ढाका पुलिस का दावा है कि छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के मुख्य संदिग्ध फैसल करीम मसूद और आलमगीर शेख मेघालय सीमा के रास्ते भारत भाग गए हैं। बांग्लादेश मौजूदा तनाव के बीच उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है।
बांग्लादेश के छात्र नेता हादी उस्मान शरीफ। जिनकी हत्या कर दी गई।
बांग्लादेश के छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के मामले में दो मुख्य संदिग्ध भारत की ओर भाग निकले हैं। ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस (डीएमपी) के अनुसार, ये संदिग्ध मयमंसिंह शहर के हलुआघाट सीमा से भारत में प्रवेश कर मेघालय पहुंच गए।
डीएमपी के अतिरिक्त आयुक्त एसएन नजरुल इस्लाम ने रविवार को डीएमपी मीडिया सेंटर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा, “हमारी जानकारी के अनुसार, संदिग्धों ने हलुआघाट सीमा के रास्ते भारत में प्रवेश किया। सीमा पार करने के बाद उन्हें एक व्यक्ति नाम पुरती ने रिसीव किया। बाद में एक टैक्सी ड्राइवर सामी ने उन्हें मेघालय के तुरा शहर पहुंचाया।”
संदिग्धों की पहचान फैसल करीम मसूद और आलमगीर शेख के रूप में हुई है। पुलिस के मुताबिक, भागने के दौरान स्थानीय सहयोगियों की मदद से वे सीमा पार करने में सफल रहे।
गौरतलब है कि शरीफ उस्मान हादी पर 12 दिसंबर को ढाका के बिजॉयनगर इलाके में चुनाव प्रचार के दौरान सिर में गोली मारी गई थी। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें सिंगापुर ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और हिंसा हुई थी।
यह मामला बांग्लादेश में राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकता है। पुलिस जांच जारी रखे हुए है।
कौन हैं शरीफ उस्मान हादी
शरीफ उस्मान हादी (जिन्हें उस्मान हादी के नाम से भी जाना जाता है) का जन्म 30 जून 1993 को बांग्लादेश के झालोकाठी जिले के नलचिटी उपजिला में हुआ था। वे एक धार्मिक परिवार से ताल्लुक रखते थे, उनके पिता मौलाना अब्दुल हादी और मां तसलीमा हादी थे। हादी ने ढाका विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पढ़ाई की और छात्र जीवन से ही राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गए। वे एक लेखक, शिक्षक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते थे। 2024 के जुलाई विद्रोह (जिसे जुलाई क्रांति भी कहा जाता है) में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जहां उन्होंने छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया और इंकलाब मंच (Inqilab Moncho) की स्थापना की तथा इसके प्रवक्ता बने।
भारत विरोधी विचार थे हादी के
हादी अपनी भारत-विरोधी और कट्टरपंथी विचारधारा के लिए विवादास्पद थे। वे शेख हसीना की अवामी लीग सरकार की कड़ी आलोचना करते थे और भारत को बांग्लादेश में "हेगेमोनी" थोपने का आरोप लगाते थे। उन्होंने अवामी लीग पर प्रतिबंध की मांग की और जुलाई विद्रोह के शहीदों के लिए न्याय की वकालत की। फरवरी 2026 के चुनाव में ढाका-8 सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में प्रचार कर रहे थे। 12 दिसंबर 2025 को ढाका के पलटन इलाके में मस्जिद से निकलते समय उन पर गोली चलाई गई, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। सिंगापुर में इलाज के दौरान 18 दिसंबर 2025 को उनकी मौत हो गई, जिसके बाद बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर हिंसा और प्रदर्शन हुए।
बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल और चुनाव
बांग्लादेश में 2024 की राजनीतिक उथल-पुथल की शुरुआत जून-जुलाई में सरकारी नौकरियों में कोटा सिस्टम के खिलाफ छात्र प्रदर्शनों से हुई। ये प्रदर्शन जल्द ही शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन में बदल गए, जिसमें पुलिस और अवामी लीग समर्थकों की ओर से दमन हुआ और सैकड़ों प्रदर्शनकारी मारे गए (जिसे जुलाई नरसंहार कहा जाता है)। अगस्त 2024 में हसीना को सत्ता छोड़कर भारत भागना पड़ा। इसके बाद नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस की अगुवाई में अंतरिम सरकार बनी, जिसमें छात्र नेता और नागरिक समाज के लोग शामिल हुए। इस सरकार ने सुधारों का वादा किया, लेकिन अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया और हसीना पर मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप लगे।
2025 में राजनीतिक तनाव बढ़ता गया। अवामी लीग को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत चुनाव से बाहर रखा गया, जबकि जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी जैसे दल सक्रिय हुए। छात्र गुटों में विभाजन हुआ, कुछ ने नेशनल सिटिजन पार्टी बनाई, जबकि हादी जैसे नेता इंकलाब मंच से जुड़े और कट्टरपंथी तथा भारत-विरोधी रुख अपनाया। हादी की हत्या ने दिसंबर 2025 में नई हिंसा भड़का दी, जिसमें मीडिया संस्थानों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। अंतरिम सरकार पर चुनाव टालने और सुधारों में देरी के आरोप लगे, जिससे अस्थिरता बढ़ी।
आगामी चुनाव 12 फरवरी 2026 को निर्धारित हैं, जो हसीना के पतन के बाद पहला राष्ट्रीय चुनाव होगा। इसमें बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी मुख्य दावेदार हैं, जबकि अवामी लीग बाहर है। यूनुस सरकार ने चुनाव से पहले सुधारों (जैसे संवैधानिक बदलाव और जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह) का वादा किया है, लेकिन राजनीतिक हिंसा, आर्थिक संकट और क्षेत्रीय तनाव (खासकर भारत के साथ) के कारण चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। यह चुनाव बांग्लादेश की लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए निर्णायक माना जा रहा है।