यूएस भारत को महंगा तेल बेच रहा है
अमेरिका ने भारत पर तेल ख़रीदने के लिए दबाव बढ़ा दिया है। हालाँकि ये दबाव तो प्रधानमंत्री मोदी की 2025 की अमेरिकी यात्रा से ही पड़ना शुरू हो गया था। व्यापार असंतुलन को कम करने के नाम पर ट्रम्प ने हथियार और तेल बेचने की पेशकश की थी, बल्कि कहा था कि भारत ख़रीदे। लेकिन अब ये दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत की धरती पर क़दम रखने से पहले ही अपना मांग-पत्र या यूँ कहें आदेश-पत्र सामने रख दिया था। उन्होंने कहा था कि भारत जितना चाहे तेल ख़रीद सकता है। उनका अंदाज़-ए-बयाँ ऐसा है मानो वे महारानी विक्टोरिया के दूत के तौर पर पधारे हों और अपने उपनिवेश को बता रहे हों कि उसे क्या-क्या करना है।
उन्होंने ये भी ऐलान कर दिया था कि वेनेजुएला की राष्ट्रपति भारत का दौरा करेंगी। ये उनकी उदारता नहीं थी, इसमें उनका आदेश निहित था।
ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि अमेरिका ने वेनेज़ुएला को अपना उपनिवेश बना लिया है। उसके तेल की बिक्री वही कर रहा है। तेल से होने वाली पूरी आय अमेरिकी खज़ाने में जाती है और हमें पता नहीं कि उसका कितना हिस्सा वेनेज़ुएला को दिया जाता है या दिया भी जाता है या नहीं।
ये भी सच्चाई है कि इस बीच मोदी सरकार ने सचमुच अमेरिका से तेल आयात बढ़ा दिया है। इसे उसने तेल आपूर्ति के डायवर्सिफिकेशन का नाम दिया है। कहा गया कि हम किसी देश विशेष पर अपनी निर्भरता यानी रूस पर कम कर रहे हैं। मगर इसका असली मतलब ये था कि नरेंदर सरेंडर अमेरिकी फ़रमान का पालन कर रहे थे।
अमेरिका-इस्राइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया जिससे हालात एकदम से बदल गए। ख़ास तौर पर ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरू मध्य बंद कर देने से। ज़ाहिर है कि तेल की आपूर्ति में एक बड़ी बाधा पैदा हो गई। अमेरिका ने मजबूरी में रूस से एक महीने के लिए प्रतिबंधों को हटाकर तेल ख़रीदने की छूट दे दी।
अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दामों को कम रखने के कारण ये छूट देने पड़ी, लेकिन भारत के लिए ये अच्छा रहा। हालाँकि उसे अब बढ़ी हुई क़ीमतों पर तेल ख़रीदने के लिए बाध्य होना पड़ा। पहले रूस अगर 60-65 डॉलर प्रति बैरल दे रहा था तो अब वह 95 डॉलर प्रति बैरल बेचने लगा। ये फिर भी अमेरिकी तेल के मुक़ाबले बहुत सस्ता था इसलिए भारतीय तेल कंपनियों ने दबाकर ख़रीदारी की।
बहरहाल, अब जबकि अमेरिका हमें तेल बेचने पर आमादा है और मोदी सरकार उसके आदेश का पालन करने को तत्पर है तो हमें ये देखना चाहिए कि रूस और ईरान से तेल ख़रीदना हमारे लिए फ़ायदेमंद है या फिर अमेरिका से।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। रोजाना करीब 4.8 से 5.2 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल आयात करता है, जिसमें 85-88 प्रतिशत विदेश से आता है।
2026 में ईरान पर अमेरिका-इस्राइल के हमले और होर्मुज जलडमरू बंद के कारण आपूर्ति में बड़े बदलाव आए हैं। भारत रूस और ईरान से सस्ता तेल ख़रीदता रहा है जबकि अमेरिका से आयात बढ़ाने की कोशिश हो रही है, लेकिन रूस अभी भी महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है।
2025-26 में अमेरिका से क्रूड आयात बढ़ा है। जनवरी 2026 में अमेरिका का हिस्सा करीब 6.8-10.4 प्रतिशत था। अप्रैल-जनवरी 2025-26 में अमेरिका से आयात का मूल्य 8.91 बिलियन डॉलर रहा, जो पिछले साल की समान अवधि से 64 प्रतिशत ज्यादा था। कुल आयात में अमेरिका का वॉल्यूम औसतन 2.7 से 5.4 लाख बैरल प्रति दिन रहा। 2025-26 में अमेरिका से कुल 8-11 बिलियन डॉलर के मूल्य के आसपास का तेल आयात अनुमानित है।
अब आइए देखते हैं कि अमेरिकी तेल हमें किस क़ीमत पर मिल रहा है या वह रूसी और ईरानी तेल के मुक़ाबले किस तरह से महंगा पड़ रहा है। मई 2026 में तेल की कीमत औसतन 107-109 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही। अमेरिकी क्रूड मुख्य रूप से ब्रेंट के बराबर या थोड़ा महंगा मिलता है। इसमें ढुलाई और इंश्योरेंस का खर्च 2-4 डॉलर/बैरल अतिरिक्त लगता है क्योंकि दूरी ज्यादा है। इसलिए भारत पहुंचने की कुल कीमत रूसी तेल से काफी महंगी पड़ती है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि भारतीय रिफाइनरियां अमेरिकी लाइट स्वीट क्रूड पर अच्छा मार्जिन नहीं कमा पातीं क्योंकि वे उराल्स (रूसी) जैसे हेवी क्रूड के लिए बनी हुई हैं।
रूस भारत का बड़ा सप्लायर रहा है। 2025 में 30-40 प्रतिशत शेयर था, लेकिन अमेरिकी दबाव और ट्रेड डील के बाद जनवरी 2026 में घटकर 19.3 प्रतिशत रह गया। मार्च 2026 में होर्मुज संकट के बाद रूस ने रिकॉर्ड 2.25 मिलियन सप्लाई किया और शेयर 50 प्रतिशत तक पहुंचा।
पहले रूसी उराल्स क्रूड ब्रेंट पर 8-13 डॉलर डिस्काउंट पर मिलता था, जो भारत के अरबों डॉलर बचाता था। 2026 संकट में डिस्काउंट घटा, कुछ डील्स में 2-8 डॉलर प्रीमियम भी चला, लेकिन कुल मिलाकर रूसी तेल अभी भी सस्ता और बेहतर है। अमेरिकी तेल रूसी से 10-20 डॉलर प्रति बैरल महंगा पड़ता है।
2025-26 में अमेरिका-भारत ट्रेड डील के तहत भारत ने रूसी आयात कम करने और अमेरिकी/वेनेजुएला तेल बढ़ाने का वादा किया। इसके बदले अमेरिका ने 25 प्रतिशत टैरिफ हटाया। लेकिन पूरा शिफ्ट अव्यावहारिक है। अगर 1-2 मिलियन बैरल रूसी आयात घटाकर अमेरिकी बढ़ाया जाए तो 9-11 बिलियन डॉलर का सालाना नुक़सान होगा।
यही नहीं, रिफाइनरियों का लाभ भी दो प्रतिशत घटेगा, क्योंकि जैसा कि ऊपर बताया गया है कि हमारी रिफाइनरियाँ अमेरिकी तेल के शोधन के लिए नहीं बनी हैं। आयात बिल बढ़ने से करेंट अकाउंट घाटा (CAD) बढ़ेगा और रुपया कमजोर होगा।
ये भी ध्यान रखिए कि महंगा पेट्रोल-डीजल ख़रीदने के और भी नुक़सान हैं। हमें ज़्यादा विदेशी मुद्रा ख़र्च करनी पड़ेगी और घरेलू बाज़ार में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका मतलब है कि महँगाई में इज़ाफ़ा। GDP की विकास दर पर भी इसका 0.2-0.5 प्रतिशत तक असर पड़ सकता है।
भारत ने पिछले साल रूसी सस्ते तेल से 13 बिलियन डॉलर तक बचत की थी। पूरा शिफ्ट करने से ईंधन की कीमतें स्थिर रखना मुश्किल हो जाएगा। लिहाज़ा, ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से रूस, मध्य पूर्व और विविधीकरण का बैलेंस जरूरी है।
ज़ाहिर है कि अगर प्रधानमंत्री कंप्रोमाइज्ड नहीं हैं, अगर मोदी सरकार विदेशी दबाव में नहीं है, अगर उसने अपनी बुद्धि ट्रम्प के पास गिरवी नहीं रखी है तो वह अमेरिका से तेल नहीं ख़रीदेगी, भले ही इसके लिए उस पर कितना ही दबाव डाला जाए।