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जेएनयू: छात्र-टीचर पिटे थे, दिल्ली पुलिस ने ख़ुद को दी क्लीन चिट 

मेधावी छात्र देने के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में इस साल 5 जनवरी को नक़ाबपोश गुंडों ने घुसकर आतंक मचाया था। उन्होंने 3 घंटे तक जो उनके सामने आया, चाहे वो स्टूडेंट हो या टीचर, उन्हें बुरी तरह पीटा था। तब दिल्ली पुलिस की भूमिका पर ढेरों सवाल खड़े हुए थे। 

अब 11 महीने बाद इस घटना में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट मिल चुकी है। ये क्लीन चिट उन्हें इस मामले की जांच के लिए बनी दिल्ली पुलिस की ही फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग कमेटी ने दी है। 

जेएनयू में हुई इस घटना की गूंज दुनिया भर में हुई थी। 100 से ज़्यादा नक़ाबपोश गुंडों के इस वारदात को बेखौफ़ होकर अंजाम देने से माना गया था कि बिना पुलिस और सत्ता के संरक्षण के ऐसा होना नामुमकिन है। पिछले कुछ वर्षों में जेएनयू जिस तरह दक्षिणपंथ के निशाने पर रहा है, इस घटना को उससे भी जोड़कर देखा गया था। 

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एबीवीपी के कार्यकर्ता शामिल

इस वारदात को अंजाम देने वालों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ता शामिल थे और 11 महीने बाद उनके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई हुई है, ये किसी को नहीं पता। 

इस घटना में 36 लोग जख़्मी हुए थे और एफ़आईआर भी दर्ज हुई थी। इस मामले को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंपा गया था लेकिन अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हो सकी है। 

इन नक़ाबपोशों ने ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’, ‘नक्सलवाद मुर्दाबाद’ और ‘न माओवाद, ना नक्सलवाद, सबसे ऊपर राष्ट्रवाद’ के नारे लगाए थे।
जेएनयू के छात्र-छात्राओं और टीचर्स ने आरोप लगाया था कि जिस दौरान ये नक़ाबपोश गुंडे उन्हें पीट रहे थे, उस दौरान पुलिस कैंपस के गेट पर मौजूद थी लेकिन उसने इन लोगों को रोकने की कोशिश नहीं की। 
jnu violence Delhi Police get clean chit - Satya Hindi
आइशी घोष।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने ख़बर दी थी कि हिंसा वाले दिन पुलिस को दोपहर 2.30 बजे के बाद 4 घंटे तक 23 बार कॉल की गई लेकिन पुलिस तब कैंपस के अंदर आई जब उसे रजिस्ट्रार की ओर से आधिकारिक रूप से आने के लिए कहा गया। 

तब सवाल यही उठा था कि पुलिस कैंपस के बाहर क्यों खड़ी रही जबकि उसे कॉल कर हिंसा के बारे में लगातार बताया जाता रहा। पिछले दिसंबर में दिल्ली पुलिस ने जामिया के कैंपस में घुसकर छात्रों को पीटा था। 

इस घटना को लेकर देखिए वीडियो- 
बहरहाल, इस फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग कमेटी ने इस मामले की जांच के दौरान डीसीपी (साउथ-वेस्ट) देवेंद्र आर्या, एसीपी रमेश कक्कड़, एसएचओ वसंत कुंज (नॉर्थ) ऋतुराज और इंस्पेक्टर आनंद यादव के बयान दर्ज किए। ये सभी पुलिस अफ़सर हाई कोर्ट के आदेशानुसार 5 जनवरी की सुबह जेएनयू के एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक के पास तैनात थे। 
एक सीनियर पुलिस अफ़सर ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि सभी पुलिसकर्मियों ने इस घटना को लेकर एक जैसे ही बयान दर्ज कराए हैं।

यह वारदात तब हुई थी जब उस दिन सुबह से ही 27 पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में जेएनयू कैंपस में पहुंच गए थे, इनमें महिला पुलिसकर्मी भी शामिल थीं। इन्हें इस बात की जिम्मेदारी दी गई थी कि हाई कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए जेएनयू के प्रशासनिक भवन के 100 मीटर के अंदर कोई धरना या विरोध-प्रदर्शन न हो। 

फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पेरियार हॉस्टल से छात्रों को पीटे जाने को लेकर शाम को 3.45 से 4.15 बजे तक पीसीआर को 8 कॉल की गईं। इसके बाद शाम को 4.15 से 6 बजे तक 14 कॉल की गईं। रिपोर्ट में लिखा है कि डीसीपी देवेंद्र आर्या अपने सहयोगियों के साथ शाम को 5-5.15 बजे कैंपस पहुंचे लेकिन मेन गेट से ही वापस लौट गए क्योंकि उस वक़्त उन्हें हालात नॉर्मल लगे। 

रिपोर्ट के मुताबिक़, शाम को 6.24 पर जेएनयू के वीसी एम. जगदीश कुमार ने डीसीपी आर्या, एसीपी और एसएचओ को मैसेज भेजा था और उनसे गेटों पर तैनात होने के लिए कहा था और 7.45 पर रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने उन्हें पुलिसकर्मियों की तैनाती बढ़ाने के लिए ऑफ़िशियल लैटर दिया। 

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पुलिस अफ़सर ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, ‘अफ़सरों के बयानों को दर्ज करने के बाद फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग कमेटी ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि हिंसा वाले पूरे दिन कैंपस में हंगामा होता रहा लेकिन पुलिस के दख़ल के बाद हालात को क़ाबू में कर लिया गया।’ 

स्टिंग ऑपरेशन से एबीवीपी बेनक़ाब

इस घटना पर ‘इंडिया टुडे’ के स्टिंग ऑपरेशन ने तहलका मचा दिया था। जेएनयू में बीए फ़्रेंच के फ़र्स्ट इयर के छात्र अक्षत अवस्थी ने चैनल के अंडर कवर रिपोर्टर से कहा था कि उन्होंने इस हमले का और हमला करने वाली भीड़ का नेतृत्व किया है। अक्षत अवस्थी ने दावा किया था कि वह एबीवीपी से जुड़ा है। 

‘इंडिया टुडे’ ने रोहित शाह नाम के छात्र का भी स्टिंग ऑपरेशन दिखाया था। रोहित ने अंडर कवर रिपोर्टर के साथ बातचीत में कहा था, ‘मैंने नक़ाबपोशों को बताया कि यह एबीवीपी का कमरा है, इस पर वे चले गए।’ जब रोहित से पूछा गया कि जेएनयू में जो हुआ, उस पर उन्हें गर्व है तो उन्होंने कहा था- बिलकुल-बिलकुल। 

रोहित ने कहा था कि अगर यह हमला इस तरह नहीं हुआ होता तो उन्हें (वामपंथियों को) एबीवीपी की ताक़त का अंदाजा नहीं लग पाता। स्टिंग ऑपरेशन में रोहित को यह कहते सुना जा सकता है कि इस हमले में जेएनयू की एबीवीपी इकाई के 20 कार्यकर्ता शामिल थे।

सत्ता-पुलिस का संरक्षण?

इस सबके बाद भी अगर फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग कमेटी ने दिल्ली पुलिस के उन अफ़सरों को क्लीन चिट दी है, जो घटना वाले दिन तैनात थे तो ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि 11 महीने बाद भी किसी की गिरफ़्तारी न होना इस बात का संकेत है कि हमलावरों को सत्ता व पुलिस का संरक्षण हासिल है। 

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