी करेगा, तो वो बड़ा पारंपरिक जवाब देगा। ये बचाव की रणनीति थी। जून 2025 में ईरान ने सिर्फ प्रतीकात्मक जवाब दिया था, जैसे कतर के अल उदीद बेस पर हमला। लेकिन अब वो ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि इससे उनकी रोकथाम या बचाव की ताकत कम हो जाएगी। अमेरिका को ईरान की ये मजबूरी पता थी। ट्रंप को बड़ी जीत चाहिए थी, जो डील से नहीं मिल सकती थी। इसलिए हमला प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि बड़ा हुआ।
अब्बास ने लिखा है कि अमेरिका ग्राउंड पर सैनिक नहीं भेजना चाहता, इसलिए हवाई ताकत से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना चाहता है। अमेरिका ने ईरान के जवाब की तैयारी की। यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड कैरियर ग्रुप को इज़राइल के पास तैनात किया, क्योंकि पता था ईरान इसराइल पर हमला करेगा। अमेरिका अपनी उन्नत एयर डिफेंस पर भरोसा कर रहा है।
लेकिन ईरान ने बड़े मिसाइल और ड्रोन से हमले कर नुकसान पहुंचाया और दुबई, बहरीन, रियाद, कुवैत के पूरे क्षेत्र पर हमला किया जहां अमेरिकी सैनिक हो सकते हैं। ईरान ने यूएई पर उतने ही हमले किए जितने इसराइल पर। इसके साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल टैंकरों को रोक दिया, जो दुनिया के 20% तेल व्यापार को प्रभावित करता है। ये सब अमेरिका, इसराइल और उसके सहयोगी देशों को सजा देने के लिए है।
पड़ोसी देशों पर हमला क्यों?
गल्फ न्यूज़ के पूर्व संपादक नक़वी ने यह भी कहा कि ईरान अपने पड़ोसी देशों पर हमला इसलिए कर रहा है कि इससे इन देशों की अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुँचेगा और फिर ये देश अपने सहयोगी अमेरिका पर युद्ध को जल्द ख़त्म करने के लिए दबाव डाल सकते हैं कि हम युद्ध नहीं झेल सकते हैं। ईरान अमेरिका के इंफ्रास्ट्रक्चर को डैमेज कर रहा है जिससे अमेरिका के लिए युद्ध को लंबा खिंचना मुश्किल हो जाए। ओमान पर हमला क्यों नहीं हुआ? इसको लेकर वह कहते हैं- क्योंकि यह यूएस और ईरान के बीच में मध्यस्थता कर रहा था।
इसके अलावा, ईरान में नागरिक इलाकों पर हमले हुए। एक स्कूल में बच्चे मारे गए। इससे ट्रंप का 'व्यवस्था बदलने' का कॉल मुश्किल हो गया है। जैसे-जैसे युद्ध बढ़ता जाएगा अमेरिका के लिए युद्ध पर ख़र्च बढ़ता जाएगा। यही वजह है कि ट्रंप लंबा अभियान नहीं चाहते। ईरान की क्षमता की परीक्षा है, लेकिन ईरान अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है, इसलिए उसके पास युद्ध को जारी रखने की ज्यादा वजह है, जब तक अमेरिका पीछे नहीं हटता। ये संघर्ष मध्य पूर्व की शांति के लिए बड़ा ख़तरा है। दुनिया देख रही है कि क्या ये रुक सकता है या और फैलेगा।