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सीएम ममता बनर्जी और राज्यपाल सीवी आनंद बोस

ममता के सामने झुके राज्यपाल, छह कुलपति की नियुक्ति को राज़ी

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने पश्चिम बंगाल सरकार की सूची से 6 कुलपतियों की खाली जगह को भरने पर सहमति जता दी है। भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट को राज्यपाल (विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति) के फैसले के बारे में जानकारी दी।

लालव लॉ के मुताबिक एजी के बयान पर ध्यान देते हुए, जस्टिस सूर्यकांत और केवी विश्वनाथन की बेंच ने बुधवार को निर्देश दिया कि "एक सप्ताह के भीतर आवश्यक कार्रवाई की जाए।" बेंच ने यह भी कहा कि राज्य सरकार बाकी रिक्तियों के लिए भी सिफारिशें भेज सकती है।

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सुप्रीम अदालत का रुख अंतरिम कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार और राज्यपाल सीवी आनंद बोस के बीच चल रहे विवाद की प्रतिक्रिया के रूप में आया है। अदालत पश्चिम बंगाल राज्य द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के जून 2023 के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें राज्यपाल बोस द्वारा 13 विश्वविद्यालयों में अंतरिम कुलपति नियुक्तियों को बरकरार रखा गया था।

इससे पहले, अदालत ने अटॉर्नी जनरल से राज्यपाल और सरकार के बीच गतिरोध को हल करने के लिए अपने "अच्छे दफ्तर" का इस्तेमाल करने का आग्रह किया था। कोर्ट ने अंतरिम कुलपतियों के पद पर बने रहने को लेकर भी आपत्ति जताई थी। यानी अदालत ने एजी से कहा था कि वो राज्यपाल को समझाएं। इससे पहले अक्टूबर 2023 में, अदालत ने राज्यपाल द्वारा नियुक्त अंतरिम कुलपतियों को वित्तीय भत्तों के वितरण पर रोक लगा दी थी, जबकि मामला कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित था। अदालत ने तदर्थ या कार्यवाहक कुलपतियों की नियुक्ति पर भी रोक लगा दी थी।

बिगड़ैल राज्यपाल

इससे पहले तमिलनाडु और केरल के राज्यपालों का वहां की सरकारों से टकराव सामने आ चुका है। दिल्ली के उपराज्यपाल और केजरीवाल सरकार का टकराव अभी भी चल रहा है। तमिलनाडु की स्थिति भयावह है। वहां के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन राष्ट्रपति को पत्र तक लिख चुके हैं कि गवर्नर आरएन रवि को हटाया जाए।
स्टालिन ने राज्यपाल पर 'सांप्रदायिक नफ़रत' भड़काने और उन्हें 'राज्य में शांति के लिए ख़तरा' होने का आरोप लगाया था। राष्ट्रपति को लिखे ख़त में उन्होंने कहा था कि 'राज्यपाल आर एन रवि हटाए जाने योग्य' हैं। स्टालिन सरकार और राज्य के राज्यपाल आरएन रवि के बीच काफी लंबे समय से तनातनी चली आ रही है। 28 जून 2023 की रात को तमिलनाडु में स्टालिन सरकार और राज्यपाल के बीच राजनीतिक 'ड्रामा' चला था। पहले तो तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने अप्रत्याशित तौर पर बिना एमके स्टालिन कैबिनेट से सलाह लिए ही जेल में बंद मंत्री वी सेंथिल बालाजी को बर्खास्त कर दिया था, लेकिन बाद में जब डीएमके की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई तो राजभवन ने कदम 'पीछे' हटा लिए थे। देर रात को ही राजभवन से सूचना दी गई थी कि राज्यपाल का बर्खास्तगी आदेश कानूनी सलाह के लिए लंबित है।
स्टालिन ने कहा था कि 'राज्य की राजधानियों में बैठकर और राज्य सरकार को उखाड़ फेंकने के अवसर की तलाश में राज्यपाल को केवल संघ के एजेंट के रूप में माना जा सकता है और राज्यपाल की ऐसी कार्रवाई हमारे संघीय दर्शन को नष्ट कर देगी और भारतीय लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को नष्ट कर देगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्यपाल विभाजनकारी हैं और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने कहा है, 'वह धर्म पर व्यक्तिगत विचार व्यक्त करते हैं, हिंदू धर्म का महिमामंडन करते हैं, तमिल संस्कृति को छोटा और बदनाम करते हैं, लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि राज्य का नाम बदलने का उनका सुझाव तमिलनाडु के प्रति उनकी नफ़रत को दर्शाता है।'

केरल का हालः राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने केरल की सीपीएम सरकार के लिए अनगिनत मुसीबतें खड़ी कर रखी हैं। कभी वो राज्य के उपकुलपतियों को बर्खास्त करने की मांग सरकार से करते हैं। कभी वो उनकी सैलरी रोक लेते हैं। कभी वो सरकार पर उन पर जानलेवा हमले का आरोप लगाते हैं। खुद को प्रगतिशील बताने वाले आरिफ मोहम्मद खान से केंद्र सरकार बहुत खुश रहती है।
अक्टूबर 2022 में राज्यपाल खान ने केरल की 9 यूनिवर्सिटीज के वीसी से इस्तीफा मांगा। मुद्दा तूल पकड़ गया और हाईकोर्ट में पहुंच गया। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को कहना पड़ा कि राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान आरएसएस के एक टूल (हथियार) के रूप में काम कर रहे हैं और अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं। मुख्यमंत्री विजयन ने कहा था कि राज्यपाल का पद सरकार के खिलाफ जाने के लिए नहीं बल्कि संविधान की गरिमा को बनाए रखने के लिए होता है। राज्यपाल का निर्देश अलोकतांत्रिक और कुलपतियों की शक्तियों का अतिक्रमण है।
केरल की जिन नौ यूनिवर्सिटीज में कुलपतियों को इस्तीफा देने के लिए कहा गया था, उनमें केरल यूनिवर्सिटी, महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी, कोचीन साइंस और टेक्नॉलजी यूनिवर्सिटी, केरल मत्स्य पालन और महासागर अध्ययन विश्वविद्यालय, कन्नूर विश्वविद्यालय, एपीजे अब्दुल कलाम प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, कालीकट विश्वविद्यालय और थुंचथ एज़ुथाचन मलयालम विश्वविद्यालय इनमें शामिल थे। इन सभी उपकुलपतियों ने राज्यपाल यानी कुलाधिपति के मनमाने आदेशों को मानने से मना कर दिया, इस पर आरिफ नाराज हो गए थे।

उपराज्यपाल वीके सक्सेना की भूमिका

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार की मुसीबतें दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने कई बार बढ़ाई। अभी केजरीवाल जिस कथित शराब नीति मामले में आरोपों का सामना कर रहे हैं और जेल में हैं, उसकी शुरुआत उपराज्यपाल ने की थी। दिल्ली भाजपा ने एलजी को एक ज्ञापन देकर शराब नीति की जांच की मांग की। उपराज्यपाल ने सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी। उसके बाद मामला बढ़ता चला गया। बाद में ईडी भी इस जांच में शामिल हो गई। लेकिन मामला सिर्फ शराब नीति तक नहीं रहा।  
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उपराज्यपाल सक्सेना ने दिल्ली जल बोर्ड के मामले में भी जांच का आदेश दिया। उपराज्यपाल ने आप सरकार के कई फैसलों को पलट दिया। आप के विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, कार्यकर्ताओं ने खुलकर दिल्ली की सड़कों पर उपराज्यपाल के खिलाफ प्रदर्शन किए। लेकिन उपराज्यपाल फैसले लेते रहे। आप का आरोप है कि वीके सक्सेना केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। 
चाहे वो दिल्ली के उपराज्यपाल हों या फिर केरल, तमिलनाडु और बंगाल के राज्यपाल हों, इन सभी के फैसले कहीं न कहीं ये इशारा तो जरूर करते हैं कि वहां की सरकारें इन लोगों से परेशान है। इन सभी राज्यों में कोई ऐसा राज्यपाल नहीं है जिसकी वहां की सरकार ने कभी तारीफ की है। दूसरी तरफ भाजपा शासित राज्यों में राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच बेहतर संबंध चल रहे हैं। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर गैर भाजपा शासित राज्यपाल या उपराज्यपाल क्यों विवादों में रहते हैं। 
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क़मर वहीद नक़वी
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