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पुरानी दिल्ली में बवाल पर उठे सवाल, जवाब खोजना ज़रूरी

पुरानी दिल्ली के हौज़ क़ाज़ी इलाक़े में रविवार रात से शुरू हुआ बवाल अब थम चुका है। दोनों समुदायों के लोगों ने कहा है कि क्षेत्र में अमन कायम करने की कोशिशें की जा रही हैं। फिलहाल पुलिस का पूरा जोर शांति व्यवस्था को बहाल करने पर है और उसे काफ़ी हद तक इसमें कामयाबी भी मिली है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने तीन आरोपियों को पकड़ लिया है। पकड़े गए आरोपियों में से एक नाबालिग है। बताया जाता है कि सीसीटीवी फ़ुटेज में तीनों आरोपी धार्मिक स्थल पर तोड़फोड़ करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
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इलाक़े की अमन कमेटी की ओर से कहा गया है कि इस मामले में पुलिस का रवैया बेहतरीन रहा है। कमेटी ने यह भी कहा है कि अब इलाक़े में शांति है और बुधवार को बाज़ार पहले की ही तरह खुलेगा। मंगलवार को फतेहपुरी मसजिद के शाही इमाम मुफ़्ती मुकर्रम अहमद ने कहा था कि धार्मिक स्थल की जो क्षति हुई है, उसकी इलाक़े के आरडब्ल्यूए के लोग मिलकर मरम्मत कराएँगे।
लेकिन इस बवाल के बाद कई सवाल उठने लाज़िमी हैं। सवाल यह है कि दो लोगों के बीच पार्किंग को लेकर हुआ विवाद आख़िर धार्मिक स्थल पर तोड़फोड़ तक कैसे पहुँच गया।
ख़बरों के मुताबिक़, एक वॉट्स ऐप ग्रुप पर यह अफ़वाह फैलाई गई कि जिन दो लोगों - संजीव गुप्ता और आस मोहम्मद के बीच यह विवाद हुआ था, उनमें से आस मोहम्मद की मौत हो चुकी है। उस दौरान पुलिस दोनों लोगों से हौज़ क़ाज़ी पुलिस थाने के अंदर पूछताछ कर रही थी। इस अफ़वाह के बाद एक समुदाय के सैकड़ों लोग थाने के बाहर जमा हो गए और आस मोहम्मद का शव देने की माँग करने लगे। अब जाँच इस बात की होनी चाहिए कि अगर ऐसी अफ़वाह फैलाई गई तो यह आख़िर किसने फैलाई। पुलिस अपनी जाँच में उस वॉट्स ऐप ग्रुप और उस पर किसने यह अफ़वाह फैलाई, इसकी तहक़ीक़ात करे।
एक सवाल और है कि लोग धार्मिक स्थल तक कैसे पहुँच गए। क्योंकि पार्किंग विवाद का धार्मिक स्थल से कोई लेना-देना ही नहीं था। तो वे कौन लोग हैं और किसके इशारे पर उन्होंने धार्मिक स्थल पर तोड़फोड़ की। यह घटना एक बड़ी साज़िश की ओर इशारा करती है।
बता दें कि छह माह बाद ही दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं। दिल्ली देश की राजधानी है और यहाँ पूरे देश के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। इस शहर को काफ़ी प्रगतिशील माना जाता है और पिछले कुछ वर्षों में एक-दो घटनाओं को छोड़कर यहाँ सांप्रदायिक झड़प या हिंसा की घटनाएँ नहीं हुई हैं। तो ऐसे में चुनाव के छह महीने पहले धार्मिक स्थल पर तोड़फोड़ किया जाना और जिसका इस मामले से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं हो, इस शक को गहरा कर देता है कि यह तोड़फोड़ किसी साज़िश का हिस्सा हो सकती है।
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पुरानी दिल्ली में आज़ादी के बाद से ही दोनों समुदायों के लोग वर्षों से साथ-साथ रहते आ रहे हैं। इस क्षेत्र में सभी समुदायों के धार्मिक स्थल हैं और यह बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र भी है। देश भर से लोग ख़रीदारी के लिए यहाँ आते हैं और व्यापार तभी हो पा रहा है जब इलाक़े में अमन, चैन है और लोग अपने रोजमर्रा के काम में जुटे हुए हैं। लेकिन ऐसी स्थितियों में पार्किंग विवाद को लेकर धार्मिक स्थल पर क्यों तोड़फोड़ की गई, इस सवाल का जवाब पुलिस को खोजना चाहिए। क्योंकि देश तभी तरक़्क़ी कर सकता है जब भाईचारा हो, अमन हो, क़ानून व्यवस्था मजबूत हो और इसे चुनौती देने वाले जेल की सलाखों के पीछे हों।
अंत में यही कहा जा सकता है कि पुलिस दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई करे ताकि अगर किसी साज़िश के तहत धार्मिक स्थल में तोड़फोड़ हुई है तो उस बात का ख़ुलासा हो सके और आगे से भी कोई ऐसी जुर्रत न कर सके। क्योंकि हौज़ क़ाज़ी क्षेत्र के जो ज़िम्मेदार और बड़े-बुजुर्ग हैं वे इस मामले को ज़्यादा तूल देना नहीं चाहते हैं और इस घटना को भुलाकर अमन बहाली की अपील कर रहे हैं।
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