बुधवार शाम जारी हुए चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के एग्जिट पोल के रुझानों ने कांग्रेस के लिए मिली-जुली तस्वीर पेश की है। जहां दक्षिण भारत में पार्टी एक बड़ी वापसी की ओर बढ़ती दिख रही है, वहीं पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में उसकी हालत चिंताजनक बनी हुई है। 
एग्जिट पोल के नतीजे देखें तो यह कांग्रेस के लिए "खुशी" से ज्यादा "गंभीर आत्ममंथन" का विषय हैं। तमाम एग्जिट रिपोर्ट बता रही हैं तो पार्टी एक "क्षेत्रीय ताकत" के रूप में तो सिमटती दिख रही है। साथ ही एक "अखिल भारतीय" विकल्प के रूप में भी कमजोर पड़ रही है। लेकिन केरल पर वाह-वाह की गूंज कांग्रेस में इतनी होगी कि वे बाकी राज्यों के नतीजों पर बात ही नहीं करेंगे। जबकि जमीनी हकीकत पर विचार होना चाहिए।

दक्षिण का सहारा: क्या यह पर्याप्त है?

केरल में UDF की संभावित जीत और तमिलनाडु में DMK के साथ गठबंधन कांग्रेस को ऑक्सीजन तो दे रहा है, लेकिन यहाँ एक पेंच है:
केरल: यहाँ जीत कांग्रेस की अपनी सांगठनिक मजबूती से ज्यादा एलडीएफ (LDF) के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) का नतीजा अधिक लग रही है।
तमिलनाडु: यहाँ कांग्रेस पूरी तरह जूनियर पार्टनर है। उसकी सफलता क्षेत्रीय दल (DMK) के मजबूत आधार पर टिकी है।

केरल पर एग्जिट पोल ने क्या बताया

केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस नेतृत्व वाले UDF (United Democratic Front) को Axis My India एग्जिट पोल ने 78 से 90 सीटें दी हैं, जबकि सत्तारूढ़ CPI(M) नेतृत्व वाले LDF (Left Democratic Front) को मात्र 49 से 62 सीटें तक मिलने का अनुमान है। BJP को 0 से 3 सीटें मिलने का पूर्वानुमान है। 
  • मनोरमा न्यूज-सी वोटर के एग्जिट पोल के अनुसार UDF को 82 से 94 सीटें मिल सकती हैं, जबकि LDF 44 से 56 सीटों पर सिमट सकती है। इस सर्वेक्षण में 28,848 मतदाताओं को शामिल किया गया था। 
  • Matrize और Peoples Pulse जैसी अन्य एजेंसियाँ भी UDF को 70 से 90 सीटों के साथ स्पष्ट बढ़त देती हैं, जबकि LDF को 49 से 69 सीटें मिलने का अनुमान है।
क्षेत्रवार स्थिति
  • कोझिकोड में UDF का शानदार प्रदर्शन देखने को मिल सकता है। 2021 में जहाँ UDF मात्र 2 सीटें जीत पाई थी, वहीं इस बार उसे 9 से 11 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि LDF 2 से 4 सीटों पर रह सकती है। 
  • मलप्पुरम में UDF का दबदबा बरकरार रह सकता है जहाँ LDF को 0 से 1 सीटें मिलने की संभावना है। 
-मुख्यमंत्री पद की पसंद में पिनाराई विजयन 33% के साथ पहले नंबर पर हैं, जबकि कांग्रेस नेता VD सतीशन 21% वोट शेयर के साथ दूसरे स्थान पर हैं।

तमिलनाडु: गठबंधन के सहारे मज़बूत स्थिति

तमिलनाडु में कांग्रेस, DMK के नेतृत्व वाले गठबंधन (Secular Progressive Alliance) का हिस्सा है। यहाँ सत्ताधारी गठबंधन की वापसी तय मानी जा रही है।
  • Matrize ने DMK+ गठबंधन को 122–132 सीटें और People's Pulse ने 125–145 सीटें दी हैं (बहुमत का आंकड़ा 118 है)।
  • कांग्रेस की भूमिका: कांग्रेस ने यहाँ लगभग दो दर्जन सीटों पर चुनाव लड़ा है। DMK की जीत कांग्रेस के लिए दक्षिण में अपनी पकड़ बनाए रखने और भाजपा को राज्य से बाहर रखने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

एग्जिट पोल 2026

असम और बंगाल: वैचारिक और सांगठनिक पतन

असम और बंगाल के एग्जिट पोल नतीजे कांग्रेस की सबसे दुखती रग हैं:
असम: यहाँ भाजपा के हिंदुत्व और विकास के मॉडल को टक्कर देने में कांग्रेस का 'गढ़' ढह चुका है। स्थानीय नेतृत्व और ठोस रणनीति की कमी साफ दिखती है।
बंगाल का शून्य: कभी बंगाल पर राज करने वाली पार्टी का 'हाशिए' पर जाना यह बताता है कि मतदाताओं ने अब कांग्रेस को विकल्प मानना छोड़ दिया है। वहाँ लड़ाई अब पूरी तरह 'TMC बनाम BJP' हो चुकी है।
  • असम में Axis My India: NDA को 88–100 सीटें, जबकि कांग्रेस को मात्र 24–36 सीटें।
  • असम में Matrize & People's Pulse: दोनों ने कांग्रेस को 22 से 32 सीटों के बीच सीमित रखा है।
  • गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस ने एक नई पीढ़ी के साथ अभियान चलाया था, लेकिन रुझानों के मुताबिक भाजपा के 'हिंदुत्व' और विकास के एजेंडे के सामने यह पर्याप्त नहीं रहा।
बंगाल में कांग्रेस की स्थिति सबसे खराब है। यहाँ मुकाबला पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भाजपा के बीच सिमट गया है।
  • शून्य का डर: Matrize और P-Marq जैसे पोलस्टर्स ने कांग्रेस को 0 सीटें दी हैं।
  • अधिकतम अनुमान: Poll Diary ने कांग्रेस को अधिकतम 3-5 सीटें मिलने का अनुमान जताया है।
  • कारण: वाम दलों या TMC के साथ गठबंधन न करने का फैसला कांग्रेस के लिए भारी पड़ता दिख रहा है।

'यूपी 2027': अस्तित्व की लड़ाई

कांग्रेस अगर आत्ममंथन करना चाहे तो उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी उत्तर प्रदेश है। यूपी के बिना केंद्र की सत्ता का रास्ता नामुमकिन है। यूपी में उसका आधार भी है लेकिन क्या इतने भर से काम चल जाएगा, जब आपके सामने खूंखार ढंग से हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकराण का हमला होने वाला हो:
  • संगठन का अभाव: अगर कांग्रेस ने असम और बंगाल जैसी गलतियाँ यूपी में दोहराईं, तो 2027 में भी उसे केवल किसी क्षेत्रीय दल (जैसे सपा) की "पिछलग्गू" बनकर रहना होगा। कांग्रेस को याद रखना चाहिए कि सपा के पास सिर्फ यादव और मुस्लिम वोट हैं। जिसे गठबंधन होने की स्थिति में तमाम सीटों पर ट्रांसफर कराना टेढ़ी खीर है। कांग्रेस के सारे नेताओं को अभी से यूपी में जाकर जम जाना चाहिए। हर जिले, हर क्षेत्र की अलग-अलग रणनीति तैयार करना होगी।
  • तैयारी का समय: यूपी में भाजपा का कैडर और सपा का अपना वोट बैंक बेहद मजबूत है। कांग्रेस को वहाँ 'ग्राउंड-लेवल' पर संगठन खड़ा करने और एक विश्वसनीय चेहरे की जरूरत है।

नई रणनीति की दरकार

कांग्रेस को नई रणनीति की जरूरत है। केवल गठबंधन के भरोसे चुनाव जीतना पार्टी को "वोट कटवा" या "जूनियर प्लेयर" तक सीमित कर देता है। कांग्रेस चाहे तो इन प्वाइंट्स पर सोच सकती है:
स्थानीय नेतृत्व: राज्य और हर जिले में मजबूत और स्वतंत्र चेहरों को आगे लाना। जो नेता विशेष के चापलूस न हों। वफादारी सिर्फ कांग्रेस पार्टी से हो, उसके शीर्ष नेतृत्व से हो।
मुद्दों का चयन: केवल 'विरोध' की राजनीति के बजाय अपना एक वैकल्पिक विकास मॉडल पेश करना। फालतू और विवाद खड़ा करने वाले बयानबाज नेताओं पर सख्त पाबंदी लगना चाहिए।
यूपी पर फोकस: अगर 2027 के लिए अभी से जिलेवार समितियाँ और जमीनी मुद्दे नहीं उठाए गए, तो यूपी में भी बंगाल जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। बूथ प्रबंधन में कांग्रेस कमजोर है। मतदान वाले दिन उसके एजेंट तक नहीं दिखते। यह स्थिति बूथ पर जाने वाले वोटर को भी सोचने पर मजबूर कर देती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता विपक्ष राहुल गांधी के पास क्या इस समय यूपी के हर बूथ पर अपने वफादार और हर समय खड़े रहने वाले कार्यकर्ता की सूची है।
केरल और तमिलनाडु में संभावित जीत एक 'मरहम' की तरह होगी, लेकिन असम और बंगाल के घाव गहरे हो सकते हैं। 2027 के यूपी चुनाव से पहले कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह एक 'सहयोगी दल' बनकर खुश है या वो देश में एक 'मुख्य प्रतिद्वंद्वी' के रूप में वापसी करना चाहती है।