अकेली ममता बनर्जी आखिरकार सर्वशक्तिमान मोदी का मुकाबला कर कैसे रही हैं? यह जानना बड़ा मजेदार और रोमांचक है। मोदी जय श्रीराम कहते हैं, तो ममता जय भवानी और जय काली कलकत्ते वाली का नारा देती हैं। नरेंद्र मोदी हिंदू संस्कृति की बात करते हैं, तो ममता नरेंद्र नाथ यानी स्वामी विवेकानंद के नाम पर कल्याण योजना चलाकर खामोश कर देती हैं। चाहे महिला हो, मटुआ हो, युवा हो या किसान - मोदी की मुफ्त योजनाओं का पोस्ट डेटेड चेक ममता के डायरेक्ट कैश बेनिफिट के आगे धुंधला पड़ जाता है। यानी मोदी के एक फूल (कमल) खिलाने के वादों का मुकाबला ममता दो फूल उगा कर करती हैं। भारतीय राजनीति में इस कदर तुर्की ब तुर्की जवाबी दांव का उदाहरण विरला ही मिलेगा।
सच तो यह है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ एक तरफ तृणमूल कांग्रेस (TMC) का 'अल्ट्रा-वेलफेयर' मॉडल है, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार के वित्तीय अनुशासन और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप। "मां, माटी, मानुष" का नारा अब केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि एक ठोस 'कैश-इकोनॉमी' में बदल चुका है। ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग के साये में हो रहे इस सियासी महासंग्राम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी की कल्याणकारी योजनाएं केंद्र के "विकास बनाम भ्रष्टाचार" के नैरेटिव को मात दे पाएंगी?
लक्ष्मी भंडार: ममता का 'ब्रह्मास्त्र' और वित्तीय गणित
पश्चिम बंगाल के 2025-26 के बजट पर नजर डालें तो 3.41 लाख करोड़ रुपये के कुल व्यय में से एक बड़ा हिस्सा सीधे जनता की जेब में जा रहा है। ममता बनर्जी की सबसे प्रभावी योजना 'लक्ष्मी भंडार' आज बंगाल की आधी आबादी (लगभग 2.21 करोड़ महिलाएं) का आधार बन चुकी है।
- डेटा की गहराई: वित्तीय वर्ष 2025-26 में इस योजना के लिए 26,700 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
रणनीति: विशेषज्ञों का मानना है कि SC/ST महिलाओं को 1,200 रुपये और सामान्य वर्ग को 1,000 रुपये (संशोधित दरों के साथ) का मासिक भुगतान ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 'लिक्विडिटी' बनाए रखता है। यह योजना भाजपा के उस आरोप को कुंद करती है कि सरकार केवल अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण कर रही है, क्योंकि इसका लाभ हर धर्म की महिला को मिल रहा है।
मोदी बनाम ममता: 'महिला कार्ड' की जंग और बंगाल का मिजाज
मोदी सरकार का 'महिला आरक्षण बिल' बंगाल की धरती पर आकर अपनी चमक क्यों खो देता है? इसका जवाब ममता बनर्जी की उस रणनीतिक घेराबंदी में है जिसे उन्होंने 'मोदी-ममता महिला द्वंद्व' बना दिया है।
- "जब दिल्ली 'आरक्षण' का वादा करती है, ममता 'अधिकार' का पैसा सीधे खाते में डाल देती हैं।"
ममता बनर्जी की सरकार आज राज्य की लगभग 95% आबादी को किसी न किसी कल्याणकारी योजना के दायरे में कवर कर रही हैं। इसीलिए ममता की 'लक्ष्मी भंडार' से जुड़ी 2.21 करोड़ महिलाएं मोदी के 'महिला आरक्षण कार्ड' से प्रभावित नहीं हैं क्योंकि वे इसे भविष्य का 'पोस्ट-डेटेड चेक' मानती हैं, जबकि ममता का 'कैश-बेनिफिट' उनके वर्तमान की रसोई चला रहा है। ममता ने बड़ी चालाकी से कन्याश्री (Kanyashree) के जरिए लड़कियों की पढ़ाई और रूपश्री (Rupashree) के जरिए उनकी शादी का खर्च भी राज्य के बजट का हिस्सा बना दिया है। यही कारण है कि भाजपा का 'महिला सशक्तिकरण' नैरेटिव बंगाल में 'दीदी' के डीबीटी (DBT) मॉडल के सामने फीका पड़ जाता है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर 'काउंटर-स्ट्राइक'
भाजपा अक्सर ममता बनर्जी पर 'जय श्री राम' के विरोध और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का आरोप लगाती है। इसके जवाब में ममता ने 'स्वामी विवेकानंद मेरिट-कम-मीन्स' (SVMCM) स्कॉलरशिप को अपना ढाल बनाया है।
- तथ्य: इस योजना के तहत मेधावी छात्रों को 1,000 से 8,000 रुपये प्रति माह तक की सहायता दी जा रही है। हिंदू सांस्कृतिक प्रतीक विवेकानंद के नाम पर यह योजना चलाकर ममता ने भाजपा के 'हिंदुत्व कार्ड' की धार कम कर दी है। इसके साथ ही 'मेधाश्री' और 'ऐक्यश्री' जैसी योजनाओं के जरिए उन्होंने पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के बीच संतुलन साधा है।
नरेंद्र मोदी बनाम नरेंद्रनाथ का 'नया दांव'
एक दिलचस्प और तीखा तथ्य यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो खुद को स्वामी विवेकानंद का परम अनुयायी मानते हैं, उन्होंने कभी भी ममता सरकार की 'स्वामी विवेकानंद मेरिट-कम-मीन्स' (SVMCM) स्कॉलरशिप की सार्वजनिक सराहना नहीं की। ममता ने नरेंद्रनाथ (स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम) के नाम पर यह योजना शुरू कर भाजपा के उस दावे को तार-तार कर दिया कि वे ही हिंदू प्रतीकों के एकमात्र संरक्षक हैं। यह ममता की वह 'राजनीतिक चतुराई है जहाँ वे भाजपा के ही मैदान पर, उनके ही नायक का नाम लेकर गोल दाग रही हैं। केंद्र इसे 'नाम बदलने की राजनीति' कह सकता है, लेकिन बंगाल के छात्र इसे 'विवेकानंद की मदद' के रूप में देखते हैं।
केंद्र-राज्य टकराव: 5.36 लाख करोड़ बनाम 'बकाया' का सच
बंगाल की राजनीति का सबसे विवादित अध्याय 'फंड' की लड़ाई है। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने आंकड़े और तर्क हैं:
केंद्र का पक्ष (आरोप और डेटा):केंद्र सरकार का दावा है कि 2014 से 2025 के बीच बंगाल को 5.36 लाख करोड़ रुपये जारी किए गए।
- मनरेगा (MGNREGA): केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार, बंगाल में 19 जिलों में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं पाई गईं।
आरोप: "फर्जी मस्टर रोल" और "घोस्ट बेनेफिशियरी" के नाम पर फंड का दुरुपयोग हुआ। इसी आधार पर धारा 27 के तहत मनरेगा का फंड रोका गया।
पीएम आवास योजना: केंद्र का तर्क है कि राज्य ने योजना का नाम बदलकर 'बांग्ला आवास योजना' कर दिया, जो संघीय ढांचे का उल्लंघन है।
राज्य का पक्ष (काउंटर और दावे)
ममता सरकार इसे "आर्थिक नाकेबंदी" (Economic Blockade) करार देती है।
दावा: TMC के अनुसार, केंद्र पर राज्य का 1.60 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है। इसमें 40,000 करोड़ का GST मुआवजा और मनरेगा के तहत 7,000 करोड़ की मजदूरी शामिल है।
अदालती मोड़: जून 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट और अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के रुख पर सवाल उठाते हुए मजदूरी जारी करने के संकेत दिए थे। ममता बनर्जी का सीधा सवाल है—"भ्रष्टाचार की जांच एजेंसियां करें, लेकिन गरीबों की मजदूरी क्यों रोकी गई?"
फंड का गणित: तुलनात्मक भेदभाव या प्रशासनिक कड़वाहट?
हालांकि केंद्र सरकार का दावा कि उसने 2014-25 के दौरान बंगाल को 5.36 लाख करोड़ रुपये दिए अगर इसकी तुलना जब हम इसी जनसंख्या (लगभग 10 करोड़) वाले भाजपा शासित राज्यों जैसे महाराष्ट्र या उत्तर प्रदेश से करते हैं, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। पिछले दशक में महाराष्ट्र और यूपी को बुनियादी ढांचे, मेट्रो प्रोजेक्ट्स और स्मार्ट सिटी के नाम पर बंगाल की तुलना में लगभग 22% से 35% अधिक केंद्रीय सहायता (Central Grants-in-aid) प्राप्त हुई है।
और यदि हम मनमोहन सिंह के दौर (2004-2014) और मोदी शासन के पिछले दस वर्षों की तुलना करें, तो बंगाल को मिलने वाले फंड में नाममात्र की वृद्धि हुई है, लेकिन मुद्रास्फीति (Inflation) को जोड़ने पर यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। 10 साल की औसत महंगाई दर (लगभग 6%) और राज्य की बढ़ती जरूरतों के हिसाब से, बंगाल को मिलने वाला फंड मौजूदा राशि से कम से कम 1.85 लाख करोड़ रुपये और अधिक होना चाहिए था। मनमोहन सरकार के दौरान फंड का प्रवाह 'राजनीतिक सौदेबाजी' (क्योंकि तृणमूल गठबंधन में थी) के कारण अधिक सुचारू था, जबकि आज यह 'फंड फ्रीज' और 'इन्वेस्टिगेशन' के जाल में उलझकर रह गया है।
बंगाल मॉडल बनाम भाजपा शासित राज्य
जहाँ उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य इन्फ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक कॉरिडोर पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, वहीं बंगाल का मॉडल 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (DBT) पर आधारित है।
- स्वास्थ्य साथी बनाम आयुष्मान भारत: बंगाल में 'स्वास्थ्य साथी' के तहत 5 करोड़ लोगों को 5 लाख का बीमा मिलता है। केंद्र इसे 'आयुष्मान भारत' का अवरोधक मानता है, जबकि ममता इसे अधिक समावेशी बताती हैं।
- कृषक बंधु: राज्य 1.10 करोड़ किसानों को 10,000 रुपये सालाना दे रहा है, जो केंद्र की 'पीएम किसान' (6,000 रुपये) से अधिक है।
दुआरे सरकार का 'सस्टेनेबल वोटर इकोसिस्टम'
गहन जांच बताती है कि ममता बनर्जी ने एक ऐसा 'सस्टेनेबल वोटर-इकोसिस्टम' तैयार किया है जहाँ लाभार्थी सीधे सरकार से जुड़ा महसूस करता है। 'दुआरे सरकार' (सरकार आपके द्वार) कैंपों ने बिचौलियों की भूमिका कम की है। हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि राज्य का राजस्व घाटा (Revenue Deficit) GSDP का 1.7% रहने का अनुमान है। औद्योगिक निवेश के मामले में बंगाल अभी भी गुजरात और महाराष्ट्र से पीछे है, लेकिन 'वेलफेयर' की दौड़ में वह सबसे आगे खड़ा है।
साफ है कि ममता के 'मां-माटी-मानुष' का यह मॉडल केंद्र की 'फंड-पॉलिटिक्स' और 'एजेंसी-पॉलिटिक्स' के बीच एक अभेद्य किला बन चुका है। चुनाव परिणाम जो भी हों, लेकिन यह सच है कि बंगाल ने 'दिल्ली के राशन' के बजाय 'दीदी के शासन' और उसकी योजनाओं पर अधिक भरोसा जताया है।
ममता बनर्जी ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए बंगाल में एक ऐसी 'सामाजिक सुरक्षा की दीवार' खड़ी कर दी है, जिसे भेदना भाजपा के लिए कठिन चुनौती साबित हो रहा है। केंद्र के भ्रष्टाचार के आरोप अपनी जगह ठोस हो सकते हैं, लेकिन जब एक गरीब महिला के खाते में हर महीने 'लक्ष्मी भंडार' का पैसा आता है, तो वह आरोपों से अधिक अपनी जेब के सच पर यकीन करती है।
अंतिम निर्णय जनता के हाथ में है, लेकिन यह स्पष्ट है कि बंगाल का यह चुनाव 'विकास के बड़े विजन' और 'जमीनी कल्याणकारी लाभ' के बीच का एक निर्णायक मुकाबला है।