दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे की कथित साजिश मामले में जेएनयू के पूर्व छात्र नेता और एक्टिविस्ट उमर खालिद को अंतरिम जमानत दे दी है। उनकी मां की सर्जरी के मद्देनजर 1 जून से 3 जून तक उमर को अंतरिम जमानत दी गई है। खालिद ने दिल्ली हाईकोर्ट में 15 दिन की अंतरिम जमानत की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उनके आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मात्र 3 दिन की छूट दी। इससे पहले जमानत देने से कोर्ट ने इंकार कर दिया था।
उमर खालिद सितंबर 2020 से लगातार जेल में हैं। उन्होंने 19 मई को ट्रायल कोर्ट में अंतरिम जमानत के लिए अर्जी दायर की थी, जिसमें उन्होंने दो मुख्य कारण बताए थे: अपने दिवंगत मामा के चेहलुम (चालीसवीं) की रस्म में शामिल होना। 62 वर्षीय मां सबीहा खानम की सर्जरी के दौरान उनकी देखभाल करना।
ट्रायल कोर्ट ने 19 मई को उनकी याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि मामा “निकटतम रिश्तेदार” नहीं हैं और मां की देखभाल अन्य परिवार के सदस्य कर सकते हैं।
ताज़ा ख़बरें

हाईकोर्ट में उमर खालिद के वकील के तर्क

खालिद ने हाईकोर्ट में अपील करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में दिए गए तर्क “गलत और बिना आधार” के हैं। उन्होंने अदालत को बताया:उनकी मां पिछले दो साल से पीठ पर गांठ (lumps) और सिस्ट की समस्या से जूझ रही हैं। 2 जून को उनकी मां का लंप एक्साइजन सर्जरी (lump excision surgery) तय है। उनके 71 वर्षीय पिता अकेले मां की देखभाल नहीं कर सकते। वे सबसे बड़ी संतान और इकलौते बेटे हैं, इसलिए मां की देखभाल उनकी जिम्मेदारी है। वो अपनी 87 वर्षीय दादी के साथ भी समय बिताना चाहते हैं।
खालिद ने यह भी कहा कि पहले भी उन्हें 2022, 2024 और 2025 में परिवारिक मौकों पर अंतरिम जमानत मिली थी और उन्होंने हर बार सभी शर्तों का पालन किया था।
अभियोजन पक्ष (prosecution) ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने कहा कि सर्जरी मामूली है और परिवार के अन्य सदस्य मां की देखभाल कर सकते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद उमर खालिद को 1 जून से 3 जून, 2026 तक अंतरिम जमानत दे दी। उमर खालिद 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित साजिश मामले में आरोपी हैं। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा एक पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा थी, जिसका उमर खालिद ने इंकार किया है।

उमर खालिद की ज़मानत का मामला चर्चा में क्यों रहता है

उमर खालिद पांच वर्षों से भी ज्यादा समय से जेल में हैं। अनगिनत बार उनकी जमानत अर्ज़ी विभिन्न अदालतों में खारिज कर दी गई। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने स्वीकार किया कि उमर खालिद को ज़मानत देने में अपने ही फैसले का पालन नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 18 मई को एक फ़ैसले में कहा कि जनवरी 2026 में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले अपने पुराने फैसले में कुछ गलतियां हुई हैं। अदालत ने कहा कि उस फ़ैसले में UAPA कानून और लंबे समय तक जेल में रखने वाले नियमों को ठीक से नहीं लागू किया गया।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने सैयद इफ्तिखार अंद्राबी नाम के एक व्यक्ति को जमानत दे दी। अंद्राबी पर नशीले पदार्थों के ज़रिए आतंकवाद को पैसे देने का आरोप है। वे क़रीब 6 साल से जेल में थे। इस फ़ैसले में कोर्ट ने कहा, 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है। यह सिद्धांत UAPA जैसे सख्त कानूनों में भी लागू होता है।' बेंच ने कहा कि 2021 के Union of India vs KA Najeeb फ़ैसले का सही से पालन नहीं किया गया था। उस फ़ैसले में कहा गया था कि अगर मुक़दमा लंबा खिंच जाए और आरोपी का तेज सुनवाई का अधिकार (अनुच्छेद 21) प्रभावित हो तो यूएपीए में भी जमानत दी जा सकती है।
देश से और खबरें

पुराने फ़ैसले पर सवाल

जनवरी 2026 में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया लेकिन गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर आदि 5 लोगों को जमानत दे दी। कोर्ट ने अब कहा कि छोटी बेंच बड़ी बेंच के फ़ैसले (केए नजीब) को कमजोर या नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। अगर कोई शंका हो तो मामले को बड़ी बेंच को भेजना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि उमर खालिद और गुरविंदर सिंह जैसे मामलों में अपनाया गया तरीका स्वीकार करना मुश्किल है।